Shiv Sena Split History: महाराष्ट्र में इस समय सियासी भूचाल मचा हुआ है. शिवसेना-UBT एक बार फिर टूट गई है. उद्धव गुट के 6 बागी सांसदों ने शिंदे गुट का दामन थाम लिया है. हिंदू हृदय सम्राट बालासाहब ठाकरे की शिवसेना, जिसने कभी महाराष्ट्र पर राज किया, आज अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. बालासाहब ठाकरे ने मराठी मानुष के हितों और हक के लिए जो पार्टी बनाई थी, आज उनके ही बेटे उद्धव ठाकरे के पास न तो पार्टी बची है और न ही पार्टी का सिंबल. उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शिवसेना UBT (उद्धव बालासाहब ठाकरे) कहलाती है. 1966 में बनी पार्टी को 60 साल हो चुके हैं और इस दौरान शिवसेना कुल छह बार टूट चुकी है. कभी पराए तो कभी अपनों ने शिवसेना का हाथ छोड़ा. यहां जानें कि शिवसेना कब-कब और किन हालातों में टूटी और कैसे आज उद्धव के लिए ‘ठाकरे ब्रांड’ बचाना सबसे बड़ी जंग है.
पहली बगावत
19 जून, 1966 को बालासाहब ठाकरे ने शिवाजी पार्क में शिवसेना की नींव रखी थी. शिवसेना के बनने के कुछ दिन बाद ही बाल ठाकरे और मुंबई के एक नेता बंधू शिंगरे के बीच तनाव हो गया. साल 1974 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुंबई में उपचुनाव में हुआ. बंधु शिंगरे शिवसेना के बड़े नेता थे और मुंबई के परेल -लालबाग मिल मजदूर इलाके में उनकी मजबूत पकड़ थी. उपचुनाव में बाल ठाकरे ने कांग्रेस के उम्मीदवार रामराव आदिक को समर्थन देने का फैसला किया. शिंगरे इसके सख्त खिलाफ थे. बाल ठाकरे से नाराज होकर शिंगरे ने शिवसेना से अलग होने का फैसला लिया और पार्टी छोड़ दी. शिवसेना छोड़ने के बाद बंधु शिंगारे ने शिवसेना के की तरह एक नया संगठन बनाया. उन्होंने अपनी नई पार्टी का नाम “प्रति शिवसेना” रखा. हालांकि, उनकी पार्टी राजनीति में ज्यादा असर डालने में नाकाम रही.
जब भुजबल गए
शिवसेना के अंदर पहली बड़ी राजनीतिक बगावत 1991 में हुई, जब छगन भुजबल ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया. उस समय शिवसेना ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में 52 सीटें जीती थीं. भुजबल विधानसभा में विपक्ष का नेता बनना चाहते थे, लेकिन पार्टी प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने यह जिम्मेदारी मनोहर जोशी को सौंप दी. इससे नाराज होकर भुजबल ने खुलेआम बाल ठाकरे का विरोध किया.

इसके बाद, उन्होंने 17 विधायकों को साथ लेकर एक अलग गुट बना लिया. यह पहली बार था जब शिवसेना के किसी बड़े और प्रभावशाली नेता ने खुलकर पार्टी नेतृत्व को चुनौती दी थी. उनके समर्थक विधायकों ने विधानसभा में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की और उनके गुट को ‘शिवसेना- बी’ के नाम से जाना जाने लगा. हालांकि पार्टी अपने दम पर खास प्रदर्शन नहीं कर पाई और आखिरकार भुजबल और उनके समर्थकों ने कांग्रेस का दामन थाम लिया, जिसकी कमान उस समय शरद पवार के हाथों में थी. इस बगावत ने शिवसेना को संगठनात्मक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया. आज छगन भुजबल एनसीपी- अजित पवार गुट में हैं.
नारायण राणे ने भी बनाई अलग पार्टी
शिवसेना को दूसरा बड़ा झटका नारायण राणे ने दिया. राणे को शिवसेना के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक माना जाता था और बालासाहेब ठाकरे ने उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री भी बनाया था. हालांकि, जब उद्धव ठाकरे को पार्टी के भविष्य के नेता के तौर पर पेश किया जाने लगा तो कई नेताओं को यह खलने लगा, क्योंकि वे पहले पार्टी में काम कर रहे थे. राणे भी उनमें से एक थे. राणे और नेतृत्व के बीच मतभेद पैदा हो गए. उन्हें लगने लगा कि पार्टी में उनकी भूमिका और उनके समर्थकों के हितों को नजरअंदाज किया जा रहा है. उद्धव ठाकरे और नारायण राणे के बीच मतभेद और गहरे होते गए. राणे का मानना था कि उद्धव ठाकरे में उस राजनीतिक समझ और जनता से जुड़ने की क्षमता की कमी है, जिसकी पार्टी को जरूरत थी. इसके बाद 2005 में उन्होंने शिवसेना से अलग होने का ऐलान किया. पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने स्वाभिमान पार्टी बनाई. उनकी राजनीतिक यात्रा उन्हें बाद में कांग्रेस में और फिर BJP तक ले गई.
भतीजे ने की बगावत
जब बालासाहब ठाकरे ने उत्तराधिकारी के लिए अपने बेटे उद्धव ठाकरे को चुना तो उनके भतीजे राज ठाकरे को बड़ा धक्का लगा. इसके बाद उद्धव ने भी राजनीति में अपने पैर जमाना शुरू किया. एक तरफ उद्धव को संगठन में ज्यादा अहमियत मिलने लगी, तो दूसरी राज ठाकरे उनके समर्थकों में जलन की भावना पैदा होने लगी. साल 2002 में मुंबई महानगरपालिका चुनाव में पार्टी प्रचार का जिम्मा उद्धव ठाकरे को दिया गया, जो अब तक राज ठाकरे के पास था. चुनाव में शिवसेना को प्रचंड जीत मिली. इसी तरह 2004 के विधानसभा चुनाव में उद्धव ने ही सारी जिम्मेदारियों संभाली, लेकिन शिवसेना को करारी हार का सामना करना पड़ा. ऐसे में राज ठाकरे के समर्थकों ने हार का ठीकरा उद्धव पर फोड़ा और पार्टी में कलह बढ़ गया.

साल 2005 में जब बालासाहब ठाकरे ने उद्धव को पार्टी का कार्याध्यक्ष बनाया तो राज ठाकरे नाराज हो गए और शिवसेना से अलग होने का फैसला लिया. 18 दिसंबर 2005 को राज ठाकरे ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और तीन महीने बाद अपनी अलग पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया. यह दिन महाराष्ट्र का सियासी समीकरण बदलने वाला दिन था. 9 मार्च 2006 को राज ठाकरे ने अपनी पार्टी ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ की घोषणा की. हालांकि इस दौरान राज ठाकरे सियासत में अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाए. दो दशकों तक उन्होंने अकेले चुनाव लड़ा. 2024 के विधानसभा चुनावों में राज ठाकरे का एक भी उम्मीदवार जीत नहीं पाया. वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी लगातार खराब प्रदर्शन कर रही थी. महाराष्ट्र की सियासत में फिर से पकड़ मजबूत करने और अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने हाथ मिलाने का फैसला किया. पिछले साल दिसंबर, 2025 में बीएमसी चुनाव से पहले राज ठाकरे ने एक बार फिर शिवसेना के साथ गठबंधन का ऐलान किया.
जब शिंदे ले गए विधायक और पार्टी सिंबल
शिवसेना के इतिहास में सबसे बड़ी फूट 2022 में पड़ी, जब एकनाथ शिंदे ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत कर दी. उस समय उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे और शिंदे उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक माने जाते थे. बावजूद इसके, जून 2022 में शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के 40 विधायक अलग हो गए और BJP के साथ मिलकर नई सरकार बनाई. यह पार्टी के लिए बहुत बड़ा झटका था. यह बगावत सिर्फ कुछ नेताओं के पार्टी छोड़ने तक सीमित नहीं थी. इसका नतीजा यह हुआ कि शिवसेना दो भागों में बंट गई. इस टूट ने बालासाहब ठाकरे के वारिस उद्धव ठाकरे से पार्टी भी छीन ली और पार्टी सिंबल भी. मामला अदालत और चुनाव आयोग तक पहुंचा, तो शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना का दर्जा और पार्टी का चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ मिला. वहीं उद्धव ठाकरे को ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) यानी ‘शिवसेना (UBT) नाम से एक नया संगठन बनाना पड़ा और उन्हें नया चुनाव चिह्न ‘जलता हुआ मशाल’ (मशाल) मिला.

इसके पीछे भी कई कारण थे. एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायकों को लगता था कि उद्धव ठाकरे अपनी मूल हिंदुत्व की विचारधारा से हट गए हैं. बागी गुट ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और NCP के साथ गठबंधन करके शिवसेना अपने संस्थापक बालासाहब ठाकरे के एजेंडा और हिंदुत्व के सिद्धांतों से समझौता कर रही है. इसके अलावा शिवसेना के कई विधायकों ने आरोप लगाया कि अघाड़ी सरकार में उनके चुनाव क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए फंड नहीं दिया जा रहा है. कुछ ने आरोप लगाया कि सीएम उद्धव ठाकरे उनसे आसानी से नहीं मिलते और उनकी चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है.
6 सांसदों ने छोड़ा उद्धव का साथ
शिवसेना की सबसे हालिया टूट आज 22 जून, 2026 को हुई है. आज शिवसेना- यूबीटी के 9 में 6 लोकसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर शिंदे गुट का हाथ थाम लिया है. पार्टी में बगावत की हलचल पिछले कई दिनों से चल रही थी. आज सभी 6 सांसदों ने औपचारिक रूप से पार्टी छोड़ दी है और शिंदे गुट में शामिल होने का ऐलान किया है. इन छह बागी MPs ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को एक जॉइंट लेटर दिया है, जिसमें लोअर हाउस में एक अलग ग्रुप के तौर पर पहचान देने की मांग की गई है. पार्टी छोड़ने वाले सांसदों में संजय देशमुख (यवतमाल), संजय जाधव (परभणी), संजय दीना पाटिल (मुंबई नॉर्थ ईस्ट), नागेश पाटिल-आष्टीकर (हिंगोली), ओमप्रकाश राजेनिंबालकर (धाराशिव) और भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी शामिल हैं.
पार्टी में खलबली की शुरुआत 14 जून को मातोश्री में सांसदों की मीटिंग से हुई. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नौ में से सिर्फ पांच सांसद ही ऑनलाइन मीटिंग में शामिल हुए. मीटिंग के दौरान, उद्धव ठाकरे ने कथित तौर पर साफ-साफ कहा कि जो कोई भी पार्टी छोड़ना चाहता है, तो छोड़ सकता है. इस मैसेज ने पहले से ही अंसतुष्ट सांसदों को और नाराज कर दिया. इस पूरे दल-बदल के खेल को राजनीतिक गलियारों में बीजेपी का ‘ऑपरेशन टाइगर’ कहा जा रहा है. शिवसेना ने इस टूट को ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता कहा है. इससे पहले संजय राउत और अन्य नेताओं ने बीजेपी पर सांसदों को 50 लाख में खरीदने का आरोप लगाया था.
शिवसेना का इतिहास बताता है कि आंतरिक मतभेदों, नेतृत्व के झगड़ों और आखिर में विचारधारा से दूरी बनाने से पार्टी को ज्यादा नुकसान हुआ है. भुजबल, राणे, राज और शिंदे जैसे नेताओं की बगावत न केवल पार्टी की राजनीति पर असर डालती है, बल्कि महाराष्ट्र में सत्ता के समीकरण और राजनीतिक हालात को भी बदल देती है. अब देखना होगा कि उद्धव ठाकरे कैसे अपने बचे हुए नेताओं को पार्टी से बांधकर रखते हैं और पार्टी की सियासी ताकत मजबूत करते हैं.
उद्धव गुट के 6 बागी सांसद हुए शिवसेना में शामिल, एकनाथ शिंदे बोले- ऑपरेशन टाइगर सफल हुआ
