Smart Border: मोदी सरकार सीमा पार से घुसपैठ को रोकने के लिए लगभग 6000 किमी लंबी पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा को तकनीकी रूप से अभेद्य बनाने के लिए ‘स्मार्ट बॉर्डर’ परियोजना शुरू कर रही है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मुताबिक, इस योजना के तहत पारंपरिक बाड़ लगाने के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित निगरानी प्रणाली, एंटी ड्रोन तकनीक, स्मार्ट रडार, थर्मल इमेजिंग और जमीन के नीचे छिपे भूमिगत सेंसर का डिजिटल सुरक्षा कवच बनाया जाएगा.
घुसपैठ के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’
शुरुआती चरण में पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे घुसपैठ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्यों की सीमाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा घोषित ‘स्मार्ट बॉर्डर’ परियोजना भारत की सीमा सुरक्षा नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव है. पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और बिहार के सीमावर्ती इलाकों में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानते हुए सरकार ने घुसपैठ के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने त्रिपुरा के लंकामुरा बॉर्डर आउटपोस्ट (बीओपी) पर शुक्रवार को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों को संबोधित करते हुए साफ संदेश दिया कि सरकार देश की संप्रभुता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगी. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल और असम तक के विधानसभा चुनावों में सीमा पार घुसपैठ को देश की अस्मिता और अस्मिता से जुड़ा मुख्य मुद्दा बनाया था.
जनसांख्यिकी में बदलाव सोची-समझी साजिश
मोदी सरकार का मानना है कि सीमावर्ती जिलों में अवैध प्रवासियों की बढ़ती आबादी कोई सामान्य घटना नहीं है, बल्कि देश के सामाजिक और सांस्कृतिक संतुलन को बिगाड़ने की एक सुनियोजित साजिश है. अमित शाह ने दो टूक कहा है कि बंगाल, त्रिपुरा और बिहार की खुली सीमाओं या सुरक्षा खामियों का फायदा उठाकर घुसपैठ के कारण होने वाले जनसांख्यिकीय बदलाव को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. किसी भी देश का पूर्ण विकास तब तक संभव नहीं है जब तक उसकी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित और घुसपैठ से मुक्त न हों.
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घुसपैठ के कारण सीमावर्ती जिलों की मूल सांस्कृतिक पहचान और सुरक्षा दोनों खतरे में हैं.परंपरागत रूप से भारत की सीमाओं की सुरक्षा कंटीले तारों (सीमा बाड़) और बीएसएफ कर्मियों की पैदल गश्त पर निर्भर रही है. हालांकि, भारत की सीमाएं अत्यंत कठिन भौगोलिक क्षेत्रों जैसे नदियों, घने जंगलों, दलदली भूमि, पहाड़ों और कृषि क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं, जहां भौतिक रूप से बाड़ लगाना या चौबीसों घंटे निगरानी रखना बेहद कठिन है. इस कमी को दूर करने के लिए ‘स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट’ तैयार किया गया है. यह परियोजना एक बहुस्तरीय सुरक्षा ग्रिड है जो पूरी तरह से ‘एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली’ और अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है.

- ड्रोन और यूएवी: दिन-रात काम करने वाले निगरानी ड्रोन सीमा पार और उस पार संदिग्ध गतिविधियों की वास्तविक समय पर निगरानी प्रदान करेंगे.
- हाई रेजोल्यूशन रडार सिस्टम: जमीन और हवा में हर गतिविधि को पकड़ने के लिए अत्याधुनिक रडार तैनात किए जाएंगे.
- AI संचालित स्मार्ट कैमरे: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस कैमरे वास्तविक समय विश्लेषण के माध्यम से मनुष्यों, जानवरों और वाहनों के बीच अंतर करके घुसपैठ के प्रयासों के बारे में कमांड सेंटर को तुरंत सचेत करेंगे.
- थर्मल इमेजिंग और ग्राउंड सेंसर: घने कोहरे, भारी बारिश या रात के अंधेरे में भी छिपे घुसपैठियों का पता लगाने के लिए जमीन के नीचे और बाड़ के आसपास लेजर और थर्मल सेंसर लगाए जाएंगे.
- फाइबर ऑप्टिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर: सभी प्रौद्योगिकियों को एक एकीकृत नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, जो सीमा पर तैनात सैनिकों को त्वरित प्रतिक्रिया देने में मदद करेगा.
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गृह मंत्रालय का लक्ष्य अगले एक साल के भीतर (2027 के मध्य तक) बीएसएफ के सुरक्षा ढांचे को इस उन्नत तकनीक से पूरी तरह लैस करना है. देश में 7 से 8 जगहों पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर क्रियान्वयन होगा. अमित शाह ने घोषणा की है कि स्मार्ट बॉर्डर परियोजना वर्तमान में अपने अंतिम निष्पादन चरण में है. पूरे देश में व्यापक रूप से लागू करने से पहले इसे देश के सात से आठ बेहद संवेदनशील स्थानों पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जा रहा है.
पायलट प्रोजेक्ट कार्य योजना
- संवेदनशील क्षेत्रों का चयन: यह पायलट प्रोजेक्ट उन चुनिंदा सीमावर्ती क्षेत्रों में लागू किया जाएगा जहां भौगोलिक परिस्थितियां (जैसे नदी की सीमाएं या घने जंगल) बेहद कठिन हैं और जहां ऐतिहासिक रूप से घुसपैठ और तस्करी की सबसे ज्यादा रिपोर्टें हैं.
- बीएसएफ और एसएसबी की तैनाती: इन सात-आठ चिह्नित स्थानों पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के जवानों के साथ इस तकनीक का लाइव परीक्षण किया जाएगा.
- कमियों की पहचान और सुधार: पायलट प्रोजेक्ट यह देखेगा कि ये डिजिटल सेंसर और कैमरे अत्यधिक मौसम (जैसे भारी बाढ़ या अत्यधिक ठंड) में कितने प्रभावी ढंग से काम करते हैं. इसके बाद मिले फीडबैक के आधार पर पूरे 6,000 किमी के सुरक्षा नेटवर्क को अंतिम रूप दिया जाएगा.
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स्मार्ट सीमाओं के अलावा, गृह मंत्रालय ‘बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड मैनेजमेंट’ (बीआईएम) योजना के तहत सीमाओं को आधुनिक किले में बदलने के लिए कई मोर्चों पर काम कर रहा है. सरकार ने सीमा बुनियादी ढांचे के विकास पर 13,000 करोड़ से अधिक खर्च किए हैं. इसके तहत 1,812 किलोमीटर से अधिक नई सीमा सड़कों का निर्माण किया गया है ताकि आपात स्थिति में सेना और अर्धसैनिक बलों की आवाजाही तेज हो सके.
- बाड़ लगाना और बाढ़ प्रकाश व्यवस्था: भारत-बांग्लादेश सीमा पर 3,180 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर भौतिक बाड़ लगाई गई है। इसके अतिरिक्त, रात के समय दृश्यता बढ़ाने के लिए 1,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर उच्च तीव्रता वाली बाढ़ प्रकाश व्यवस्था स्थापित की गई है.
- विलेज प्रोग्राम: सीमावर्ती गांवों को वीरान होने से बचाने और उन्हें देश की ‘रक्षा की पहली पंक्ति’ बनाने के लिए बुनियादी सुविधाएं (बिजली, पानी, सड़क, इंटरनेट) प्रदान की जा रही हैं ताकि स्थानीय आबादी पलायन न करे और सुरक्षा बलों के लिए खुफिया इनपुट का स्रोत बनी रहे.
- अपराधों पर चौतरफा हमला: इस नए सुरक्षा ग्रिड को न केवल मानव घुसपैठ बल्कि ड्रोन के माध्यम से हथियारों की डिलीवरी, नकली भारतीय मुद्रा, पशु तस्करी और ड्रग्स सिंडिकेट को नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
- पश्चिम बंगाल में बड़ा नीतिगत बदलाव: नेतृत्व परिवर्तन के बाद पश्चिम बंगाल में सीमा प्रबंधन की दिशा में ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिला है. पिछली ममता बनर्जी सरकार के दौरान भूमि अधिग्रहण और बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकार के बीच अक्सर झड़पें होती थीं, जिसके कारण बंगाल के साथ बांग्लादेश की सीमा का एक बड़ा हिस्सा बिना बाड़ के रह जाता था. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नवगठित सरकार ने केंद्र के सहयोग से ‘डबल इंजन सरकार’ दृष्टिकोण के तहत सत्ता संभालते ही सीमा सुरक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता दी है.

शुभेंदु सरकार ने बीएसएफ को दिए अधिकार और निर्देश
- ऐतिहासिक भूमि सौंपना: शुभेंदु अधिकारी सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक के तुरंत बाद रिकॉर्ड समय (सिर्फ 7 से 23 दिनों के भीतर) में 600 हेक्टेयर (लगभग 600 एकड़) जमीन सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को सौंप दी है. यह जमीन प्रशासनिक और राजनीतिक कारणों से वर्षों से लंबित थी.
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा: पश्चिम बंगाल सरकार ने देश के सबसे संवेदनशील इलाके सिलीगुड़ी कॉरिडोर या ‘चिकन नेक’ क्षेत्र में 121 हेक्टेयर भूमि भारत सरकार और सुरक्षा बलों को हस्तांतरित कर दी है, ताकि इस रणनीतिक गलियारे की सुरक्षा को अभेद्य बनाया जा सके.
- ‘पता लगाएं, हटाएं, निर्वासित करें’ नीति: शुभेंदु सरकार ने राज्य में अवैध घुसपैठियों के खिलाफ सख्त त्रिस्तरीय नीति लागू की है. इसके तहत राज्य पुलिस को स्थानीय स्तर पर अवैध प्रवासियों की पहचान करने, उनके फर्जी दस्तावेजों (जैसे राशन कार्ड, वोटर आईडी, आधार कार्ड) को रद्द करने और उन्हें निर्वासित करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया है.
- डिटेंशन सेंटर की स्थापना: कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक घुसपैठियों को रखने के लिए राज्य में विशेष डिटेंशन सेंटर स्थापित किए गए हैं, जिनमें से 386 संदिग्ध प्रवासियों को प्राथमिकता कार्रवाई के रूप में पहले ही स्थानांतरित किया जा चुका है.
- स्थानीय प्रशासन और पुलिस के साथ समन्वय: केंद्रीय गृह मंत्री के निर्देशानुसार, बीएसएफ को अब केवल सीमा चौकियों तक सीमित रहने के बजाय सीमावर्ती गांवों, स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन के साथ सीधा संचार तंत्र स्थापित करने की शक्ति दी गई है. इससे नए आने वाले घुसपैठियों और स्थानीय स्तर पर उन्हें आश्रय देने वाले सिंडिकेट या स्लीपर सेल के बारे में वास्तविक समय की खुफिया जानकारी जुटाई जा सकेगी.
अभेद्य सुरक्षा की ओर बढ़ रहा भारत मोदी सरकार की ‘स्मार्ट बॉर्डर’ अवधारणा और पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार के आने के बाद आए नीतिगत बदलावों के कारण देश की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है. अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि प्रौद्योगिकी, स्थानीय प्रशासन और सीमा रक्षकों (बीएसएफ) के इस त्रिपक्षीय समन्वय के कारण घुसपैठ पर पूरी तरह से काबू पा लिया गया है और अब घुसपैठिए खुद ही वापस लौटने को मजबूर हो रहे हैं.
अमित शाह की दो टूक: बंगाल, त्रिपुरा और बिहार में जनसांख्यिकीय बदलाव बर्दाश्त नहीं
