Women in Workforce: इस देश में औरतें अब सिर्फ घर और परिवार की जिम्मेदारियां पूरी करने तक ही सीमित नहीं हैं. वे हर क्षेत्र में नए मुकाम हासिल कर रही हैं और खुद को साबित कर रही हैं. चाहे नौकरी हो या राजनीति, आज के समय महिलाएं अपनी शर्त पर जीवन जीना चाहती हैं, हालांकि सदियों से चले आ रहे सामाजिक बंधनों को तोड़कर बराबरी कर पाना इतना आसान नहीं है. राजनीति में तो महिलाओं को एक तिहाई का कोटा दे दिया गया है (कानून बन गया, लेकिन लागू नहीं). लेकिन जमीनी स्तर पर आम महिलाओं के लिए संघर्ष जारी है.
लेटेस्ट पब्लिक एंटरप्राइजेज के सर्वे के मुताबिक, सरकारी कंपनियों या CPSEs में महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है. सरकारी कंपनियों में औरतें कुल वर्कफोर्स का 10 प्रतिशत से भी कम हैं. सुपरवाइजरी और लीडरशिप रोल में उनकी मौजूदगी और भी कमजोर है. यह सिर्फ एक स्टैटिस्टिकल संख्या नहीं है, बल्कि हजारों औरतों की कहानी है, जो अपनी काबिलियत और कड़ी मेहनत के बावजूद, आगे बढ़ने में अनदेखी रुकावटों का सामना करती हैं.
सरकारी कंपनियों में 9 प्रतिशत से भी कम महिलाएं सुपरवाइजरी रोल तक पहुंची
लेटेस्ट सरकारी डेटा से पता चलता है कि सेंट्रल पब्लिक सेक्टर कंपनियों (CPSEs) में महिलाएं वर्कफोर्स का 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा हैं. कुल महिला कर्मचारियों में से केवल 8.7 प्रतिशत महिलाएं ही सुपरवाइजरी रोल तक पहुंच पाती है. दिलचस्प बात यह है कि प्राइवेट सेक्टर में तस्वीर थोड़ी बेहतर है, जहां महिलाएं प्रबंधकीय पदों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा हैं. अलग-अलग सर्वे के मुताबिक, एंट्री-लेवल रोल की बात करें तो उनका हिस्सा लगभग एक-तिहाई तक बढ़ जाता है. कुल मिलाकर, देश में महिला LFPR (लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट) 34 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि महिलाएं काम कर रही हैं या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या उन्हें आगे बढ़ने, लीड करने और फैसले लेने के बराबर मौके मिल रहे हैं.
10 प्रतिशत की ग्लास सीलिंग बरकरार
लेटेस्ट पब्लिक एंटरप्राइजेज सर्वे से पता चला है कि वित्तीय वर्ष 2024-25 के आखिर में CPSEs में कुल कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या 9.8 प्रतिशत थी. वित्तीय वर्ष 2023-24 में यह संख्या 77,625 से घटकर FY 2024-25 में 76,685 हो गई. यह संख्या कई सालों से 10 प्रतिशत से नीचे बनी हुई है. सरकार द्वारा जारी सर्वे में आगे कहा गया है कि CPSEs में कुल महिलाओं में से 32.4 प्रतिशत एग्जीक्यूटिव लेवल पर थीं, जबकि केवल 8.7 प्रतिशत सुपरवाइजरी लेवल पर पहुंची. वहीं, 58.9 प्रतिशत महिलाएं वर्कर कैटेगरी में थीं. सुपरवाइजरी लेवल पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2022-23 में 10.08 परसेंट से घटकर 2023-24 में 9 प्रतिशत हो गया था.

लोकसभा में 15 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत रिजर्वेशन लागू करने में देरी के लिए सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर इल्जाम लगा रहे हैं. लोकसभा में महिलाओं के प्रतिनिधि के बात करें तो, पहली लोकसभा में 5 परसेंट से बढ़कर मौजूदा लोकसभा में 15 प्रतिशत हो गया है. इसके अलावा, किसी भी राज्य विधानसभा में 20 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं है. कुछ में, जैसे हिमाचल प्रदेश में, एक प्रतिशत भी महिला विधायक नहीं हैं.
कंपनियों को टैक्स में छूट देने का सुझाव
YSR कांग्रेस पार्टी की MP डॉ. गुम्मा थानुजा रानी ने कहा कि सरकारी कंपनियों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व चिंता की बात है, खासकर तब जब संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर लगातार राजनीतिक बहस चल रही है. उन्होंने कहा, “इस देश में महिलाओं ने सही मौके के लिए बहुत लंबा इंतजार किया है. YSR कांग्रेस MP ने कहा, “असली झटका हमारे अपने पब्लिक सेक्टर में है, जहां महिलाएं 10 परसेंट से भी कम हैं और यह संख्या 10 साल से ज़्यादा समय से नहीं बढ़ी है. सुपरवाइजरी रोल में तो हालत और भी खराब है.” उन्होंने कहा कि कई पब्लिक कंपनियां माइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग जैसे पुरुषों के दबदबे वाले सेक्टर में काम करती हैं, जहां सख्त शिफ्ट, काम करने की जगह पर लचीली पॉलिसी की कमी और सुरक्षित घर या स्कूल के बिना जरूरी रिमोट पोस्टिंग की वजह से महिलाओं को करियर के बीच में ही बाहर होना पड़ता है.
उन्होंने हर PSU में महिलाओं की हायरिंग के लिए साफ, टाइम-बाउंड टारगेट तय करने और खासकर माइनिंग और इंडस्ट्रियल PSU में क्रेच, हॉस्टल, सुरक्षित ट्रांसपोर्ट और लचीली पोस्टिंग जैसी सुविधाएं देने का सुझाव दिया. उन्होंने कहा, “सिलेक्शन और प्रमोशन बोर्ड को जेंडर-बैलेंस्ड और ट्रांसपेरेंट बनाएं.” साथ ही उन्होंने जरूरी पेड “करियर री-एंट्री” प्रोग्राम की भी मांग की और उन कंपनियों को टैक्स इंसेंटिव देने की भी बात कही जो करियर ब्रेक के बाद लौटने वाली महिलाओं के लिए लचीले घंटे और चाइल्डकेयर सपोर्ट देते हैं.
चार खास क्षेत्रों में काम करने की जरूरत
सेक्टर-वाइज डेटा CPSEs में महिलाओं के असमान डिस्ट्रीब्यूशन को भी दिखाता है. सर्वे के मुताबिक, कोयला, टेलीकम्युनिकेशन और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और डिफेंस प्रोडक्शन उन ग्रुप्स में से थे, जहां सबसे ज़्यादा महिलाएं काम करती हैं. PTI से बात करते हुए, एक्टिविस्ट रंजना कुमारी ने कहा कि CPSEs में महिलाओं के कम रिप्रेजेंटेशन की जांच करने की जरूरत है, साथ ही यह भी देखना होगा कि महिलाएं बड़ी इकॉनमी में किस तरह के काम कर रही हैं. उन्होंने कहा कि CPSEs को पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान कार्यस्थल के तौर पर बनाया गया था और महिलाएं बेसिक एंट्री लेवल पर ही थीं, जहां प्रमोशन के मौके कम थे.
कुमारी ने कहा, “सिर्फ महिलाओं के लिए कम भागीदारी ही नहीं, बल्कि इन नौकरियों का नेचर भी बड़ी चिंता का कारण होना चाहिए.” उन्होंने रिक्रूटमेंट में भेदभाव, ट्रांसफर और पोस्टिंग पॉलिसी, बच्चों की देखभाल में कमी और काम की जगहों पर जेंडर के हिसाब से ठीक से संवेदनशील न होने की बात भी कही. उन्होंने कहा, “महिलाओं को काम पर रखने का पूरा आइडिया उन्हें कम सैलरी वाले… और सेल्फ-एम्प्लॉयड, बिना सैलरी वाले फैमिली वर्क में रखना है.” कुमारी ने कहा कि सरकार को स्किल डेवलपमेंट को पारंपरिक एरिया तक सीमित रखने के बजाय महिलाओं को इंडस्ट्री-आधारित ट्रेनिंग देकर एक असरदार पाइपलाइन बनाने की जरूरत है. उन्होंने फॉर्मल नौकरी में महिलाओं की भागीदारी और उन्हें बनाए रखने के लिए चार खास एरिया बताए – “फॉर्मल चाइल्डकेयर, सुरक्षित ट्रांसपोर्ट, स्किल ट्रेनिंग और सोशल प्रोटेक्शन.”
ये हैं कम हिस्सेदारी के कारण
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (PFI) की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पूनम मुत्तरेजा ने कहा कि महिलाओं के कार्यस्थल में हिस्सा लेने में रुकावटें स्ट्रक्चरल हैं. इसे सिर्फ महिलाओं की काम करने की इच्छा से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. उन्होंने PFI की हालिया स्टडी का जिक्र किया, जिसमें पाया गया कि कार्यस्थल पर महिलाओं की कम हिस्सेदारी का कारण उनके ऊपर ज़्यादा जिम्मेदारियां, घर के कामों में पुरुषों की कम मदद, आने-जाने में रुकावट, स्किल्स तक कम पहुंच, महिलाओं के रहने की जगह के पास नौकरी के कम मौके, काम के लिए ट्रैवल करते समय सुरक्षा की चिंता और खराब कनेक्टिविटी है.

मुत्तरेजा ने लेबर फोर्स में हिस्सा लेने और सही आर्थिक मजबूती के बीच के फर्क पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा, “महिलाएं इनफॉर्मल और असुरक्षित कामों में ज़्यादा लगी हुई हैं, जबकि कई फॉर्मल और पारंपरिक रूप से पुरुषों के दबदबे वाले सेक्टर में एंट्री करना मुश्किल बना हुआ है.” उन्होंने मार्केट से जुड़ी स्किलिंग, सस्ती चाइल्डकेयर, पेड मैटरनिटी और पैटरनिटी लीव, सुरक्षित और फ्लेक्सिबल वर्कप्लेस, सुरक्षित ट्रांसपोर्ट, सही रिक्रूटमेंट और प्रमोशन सिस्टम की मांग की. मुत्तरेजा ने कहा, “जब बच्चा बीमार हो तो छुट्टी लेना सिर्फ़ मांओं पर निर्भर नहीं होना चाहिए. कंपनियां पिता को भी ये जिम्मेदारियां शेयर करने की इजाजत देकर इसे बदल सकती हैं.”
लिंग भेद और निर्भरता भी हैं बड़ा कारण
ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया (TRI) में जेंडर एक्सपर्ट डॉ. सीमा भास्करन ने कहा कि भारत में पुरुष-प्रधान सिस्टम लड़कियों और महिलाओं के लिए स्ट्रक्चरल रुकावटें पैदा करता है. महिलाओं के रास्ते में आने वाली रुकावटों में अच्छी और टेक्निकल शिक्षा तक सीमित पहुंच, काम के लिए आने-जाने की कमी, परिवार के सदस्यों पर पैसे और भावनाओं से निर्भरता और मौजूदा सामाजिक नियमों के हिसाब से चलने का सामाजिक दबाव शामिल है.
भास्करन ने कहा कि PSUs में महिलाओं की कम हिस्सेदारी कुछ हद तक उन सेक्टर्स की वजह से है जिनमें कई CPSEs काम करती हैं, जैसे माइनिंग, कोयला, पेट्रोलियम, स्टील, हेवी इंजीनियरिंग, पावर, ट्रांसपोर्ट और कंस्ट्रक्शन. उन्होंने कहा, “यह महिलाओं और पुरुषों की भूमिकाओं और योगदान को लेकर लिंग भेद से और बढ़ जाता है, जिसमें महिलाओं को अक्सर पारंपरिक और घिसी-पिटी भूमिकाओं के लिए पसंद किया जाता है.” उन्होंने लिंग भेद के अलावा, टेक्निकल शिक्षा और काम के लिए आने-जाने की सीमित पहुंच को भी ऐसे सेक्टर्स में महिलाओं के आने में रुकावट डालने वाले कारण बताया.

बराबरी का मतलब
सुपरवाइजरी पोस्ट में जेंडर गैप पर, उन्होंने कहा कि CPSEs के अंदर पितृसत्तात्मक संरचना महिलाओं को भर्ती और एंट्री से लेकर करियर में आगे बढ़ने तक, अलग-अलग स्टेज पर असर डाल सकती है. उन्होंने कहा, “असमान भर्ती प्रक्रिया, पुरुषों के दबदबे वाला वर्कप्लेस कल्चर और ऐसा माहौल जो महिलाओं की जरूरतों के लिए ठीक से उत्तरदायी नहीं है, महिलाओं के लिए सुपरवाइजरी और लीडरशिप पोस्ट में आना मुश्किल बना सकते हैं.” भास्करन ने पुरुषों के दबदबे वाले वर्कप्लेस कल्चर, सही प्रमोशन के मौके, ऑन-द-जॉब स्किल डेवलपमेंट, करियर को बेहतर बनाने के मौके और क्रेच जैसी सुविधाओं में बड़े बदलाव की मांग की. उन्होंने कहा कि वर्कप्लेस पर सही लिंग बराबरी का मतलब होगा भर्ती, प्रमोशन, स्किल डेवलपमेंट और करियर में आगे बढ़ने में बराबरी, साथ ही एक सुरक्षित वर्कप्लेस जो लिंगभेदी बयान, रूढ़िवादिता और भेदभाव से मुक्त हो.
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News Source: PTI
