PM Modi Birthday: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सिंतबर को 76 साल के हो जाएंगे. पीएम मोदी 45 साल से ज्यादा समय से राजनीति में सक्रिय हैं और 25 साल से ज्यादा समय उनके सार्वजनिक सेवा को हो गया. हर साल पीएम मोदी के जन्मदिन पर देशभर में कई तरह के कार्यक्रम होते हैं. इस साल भी बीजेपी ने ‘सेवा संकल्प अभियान’ शुरु करने का ऐलान किया है, जो पूरे एक महीने तक चलेगा. दिल्ली में प्रधानमंत्री के जन्मदिन को लेकर खास तैयारियां की गई हैं. वहीं बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने देशवासियों से ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने और प्रधानमंत्री की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करने की अपील है.
प्रधानमंत्री मोदी का जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा. उन्होंने कई सालों तक देश भर में यात्रा की, एक साधु की तरह जीवन जिया और कई रातें हिमालय में बिताईं. उन्होंने घर-परिवार को छोड़कर स्वयं को पूरी तरह राष्ट्र को समर्पित कर दिया. पीएम के जीवन से सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए. पीएम के जन्मदिन के मौके हम आपको उनके बचपन और जवानी के कुछ अनसुने किस्से सुनाएंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जिंदगी की कई अनकही, लेकिन दिल को छू लेने वाली और प्रेरणा देने वाली कहानियां modistory.in पोर्टल पर मौजूद हैं. ये किस्से उनकी संवेदनशीलता, लीडरशिप की काबिलियत और आम लोगों के साथ उनके गहरे जुड़ाव को साफ तौर पर दिखाते हैं.
शहनाई वादकों को करते थे परेशान
पीएम मोदी का मानना है कि बच्चे शरारतों से ही सीखते हैं और उनका विकास होता है. वे भी बचपन में बहुत शरारती थे. उन्होंने एक बार खुद मन की बात कार्यक्रम में बताया था कि वे बचपन में शहनाई बजाने वालों को बहुत परेशान किया करते थे. वे हमेशा उनके पास जाकर उन्हें इमली दिखाया करते थे. इससे उनके मुंह में पानी आ जाता था और वे शहनाई नहीं बजा पाते थे. इस बार शहनाईवादक गुस्सा होकर उन्हें पकड़ने के लिए पीछे भागते थे. लेकिन मोदी तेज दौड़कर वहां से भाग जाते थे.
मगरमच्छ के बच्चे को ले आए घर
प्रधानमंत्री मोदी ने फेमस शो ‘मैन वर्सेज वाइल्ड’ के लिए बियर ग्रिल्स के साथ शूट किया था. उस दौरान अपने बचपन के किस्से सुनाते हुए पीएम मोदी ने बताया था कि बचपन में अपने दोस्तों के साथ शर्मिष्ठा सरोवर गए थे. वहां उन्हें मगरमच्छ का बच्चा दिखा, तो वे उसे पकड़कर घर ले आए. उनके इस काम पर उनकी माता जी हीराबेन बहुत नाराज हो गई थीं. उन्होंने समझाया कि किसी भी बच्चे को उसकी मां से अलग नहीं करना चाहिए. मां की यह बात उन्हें समझ आ गई. इसके बाद वे उसे मगरमच्छ को वापस उसी झील में छोड़ आए.

सैनिक स्कूल में दाखिले की जिद
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, युवा नरेंद्र मोदी देशभक्ति से भरे हुए थे. तब वे महज 12 साल के थे. वह मेहसाणा रेलवे स्टेशन पर गुजरने वाले सैनिकों को चाय पिलाते थे. उनका सपना सेना में भर्ती होने का था, इसलिए उन्होंने जामनगर के सैनिक स्कूल में दाखिला लेने की जिद पकड़ ली थी. लेकिन अपने परिवार की आर्थिक तंगी के कारण, वह वहां दाखिला नहीं ले सके. हालांकि बाद में, उन्होंने स्कूल में NCC कैडेट बनकर अनुशासन का पाठ सीखा.
चॉक पाउडर से सफाई
पीएम मोदी के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. उन्हें बचपन से ही साफ-सफाई पसंद थी, लेकिन उनके पास जूते खरीदने के भी पैसे नहीं थे. उनके मामा ने उन्हें सफेद कैनवस के जूते खरीदकर दिए. जब उनके जूते गंदे हो गए, तो वे पॉलिश भी नहीं करवा पाए. उन्होंने एक तरीका निकाला. उन्होंने अपने टीचरों द्वारा फेंके गए चॉक के टुकड़ों को इकट्ठा किया, उन्हें पीसकर पाउडर बनाया, भिगोया और अपने जूतों पर लगाया. सूखने के बाद वे बिल्कुल नए जैसे दिखने लगे. इसके अलावा, अपने कपड़ों की सिलवटों को बनाए रखने के लिए, वह उन्हें रात में अपने तकिये के नीचे रखकर सोते थे और सुबह, वह एक गिलास में गर्म पानी भरकर उसे स्त्री किया करते थे.

अछूत महिला पर लिखा नाटक
नरेंद्र मोदी को एक्टिंग और लिखने का भी शौक था. उनके स्कूल का सिल्वर जुबली आने वाला था, लेकिन स्कूल के पास बाउंड्री की दीवार बनाने के लिए पैसे नहीं थे. स्कूल के लिए पैसे जुटाने के लिए युवा नरेंद्र मोदी ने “पीलो फूल” नाम का एक नाटक लिखा और उसमें एक्टिंग की. इस नाटक में एक सामाजित संदेश था और उन्होंने उससे मिले पैसे स्कूल की दीवार बनाने के लिए दान कर दिए.
पानी के साथ खाई रोटी
युवा नरेंद्र मोदी 21-22 की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए थे. प्रचारक के तौर वे घर-घर जाया करते थे और एक रात वहीं रुकते थे. एक बार वे किसी गरीब की झुग्गी-झोपड़ी में गए थे. वहां उन्हें बाजरे की रोटी और एक कटोरी दूध खाने के लिए दिया गया. मोदी ने देखा कि पास में बैठा छोटा बच्चा दूध की ओर लगातार देख रहा है. वह बच्चे के मन को समझ गए और उनकी आंखें भर आई. उन्होंने बच्चे के लिए दूध छोड़ दिया और खुद केवल पानी के साथ रोटी खा ली. इसीलिए आज वे गरीबों को समझते हैं और उन तक पहुंचने वाली योजनाओं को शुरू करते हैं.
आपातकाल में बने थे सरदार
1975 में भारत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आपातकाल लागू कर दिया था. देश में माहौल ठीक नहीं था. विपक्ष सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहा था. उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सिख का भेष बदल लिया था. उस समय वह एक युवा आरएसएस प्रचारक थे. पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए, उन्होंने अपनी पहचान छिपाई ताकि वह अंडरग्राउंड रहकर अपना आंदोलन जारी रख सकें. गिरफ्तारी से बचने के लिए, उनके दोस्तों ने उन्हें सिख का भेष बदलने की सलाह दी. उन्होंने दिल्ली के चांदनी चौक में मोती सिनेमा के पास एक दुकान से पगड़ी का कपड़ा खरीदा और एक जान-पहचान वाले ने उन्हें पगड़ी बांधना सिखाया.

पगड़ी पहनकर और दाढ़ी-मूंछ लगाकर उन्होंने दिल्ली से सूरत तक एक डीलक्स ट्रेन से सफर किया. उन्हें पंजाबी नहीं आती थी, इसलिए पकड़े जाने के डर से वह पूरे सफर में चुप रहे. उल दौरान की एक दिलचस्प घटना ‘द मोदी स्टोरी’ पर शेयर की गई है. जब वह गुजरात में एक सुरक्षित ठिकाने से सरदार का भेष बदलकर निकल रहे थे, तो एक पुलिसवाले ने उन्हें रोका और उनसे पूछा- “नरेंद्र मोदी कहां रहते हैं?” उन्होंने ने समझदारी से जवाब दिया, “मुझे नहीं पता. आप अंदर जाकर पता कर लीजिए” और सुरक्षित बच निकले. इतना ही नहीं आपातकाल में गिरफ्तारी से बचने के लिए, उन्होंने न केवल सिख का भेष बदला, बल्कि कुछ समय के लिए सन्यासी का भेष भी धारण किया.
संभालकर रखा दोस्त का मफलर
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने न्यूजीलैंड के दौरे पर बताया था कि लगभग 25-30 साल पहले, जब वे एक साधारण कार्यकर्ता थे, तब उन्हें न्यूजीलैंड आने का मौका मिला था. उस समय उनके पैस ठंड के कपड़े खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. वहां के स्थानीय साथी ने उन्हें एक मफलर, टोपी और ग्लव्स तोहफे में दिए थे. PM मोदी ने आज तक उस मफलर को संभालकर रखा है. उन्होंने कहा कि वह प्यार की एक अनमोल निशानी है.
13 साल की उम्र में हुई थी शादी
नरेंद्र मोदी की शादी 13 साल की उम्र में हुई थी। मूलचंद मोदी और हीराबेन ने अपने गांची समुदाय की परंपराओं को मानते हुए मोदी की शादी 13 साल की उम्र में जशोदाबेन से तय की थी. 1968 में 18 साल की उम्र में उनकी शादी करवा दी गई थी. वे कुछ समय के लिए गृहस्त जीवन में रहे. इसके बाद उन्होंने पारीवारिक जीवन त्याग दिया. उनका झुकाव आध्यात्मिकता, राष्ट्र सेवा और आरएसएस के प्रति हो गया, जिसके बाद उन्होंने संन्यास ले लिया. पारिवारिक जीवन को छोड़ने के बाद, वे तपस्या करने के लिए कई सालों तक हिमालय चले गए. इसके बाद वे कभी जशोदाबेन से नहीं मिले. नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने हलफनामे में पहली बार जशोदाबेन को अपनी पत्नी माना था, तो उन्होंने बहुत खुशी जताई थी. दोनों का कभी कानूनी रूप से तलाक नहीं हुआ. जशोदाबेन अलग होने के बाद अपने भाई के साथ साधारण जीवन गुजारने लगीं.
ट्रेन में घूम-घूमकर बेची चाय
नरेंद्र मोदी का जन्म गुजरात के वडनगर में 17 सितंबर, 1950 को हुआ था. वे पांच भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं. उनके पिता दामोदरदास मूलचंद मोदी वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे. स्कूल के बाद नरेंद्र मोदी सीधे अपने पिता की दुकान पर जाते और ग्राहकों को चाय देते थे. उन्होंने ट्रेन के डिब्बों में सफर करके भी चाय बेची है. उन्होंने 18 साल की उम्र में घर छोड़ दिया था. वे राजकोट में रामकृष्ण मिशन आश्रम गए, फिर कोलकाता के पास बेलूर मठ गए. वहां से वे गुवाहाटी और फिर अल्मोड़ा में स्वामी विवेकानंद के बनाए आश्रम में रहे. दो साल बाद वे वडनगर लौट आए. घर पर कुछ समय रहने के बाद, वे अहमदाबाद चले गए. वहां उन्होंने अपने चाचा की चाय की दुकान पर काम करना शुरू किया. वहां उनकी मुलाकात लक्ष्मणराव इनामदार से हुई, जो उस समय RSS मुख्यालय में थे. RSS में शामिल होने के बाद मोदी 1971 में इसके प्रचारक बन गए और संघ के विस्तार का काम किया.
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