Jana Nayagan Review: तमिल सुपरस्टार थलापति विजय की आखिरी फिल्म ‘जना नायकन’ का उनके फैंस बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. आखिरकार ये फिल्म आज यानी 23 जुलाई को देश और दुनियाभर के सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है. लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ एक फिल्म है या विजय की राजनीतिक पारी का तीन घंटे लंबा ट्रेलर? अगर आप थिएटर में कहानी देखने जा रहे हैं तो थोड़ा संभलकर जाइए, क्योंकि यहां कहानी से ज्यादा सेलिब्रेशन है, डायलॉग से ज्यादा मैसेज हैं और हीरो से ज्यादा ‘भावी नेता’ वाली फीलिंग है. डायरेक्टर एच. विनोथ ने ‘जना नायकन’ को पूरी तरह विजय के स्टारडम के नाम कर दिया है. फिल्म का हर दूसरा सीन ऐसा लगता है जैसे कैमरा, बैकग्राउंड म्यूजिक और पूरी दुनिया सिर्फ विजय की एंट्री का इंतजार कर रही हो. उनके फैंस के लिए थलापति विजय की ये किसी त्योहार से कम नहीं है. मगर न्यूट्रल ऑडियन्स के लिए कई बार ये एक्सपीरियंस ऐसा भी बन जाता है कि भाई, कहानी भी आगे बढ़ाओ… बार-बार एंट्री पर सिर्फ तालियां ही नहीं बजवानी.
कैदी का रौब
‘जना नायकन’ फिल्म की शुरुआत मदुरै की जेल से होती है, जहां वेत्री यानी विजय एक कैदी हैं. लेकिन यहां कैदी शब्द सिर्फ कागजों पर ही लिखा है. जेल में उनका जलवा ऐसा है कि जेलर भी उनसे आंख मिलाकर बात करने से पहले दो बार सोचता है. एक ऑफिसर का डायलॉग आता है- ‘थलापति हमारी सुरक्षा में नहीं हैं, हम उनकी सुरक्षा में हैं’. यहीं से समझ आ जाता है कि लॉजिक को बाहर पार्क कर दीजिए, क्योंकि अब आगे फिल्म में सिर्फ मास मोमेंट्स की बारिश होने वाली है. दिलचस्प बात ये है कि वेत्री को जेल भेजने वाली उनकी अपनी मां होती हैं. वजह क्या है? इसका जवाब फिल्म धीरे-धीरे देती है और शुरुआत में सस्पेंस बनाए रखती है.

मां का सपना
जब वेत्री की मां आखिरी बार बेटे से मिलने की इच्छा जताती हैं तो जेल अधीक्षक श्रीकांत यानी गौतम वासुदेव मेनन नियमों को किनारे रखकर मुलाकात करवाते हैं. इसकी कीमत उन्हें सस्पेंशन के रूप में चुकानी पड़ती है. बाद में श्रीकांत की सड़क हादसे में मौत हो जाती है और उनकी बेटी विजी की जिम्मेदारी वेत्री के कंधों पर आ जाती है. यहीं से फिल्म का इमोशनल ट्रैक शुरू हो जाता है. वेत्री विजी को सिर्फ बेटी की तरह नहीं पालता बल्कि उसका सपना पूरा करने का जिम्मा भा लेता है. उनका लक्ष्य है कि विजी भारतीय सेना में अधिकारी बने. ये हिस्सा फिल्म का सबसे संतुलित और भावुक पक्ष है. यहां विजय सिर्फ एक्शन हीरो नहीं बल्कि एक जिम्मेदार इंसान के रूप में नजर आते हैं. यही सीक्वेंस कहानी को मजबूती देते हैं.
पोस्टर पर ज्यादा, कहानी में कम
फिल्म में पत्रकार कायल के रोल में पूजा हेगड़े की एंट्री होती है. लेकिन सच कहें तो उनका किरदार वैसा ही है जैसे शादी में रखा हुआ एक्स्ट्रा मिठाई का काउंटर. यानी है तो सही, नहीं है तो भी काम चल जाता. पूजा हेगड़े की स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी है, लेकिन कहानी उन्हें खुलकर खेलने का मौका ही नहीं देती. कई बार तो लगता है कि निर्देशक भी भूल गए कि फिल्म में उनकी हीरोइन भी है.
विलेन वाला असली स्वैग
अब बात करते हैं फिल्म के सबसे दमदार सरप्राइज की. बॉबी देओल इस फिल्म में जॉन हिमलर के रोल में हैं. वो अपने रोल से पूरी फिल्म में खौफ पैदा करते हैं. उनका किरदार अफ्रीका के काल्पनिक देश स्वासनिया से ऑपरेट करता है और दुनिया की सरकारों को अपने इशारों पर नचाने की कोशिश करता है. हथियारों की तस्करी, राजनीतिक साजिश और समाज में डर फैलाना, यही उसका काम और मिशन है. ये सब देखकर किसी हॉलीवुड विलेन की याद आती है. बॉबी कम बोलते हैं लेकिन स्क्रीन पर आते ही माहौल बदल जाता है. विजय के सामने उनकी मौजूदगी फिल्म को मजबूती देती है.

राजनीतिक फिल्म
इंटरवल तक फिल्म एक फैमिली ड्रामा और एक्शन एंटरटेनर लगती है. लेकिन इसके बाद अचानक ऐसा महसूस होता है कि निर्देशक ने स्क्रिप्ट की जगह चुनावी घोषणापत्र खोल लिया हो. भ्रष्टाचार, महिला सशक्तिकरण, राजनीति, जनता, नेता, व्यवस्था परिवर्तन. यानी जितने मुद्दे अखबार के एडिटोरियल पेज पर मिलते हैं, लगभग उतने ही फिल्म में भी डाल दिए गए हैं. वैसे, मैसेज देना अच्छी बात है, लेकिन जब हर दस मिनट में भाषण जैसा माहौल बनने लगे तो कहानी बैक सीट पर चली जाती है.
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थिएटर बना स्टेडियम
वैसे, एक बात माननी पड़ेगी कि, विजय को बड़े पर्दे पर देखने का मजा अलग ही है. उनकी हर एंट्री पर सीटियां बजती हैं. हर पंच डायलॉग पर तालियां गूंजती हैं. हर डांस नंबर पर थिएटर स्टेडियम बन जाता है. फिल्म में कई ऐसे डायलॉग भी हैं जो विजय के असली राजनीतिक भाषणों की याद दिलाते हैं. इतना ही नहीं, उनकी पुरानी फिल्मों के रेफरेंस भी बार-बार डाले गए हैं ताकि फैंस को पूरा “फेयरवेल पैकेज” मिल सके.
कहानी कमजोर, स्टारडम ओवरलोड
अब विजय की इस आखिरी फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी पर भी बात कर लेते हैं, जो है इसकी कहानी. कहानी ही फिल्म की सबसे बड़ी समस्या है. ऐसा लगता है कि निर्देशक का पहला उद्देश्य अच्छी कहानी सुनाना नहीं, बल्कि विजय के हर सीन पर तालियां बजवाना था. कई किरदार पहले हाफ में शानदार एंट्री लेते हैं लेकिन दूसरे हाफ में ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे उनकी ट्रेन छूट गई हो. प्रकाश राज, नासर, प्रियामणि, सुनील, नारायण, रेवती जैसे अनुभवी कलाकार मौजूद हैं, लेकिन उन्हें उतना स्पेस नहीं मिलता जितना मिलना चाहिए था.

एडिटर छुट्टी पर था क्या?
फिल्म की लंबाई तीन घंटे से ज्यादा है. कई सीन ऐसे हैं जिन्हें आराम से काटा जा सकता था. कुछ डांस नंबर सिर्फ फैंस के लिए हैं. कुछ स्लो मोशन वॉक इतनी लंबी है कि लगता है विजय मंजिल तक पैदल नहीं, कैलेंडर बदलकर पहुंचेंगे. अगर एडिटिंग थोड़ी टाइट होती तो फिल्म का असर और ज्यादा दमदार हो सकता था.
अनिरुद्ध का म्यूजिक
अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है. जहां कहानी थोड़ी कमजोर पड़ती है, वहां उनका म्यूजिक माहौल संभाल लेता है. क्लाइमैक्स में उनका बीजीएम थिएटर में अलग ही एनर्जी डाल देता है. इस फिल्म के गाने पहले से ही लोकप्रिय हो चुके हैं और बड़े पर्दे पर उनका प्रभाव और ज्यादा बढ़ जाता है. म्यूज़िक के अलावा बात करें तकनीकी पक्ष की, तो ये काफी शानदार है. सत्यन सूर्यन की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को बड़े कैनवास वाला एहसास देती है. फिल्म में लोकेशन शानदार हैं, कैमरा वर्क कई जगह हॉलीवुड स्टाइल वाला फील देता है. यानी, देखा जाए तो, तकनीकी रूप से फिल्म कहीं भी कमजोर नजर नहीं आती.
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विजय की बेस्ट विदाई है?
अब सबसे बड़ा सवाल, क्या ये फिल्मों से विजय की बेस्ट विदाई है? ऐसे में अगर आप विजय के कट्टर फैन हैं तो जवाब है- बिल्कुल. वहीं, अगर आप एक मजबूत कहानी की उम्मीद लेकर थिएटर्स में जा रहे हैं तो आपको थोड़ा धैर्य रखना पड़ेगा. ‘जना नायकन’ कई बार फिल्म कम और विजय की राजनीतिक ब्रांडिंग ज्यादा लगती है. लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि विजय का करिश्मा इतना बड़ा है कि वो कई कमजोरियों को अपने कंधों पर उठा लेते हैं. वो हर फ्रेम में छाए रहते हैं. ये कहना गलत नहीं है कि, उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ही फिल्म का सबसे बड़ा हथियार है.

फाइनल वर्डिक्ट
3 घंटे 3 मिनट यानी टोटल 183 मिनट की ‘जना नायकन’ ऐसी फिल्म है जिसमें लॉजिक से ज्यादा लार्जर-दैन-लाइफ मोमेंट्स हैं. कहानी कई जगह पटरी से उतरती है, राजनीतिक संदेश जरूरत से ज्यादा हो जाते हैं और स्क्रीनप्ले थोड़ा बिखरा हुआ महसूस होता है. लेकिन जैसे ही विजय स्क्रीन पर आते हैं, थिएटर फिर से जिंदा हो उठता है. ये फिल्म उन लोगों के लिए किसी जश्न से कम नहीं जो सालों से थलापति विजय को बड़े पर्दे पर देखते आए हैं. वहीं जो लोग सिर्फ कहानी और स्क्रीनप्ले की तलाश में आएंगे, उन्हें कई बार निराशा भी हाथ लग सकती है. आखिर में इतना जरूर कहा जा सकता है कि ‘जना नायकन’ एक परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन विजय के फैंस के लिए ये एक यादगार विदाई जरूर है. शायद यही इस फिल्म का सबसे बड़ा मकसद भी था. ये भी कहा जा सकता है कि, ‘जना नायकन’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक ऐसे सुपरस्टार को सलाम है जिसने सालों तक अपने अभिनय, स्टाइल और करिश्मे से करोड़ों दिलों पर राज किया. बाकी हमारी तरफ से थलापति विजय की इस आखिरी फिल्म को 5 में 2.5 स्टार दिए जाते हैं.
