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बच्चों में बढ़ रहा डायबिटीज का खतरा, स्वास्थ्य मंत्रालय ने पहली बार जारी की गाइडलाइंस

by Neha Singh 1 June 2026, 7:14 PM IST (Updated 1 June 2026, 7:26 PM IST)
1 June 2026, 7:14 PM IST (Updated 1 June 2026, 7:26 PM IST)
Diabetes in Children

Diabetes in Children: भारत को ‘डायबिटीज कैपिटल’ कहा जाता है, क्योंकि यहां पूरी दुनिया के 17 प्रतिशत डायबिटीज मरीज हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR-INDIAB) की हाल ही की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और लगभग 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज (डायबिटीज का शुरुआती स्टेज) के कगार पर हैं. दुनिया में डायबिटीज का हर पांचवां मरीज भारतीय है. पहले डायबिटीज सिर्फ बुजुर्गों या जवान लोगों को होता था, लेकिन अब इस गंभीर बीमारी ने बच्चों को भी चपेट में ले लिया है. बच्चों में बढ़ रहे डायबिटीज को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय ने पहली बार खास दिशा-निर्देश जारी किए हैं. सरकारी डेटा के मुताबिक, भारत में 5 से 9 साल के स्कूल जाने वाले 15.35% बच्चे और 10 से 19 साल के 16.18% किशोर प्री-डायबिटिक पाए गए हैं. इसका मतलब है कि देश में हर छह में से एक बच्चा डायबिटीज होने की कगार पर है. स्कूल जाने वाले लगभग 1% बच्चों और किशोरों को पहले से ही पूरी तरह से डायबिटीज हो चुकी है.

निर्देशों में पहली बार, बचपन में डायबिटीज की स्क्रीनिंग, डायग्नोसिस, इलाज और लंबे समय के मैनेजमेंट के लिए एक स्ट्रक्चर्ड और स्टैंडर्डाइज्ड नेशनल फ्रेमवर्क के बारे बताया गया है. इस डॉक्यूमेंट का मकसद जन्म से 18 साल तक के सभी बच्चों की यूनिवर्सल स्क्रीनिंग पक्का करना है, जिसमें कम्युनिटी और स्कूल-बेस्ड प्लेटफॉर्म के जरिए जल्दी पहचान हो. संदिग्ध मामलों में तुरंत ब्लड ग्लूकोज टेस्टिंग की जाएगी, जिसके बाद कन्फर्म डायग्नोसिस और इलाज के लिए समय पर डिस्ट्रिक्ट-लेवल हेल्थ फैसिलिटी में रेफर किया जाएगा. जल्दी पता लगाने में मदद करने के लिए “4Ts” अवेयरनेस फ्रेमवर्क पर काम किया जाएगा, जिससे माता-पिता, टीचर और देखभाल करने वाले टाइप 1 डायबिटीज के शुरुआती चेतावनी संकेतों को पहचान सकें. गाइडलाइंस में बच्चों में डायबिटीज के बढ़ते मामलों के कारणों, पहचान, टेस्टिंग, इलाज और मैनेजमेंट के बारे में पूरी जानकारी दी गई है.

बच्चों में डायबिटीज के प्रकार

टाइप 1 डायबिटीज

बच्चों में दो प्रकार की डायबिटीज पाई गई हैं- टाइप 1 और टाइप 2. टाइप-1 डायबिटीज (T1DM) एक ऑटोइम्यून कंडीशन है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम पैंक्रियास में इंसुलिन बनाने वाली बीटा सेल्स को टारगेट करके खत्म कर देता है. इंसुलिन की पूरी तरह कमी से सेल्स में ग्लूकोज का अब्जॉर्पशन कम हो जाता है, जिससे क्रोनिक हाइपरग्लाइसेमिया होता है. टाइप-1 डायबिटीज बच्चों में पाए जाने वाला डायबिटीज का सबसे आम प्रकार है, जो अक्सर 6 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू होता है.

T1DM के लिए रिस्क फैक्टर्स

  • टाइप-1 डायबिटीज की फैमिली हिस्ट्री
  • कुछ वायरल इन्फेक्शन (जैसे, जर्मन मीजल्स, कॉक्ससैकी, मम्प्स) जो ऑटोइम्यून रिस्पॉन्स को ट्रिगर कर सकते हैं
  • दूसरी ऑटोइम्यून कंडीशन का होना

टाइप 1 डायबिटीज के लक्षण

टाइप-1 डायबिटीज वाले बच्चों में आमतौर पर पॉलीयूरिया (बार-बार पेशाब आना), पॉलीडिप्सिया (बहुत ज़्यादा प्यास लगना), थकान या कमजोरी और बिना किसी वजह के वजन कम होना जैसे क्लासिकल लक्षण दिखते हैं. इन्हें 4T के तौर पर याद किया जा सकता है. सरकार ने 4T के बारे में जागरुकता फैलाने पर जोर दिया है. अगर आपके बच्चे में भी इनमें से कोई एक लक्षण दिखता है, तो तुरंत उसका टेस्ट करवाएं.

  • टॉयलेट (Toilet) : बार-बार पेशाब आना (पॉलीयूरिया) फिर से बिस्तर गीला करना
  • प्यासा (Thirst): बहुत ज्यादा प्यास लगना (पॉलीडिप्सिया)
  • थका हुआ (Tired): बिना किसी वजह के थकान और सुस्ती
  • पतला होना (Thinner): बिना किसी वजह के या अचानक वजन कम होना

टाइप 2 डायबिटीज

वैसे तो टाइप-1 डायबिटीज बचपन में ज्यादा आम है, लेकिन ट्रेंड बताते हैं कि बच्चों और किशोरों में टाइप-2 T2DM का फैलाव बढ़ रहा है, जिसकी मुख्य वजह मोटापा और सुस्त लाइफस्टाइल का बढ़ना है. टाइप-2 की पहचान इंसुलिन रेजिस्टेंस से होती है, जिसमें शरीर के सेल्स इंसुलिन पर ठीक से रिस्पॉन्ड नहीं करते और अक्सर समय के साथ इंसुलिन प्रोडक्शन में धीरे-धीरे कमी आती है. पेरिफेरल टिशू में इंसुलिन रेजिस्टेंस से हाइपरग्लाइसीमिया होता है, जो लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के रह सकता है.

बच्चों और किशोरों में प्री-डायबिटीज

प्री-डायबिटीज एक ऐसा स्टेज है जहां ब्लड ग्लूकोज लेवल नॉर्मल से ज्यादा होता है लेकिन डायबिटीज रेंज में नहीं आता है. प्री-डायबिटीज का जल्दी पता लगाने से T2DM और उससे जुड़ी दिक्कतों को शुरू होने से रोकने का मौका मिलता है. हालांकि प्री-डायबिटीज छोटे बच्चों को नहीं होता, लेकिन यह किशोरों में तेजी से देखा जा रहा है, खासकर उनमें जिन्हें मोटापा, अनहेल्दी खाने की आदतें, या डायबिटीज की फैमिली हिस्ट्री है. किसी बच्चे या किशोर को प्री-डायबिटिक तब माना जाता है जब लैबोरेटरी वैल्यू इन रेंज में आती हैं.

इम्पेयर्ड फास्टिंग ग्लूकोज (IFG): फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज 100-125 mg/dL
इम्पेयर्ड ग्लूकोज टॉलरेंस (IGT): 2 घंटे बाद ग्लूकोज वैल्यू 140-199 mg/dL
बढ़ा हुआ HbA1c (बॉर्डरलाइन रेंज): 5.7-6.4%

T2DM और प्री-डायबिटीज के संकेत और लक्षण

प्री-डायबिटीज में आमतौर पर कोई लक्षण दिखाई नहीं देता, लेकिन समय-समय टेस्ट करवाने से आप इसके बारे में पता कर सकते हैं. टाइप 2 के लक्षण टाइप 1 जैसे ही हो सकते हैं, जिसमें ज्यादा प्यास (पॉलीडिप्सिया), बार-बार पेशाब आना (पॉलीयूरिया), और बिना किसी वजह के वजन कम होना शामिल है. अक्सर बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज की शुरुआत इतनी धीमी और चुपचाप होती है कि बच्चे में बाहरी लक्षण नहीं दिखते हैं. बच्चा पूरी तरह से नॉर्मल और हेल्दी दिख सकता है, भले ही उसका ब्लड शुगर लेवल ज्यादा हो. जब बच्चे को हाइपरटेंशन, फैटी लिवर या PCOS जैसी दूसरी बीमारियां होती हैं, और डॉक्टर उनकी जांच करते हैं, तब छिपी हुई डायबिटीज का पता चलता है. किसी बच्चे को टाइप 2 डायबिटिक तब माना जाता है जब लैबोरेटरी वैल्यू इन रेंज में आती हैं.

  • फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज ≥ 126 mg/dL
  • खाने के दो घंटे बाद ब्लड ग्लूकोज ≥ 200 mg/dL
  • रैंडम ब्लड ग्लूकोज (RBG) ≥ 200 mg/dL
  • ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c) ≥ 6.5%

बच्चों और किशोरों में टाइप-2 और प्री-डायबिटीज के रिस्क फैक्टर

मोटापा या ज्यादा वजन: गलत लाइफस्टाइल के वजह से बच्चों को वजन भी बढ़ रहा है. मार्केट का अनहेल्दी पैक्ड फूड और गंदे तेल में बनाया हुआ खाना उनके शरीर में फैट बढ़ा देता है. यह फैट शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा करता है और शरीर इंसुलिन का इस्तेमाल नहीं कर पाता.

कम फिजिकल एक्टिविटी: आजकल बच्चे की पूरी दुनिया फोन में समा गई है. वे बाहर खेलने से ज्यादा वीडियो गेम खेलना पसंद करते हैं. दिनभर में स्कूल और घर में फोन में व्यस्त रहने से उनका शरीर एक्टिव नहीं रहता. जब शारीरिक काम कम होता है, तो शरीर में शुगर लेवल बढ़ने लगता है.

फैमिली हिस्ट्री (जेनेटिक्स): डायबिटीज का एक कारण जेनेटिक्स भी है. अगर माता-पिता या भाई-बहन में से किसी को टाइप 2 डायबिटीज है, तो बच्चों में इसका खतरा जेनेटिकली बढ़ जाता है.

जेस्टेशनल डायबिटीज की हिस्ट्री: जेस्टेशनल डायबिटीज प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को होने वाली डायबिटीज है, जो बच्चे के जन्म के बाद ठीक भी होती है. हालांकि, कुछ मामलों में गर्भ में बच्चे का मेटाबॉलिज्म बदल जाता है, जिससे भविष्य में डायबिटीज होने का खतरा रहता है.

दूसरी मेडिकल कंडीशन: PCOS की वजह से लड़कियों में हार्मोनल इम्बैलेंस होता है, जबकि हाइपरटेंशन (हाई ब्लड प्रेशर) और फैटी लिवर सीधे तौर पर खराब मेटाबॉलिज्म और इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़े होते हैं.

माता-पिता क्या करें

अपने बच्चों को डायबिटीज से दूर रखने के लिए माता-पिता को खास ध्यान देने की जरूरत है. माता-पिता को बच्चों के खान-पान और लाइफस्टाइल में बदलाव करना होगा. सबसे पहले तो बच्चे की डाइट पर रोक लगाएं. उन्हें कोल्ड ड्रिंक्स, पैक्ड फूड और आयली फूड खाने से रोकें. इसके साथ ही, बच्चों को रोजाना कम से कम 60 मिनट दौड़ने, साइकिल चलाने या आउटडोर स्पोर्ट्स खेलने के लिए बढ़ावा देना चाहिए ताकि उनका वजन मैनेज हो सके और इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर हो सके.

फिजिकल हेल्थ के साथ-साथ मेंटल और हार्मोनल बैलेंस के लिए, बच्चों का डेली रूटीन सही होना चाहिए, जिसमें 9 से 11 घंटे की गहरी नींद जरूरी है. आखिर में, माता-पिता को अपने बच्चे की हेल्थ पर करीब से नजर रखनी चाहिए. अगर उन्हें बिना किसी वजह के वजन कम होने और बहुत ज्यादा प्यास लगने जैसे लक्षण दिखें, तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए और अपना HbA1c और फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट करवाना चाहिए. डायबिटीज के इलाज में देरी करना शुगर लेवल को बढ़ा सकता है और भविष्य में इससे गंभीर समस्याएं हो सकती हैं.

गाइडलाइंस की जरूरी बातें

पूरे देश में एक जैसा इलाज: नई गाइडलाइंस में जन्म से 18 साल तक के बच्चों की स्क्रीनिंग पर जोर दिया गया है. शुरुआती स्क्रीनिंग स्कूलों और हेल्थ सेंटर्स पर की जाएगी. अगर किसी बच्चे में डायबिटीज के लक्षण दिखते हैं, तो तुरंत ब्लड शुगर टेस्ट किया जाएगा और अगर जरूरी हुआ, तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में रेफर किया जाएगा.

सरकारी हॉस्पिटल्स में फ्री इलाज मिलेगा: सरकार ने कहा है कि बच्चों को सरकारी हॉस्पिटल्स में डायबिटीज का फ्री इलाज मिलेगा. इसमें जरूरी टेस्ट, इंसुलिन, ग्लूकोमीटर, टेस्ट स्ट्रिप्स और रेगुलर चेकअप शामिल होंगे. इससे गरीब और मिडिल क्लास परिवारों को काफी राहत मिल सकती है, क्योंकि डायबिटीज का इलाज लंबे समय तक चलता है.

माता-पिता को मिलेगी ट्रेनिंग: नई गाइडलाइंस के मुताबिक, माता-पिता और देखभाल करने वालों के लिए ट्रेनिंग भी दी जाएगी ताकि वे इंसुलिन देना, शुगर लेवल चेक करना और इमरजेंसी को मैनेज करना सीख सकें. सरकार का मानना ​​है कि इससे बच्चों में डायबिटीज से होने वाली गंभीर दिक्कतों और मौतों को कम करने में मदद मिलेगी.

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News Source: Ministry of Health and Family Welfare

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