UP News : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने की कवायद तेज कर दी है. दलित, पिछड़ा और मुस्लिम वोटबैंक को लेकर चल रही राजनीतिक रणनीतियों के बीच मलिहाबाद का राजा कंसा पासी किला और मकबरा विवाद भी अब सियासी रंग लेता दिखाई दे रहा है. वहीं, दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी पुराने नेताओं की घर वापसी की तैयारी में जुटी है, जबकि भाजपा विपक्षी दलों की रणनीति को चुनावी हताशा करार दे रही है.
पासी समाज ने उठाई अपनी मांग
मलीहाबाद स्थित राजा कंसकंस पासी किला पासी किले और मकबरे को लेकर पिछले कुछ समय से विवाद जारी है. पासी समाज से जुड़े संगठनों का दावा है कि यह उनकी अपनी ऐतिहासिक विरासत है. इसे संरक्षित करना चाहिए. अब इसी मुद्दे को लेकर लाखन आर्मी के अध्यक्ष सूरज पासी ने समाजवादी पार्टी के दलित सांसद आरके चौधरी से सार्वजनिक रूप से मांग की है कि वे पासी समाज के नायक राजा कंसा पासी के सम्मान और किले के संरक्षण के लिए आवाज उठाएं.
हालांकि, इस दौरान आरके चौधरी की चुप्पी और राजा कंसा पासी के इतिहास पर स्पष्ट प्रतिक्रिया न दे पाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया. मौके पर हंगामे की स्थिति भी बनी. इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि सपा दलित और मुस्लिम वोटों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में, किसी भी विवादित सामाजिक मुद्दे पर खुलकर सामने आने से बच रही है.
सामाजिक मुद्दों पर बोलने से बच रही SP
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम वोटों के नए समीकरणों पर सभी दलों की नजर है. सपा पर आरोप लग रहे हैं कि वह मुस्लिम वोटबैंक को मजबूत बनाए रखने की रणनीति के तहत कुछ ऐसे मुद्दों पर खुलकर बोलने से बच रही है, जिनसे सामाजिक ध्रुवीकरण की आशंका हो सकती है.
ऐतिहासिक नायक के मुद्दे पर नहीं हो पा रहे मुखर
विपक्षी दलों और पासी समाज के कुछ संगठनों का आरोप है कि दलित समाज से आने वाले सांसद आरके चौधरी भी अपने ही समाज के ऐतिहासिक नायक के मुद्दे पर मुखर नहीं हो पा रहे हैं. हालांकि, सपा की ओर से इस मामले पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी भी 2027 की तैयारी में जुट गई है. पार्टी सुप्रीमो मायावती लगातार संगठनात्मक बैठकों में चुनावी तैयारी और सामाजिक आधार को मजबूत करने पर जोर दे रही हैं. सूत्रों के मुताबिक बसपा उन पुराने नेताओं को वापस लाने की रणनीति पर काम कर रही है, जिन्होंने पिछले वर्षों में पार्टी छोड़ी थी.
क्या बसपा को मिलेगी नई ऊर्जा?
पार्टी मानती है कि मजबूत सामाजिक आधार और क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले नेताओं की वापसी से संगठन को नई ऊर्जा मिल सकती है. आने वाले महीनों में कई चर्चित चेहरों की घर वापसी की संभावनाओं पर राजनीतिक हलकों की नजर रहेगी. भाजपा ने विपक्ष के आरोपों और राजनीतिक गतिविधियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. भाजपा प्रवक्ता हीरो वाजपेई ने कहा कि चुनाव से पहले नेताओं का एक दल से दूसरे दल में जाना और घर वापसी होना राजनीति में सामान्य प्रक्रिया है. उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी को आगामी चुनावों में अपनी स्थिति कमजोर होती दिखाई दे रही है, इसलिए वह इस तरह के मुद्दों को उछाल रही है.
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भाजपा का दावा है कि 2024 के बाद पार्टी ने संगठनात्मक रूप से खुद को और मजबूत किया है तथा विपक्षी गठबंधन लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना कर रहा है. भाजपा प्रवक्ता ने यह भी कहा कि विपक्ष में बढ़ती बेचैनी और चुनावी दबाव के कारण इस प्रकार के विवादों को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश की जा रही है.
दलित वोट रहा है हमेशा निर्णायक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है. बसपा की पारंपरिक ताकत इसी सामाजिक आधार पर टिकी रही है, जबकि सपा और भाजपा भी पिछले कुछ वर्षों में गैर-यादव पिछड़ों और दलित समुदायों में अपनी पैठ बढ़ाने का प्रयास करती रही हैं. 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. मलीहाबाद का राजा कंसा पासी किला विवाद अब दलित राजनीति का बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है. सपा पर दलित और मुस्लिम वोटबैंक के बीच संतुलन साधने के आरोप लग रहे हैं, तो बसपा पुराने नेताओं की घर वापसी के जरिए अपना जनाधार मजबूत करने में जुटी है. वहीं, भाजपा विपक्ष की रणनीति को चुनावी हताशा बता रही है.
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