Home Latest News & Updates 2032 तक चांद पर रहेंगे इंसान, ISRO के साथ मिलकर NASA बनाएगा बस्तियां, जानें क्या है मून बेस प्रोग्राम

2032 तक चांद पर रहेंगे इंसान, ISRO के साथ मिलकर NASA बनाएगा बस्तियां, जानें क्या है मून बेस प्रोग्राम

by Neha Singh 21 August 2026, 4:26 PM IST (Updated 21 August 2026, 5:09 PM IST)
21 August 2026, 4:26 PM IST (Updated 21 August 2026, 5:09 PM IST)
NASA Moon Base Program

NASA Moon Base Program: बचपन में जब चांद को देखते थे तो लगता था काथ हम वहां जा पाते. आज विज्ञान और तकनीक इतना आगे बढ़ गए हैं कि चांद पर जाना नहीं, बल्कि वहां रहने की तैयारी की जा रही है. अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) इसके लिए काम कर रही है. NASA चांद पर ऐसी फैसिलिटी बना रही है, जहां अंतरिक्ष यात्री चांद की सतह पर रहकर लगातार काम कर सकें.

इस बड़े प्लान का नाम मून बेस प्रोग्राम है. खास बात यह है कि भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ISRO भी इस मिशन में अहम रोल निभा रही है. नासा ने इसरो को इस प्रोग्राम में मदद के लिए आमंत्रित किया है. भारत और US पहले से ही स्पेस सेक्टर में कई जरूरी प्रोजेक्ट्स पर मिलकर काम कर रहे हैं. इसलिए चांद पर इंसानी बस्तियां बसाने की कोशिश दोनों देशों के लिए साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी साबित हो सकती है. आसान भाषा में समझे कि मून बेस प्रोग्राम असल में क्या है, इंसान चांद पर कब तक जाकर रह पाएंगे और ISRO NASA के साथ कैसे काम कर सकता है?

क्या है NASA का मून बेस प्रोग्राम

इससे पहले भी वैज्ञानिक चांद पर जाते थे. वहां से कुछ सैंपल इकट्ठा करते थे और कुछ दिनों में वापस आ जाते थे. जैसा कि अपोलो मिशन में हुआ था. लेकिन मून बेस प्रोग्राम के तहत इंसान वहां सिर्फ कुछ दिनों के लिए नहीं, बल्कि वहां रहने और बसने के लिए जा रहा है. नासा का मून बेस प्रोग्राम चांद पर इंसानों का एक स्थायी शहर बनाने का प्रोजेक्ट है. जैसे पृथ्वी पर अंटार्कटिका के बर्फीले इलाके में भी वैज्ञानिक रिसर्च स्टेशन बनाकर वहां काम करते हैं, वैसे ही चांद पर एक ऐसा स्पेस स्टेशन बनाया जाएगा, जहां वैज्ञानिक रह सके और रिसर्च कर सके. नासा ने इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 24 मार्च 2026 को की थी, जिसके लिए 20 बिलियन डॉलर का ऐतिहासिक बजट दिया गया था.

नासा का बेस दक्षिणी ध्रुव (साउथ पोल) पर बनाया जाएगा. इसका कारण यह है कि- चांद के इस हिस्से में अरबों टन जमी हुई पानी की बर्फ है. इस बर्फ को पिघलाकर पीने का पानी, सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और रॉकेट फ्यूल के लिए हाइड्रोजन बनाया जा सकता है. यहां की कुछ पहाड़ियों पर लगभग हमेशा धूप रहती है, जिससे बेस को पावर देने के लिए सोलर एनर्जी बन सकती है. चांद पर इंसानों को जिंदा रखने और काम करने के लिए, NASA तीन खास चीजों पर काम कर रहा है. पहला है- स्पेशल कैप्सूल या घर, जो अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस के खतरनाक रेडिएशन और जानलेवा ठंड से बचाएंगे. दूसरा- चांद पर बिजली की कमी न हो, यह पक्का करने के लिए छोटे न्यूक्लियर पावर प्लांट और एडवांस्ड सोलर पैनल लगाए जाएंगे. अंतरिक्ष यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बंद गाड़ियां (जैसे स्पेस कार) दी जाएंगी, जिनमें वे बिना स्पेस सूट पहने घूम सकते हैं.

NASA Base Program

तीन चरणों में पूरा होगा काम

पहला चरण

नासा का मून बेस प्रोग्राम मिशन तीन चरणों में पूरा किया जाएगा, जो शुरू हो चुका है. मून बेस प्रोग्राम का पहला चरण अभी चल रहा है, जिसका मुख्य आधार आर्टेमिस मिशन है. पहले चरण का उद्देश्य चांद के दक्षिणी ध्रुव पर जमीन की जांच करना और बुनियादी तैयारियां करना है ताकि सबसे सुरक्षित जगह का पता लगाया जा सके. आर्टिमिस के अलग-अलग चरण इन्हीं कामों को पूरा कर रहे हैं. इस फेज में लगभग 25 रोबोटिक मिशन और चांद के साउथ पोल पर 21 लैंडिंग शामिल हैं.

अप्रैल 2026 में पूरे हुए आर्टेमिस II मिशन ने चांद पर इंसानों को ले जाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ओरियन कैप्सूल और SLS रॉकेट की सेफ्टी साबित कर दी है. इसके बाद आर्टेमिस III मिशन 2027 में होगा. यह लो अर्थ ऑर्बिट में स्पेसएक्स और ब्लू ओरिजिन के नए लूनर लैंडर्स की टेक्निकल सेफ्टी को टेस्ट करेगा. इसके बाद ऐतिहासिक आर्टेमिस IV (2028) मिशन एक बड़ा टर्निंग पॉइंट होगा, जब 50 से ज़्यादा सालों में पहली बार इंसान चांद की सतह पर सीधे उतरेगा. अतंरिक्ष यात्री चांत पर उतरकर पहला जमीनी सर्वे करेंगे.

दूसरा चरण

इसके बाद मून बेस प्रोग्राम का दूसरा चरण साल 2029 से 2032 तक चलेगा. इस चरण का मुख्य उद्देश्य हैवी पेलोड (लगभग 5 मीट्रिक टन की कैपेसिटी) वाले लैंडर्स की मदद से मून बेस के लिए जरूरी मशीनें और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना है. इस चरण में चांद पर शुरुआती पावर सिस्टम (सोलर और न्यूक्लियर पावर प्लांट), लंबी दूरी के लूनर व्हीकल ( चांद पर चलने वाली गाड़ियां) और कम्युनिकेशन सिस्टम लगाए जाएंगे. आर्टेमिस V और उसके बाद के मिशन पर अंतरिक्ष यात्री हर छह महीने में चांद पर जाएंगे ताकि पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर सेट अप किया जा सके. इस दौरान जापान स्पेस एजेंसी (JAXA) द्वारा तैयार किए जा रहे एक खास प्रेशराइज्ड रोवर को मून बेस स्टेशन पर ले जाया जाएगा.

तीसरा चरण

आखिर में मून बेस प्रोग्राम का तीसरा चरण 2032 से शुरू होगा. मून बेस को पूरी तरह से ऑपरेशनल और सेल्फ-सस्टेनिंग स्पेस रिसर्च सिटी (आउटपोस्ट) में बदल देगा. यहां 8 मीट्रिक टन से ज्यादा कैपेसिटी वाले बड़े लैंडर्स सीधे मून बेस पर स्थायी इंसानी सामान पहुंचाएंगे. वैज्ञानिक चांद की मिट्टी का इस्तेमाल करके निर्माण शुरू करेंगे और चांद की बर्फ से पानी और रॉकेट फ्यूल बनाने वाली फैक्ट्रियां पूरी तरह से ऑपरेशनल हो जाएंगी. इस आखिरी चरम में आर्टेमिस मिशन का रोल रेगुलर लॉजिस्टिक्स और पैसेंजर फ्लाइट्स में बदल जाएगा, जो वैज्ञानिकों को धरती से चांद के बेस तक ले जाएंगे. शुरुआत में अंतरिक्ष यात्री मून बेस पर एक साल तक रहना शुरू कर देंगे. इसके बाद नासा का मंगल मिशन शुरू हो जाएगा. मून सिटी आखिरकार NASA को मंगल ग्रह पर भविष्य के इंसानी मिशन के लिए तैयार होने में मदद करेगा.

मून बेस प्रोग्राम में भारत की भूमिका

NASA के मून बेस प्रोग्राम में ISRO की भूमिका बहुत जरूरी माना जाता है. अगस्त 2026 में बेंगलुरु में हुई इंडिया-US सिविल स्पेस जॉइंट वर्किंग ग्रुप मीटिंग के दौरान, NASA ने इस बड़े प्रोजेक्ट पर साथ काम करने के लिए ISRO को बुलाया था. भारत ने 2023 में आर्टेमिस समझौते पर साइन किए, जिससे चांद पर भविष्य के इंटरनेशनल मिशन में भारत के हिस्सा लेने का रास्ता पहले ही बन गया. मून बेस प्रोग्राम में भारत का सबसे बड़ा योगदान चांद के साउथ पोल का उसका अनुभव हो सकता है. चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग से भारत को इस क्षेत्र में काफी अनुभव मिला है. चांद की सतह, मिट्टी, तापमान और दूसरी स्थितियों के बारे में ISRO द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी NASA को बेस के लिए एक सुरक्षित और सही जगह चुनने में मदद कर सकती है.

भारत अपनी कम लागत वाली और भरोसेमंद स्पेस टेक्नोलॉजी के जरिए भी योगदान दे सकता है. ISRO बर्फ और पानी की खोज करने वाले रोबोट, सेंसर और रोवर जैसी टेक्नोलॉजी के डेवलपमेंट में साथ मिलकर काम कर सकता है. इससे चांद के साउथ पोल पर मौजूद संसाधनों को समझने और उनका इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा दोनों देशों के बीच साइंटिफिक डेटा और रिसर्च साझा करने से भारतीय वैज्ञानिकों को चांद की सतह, मिनरल और पर्यावरण पर नई स्टडीज से फायदा होगा.

NASA Base Program

भारत को क्या फायदा होगा

नासा के मून बेस प्रोग्राम में भारत एक्टिव रोल निभाता है, तो हमें बहुत फायदा होगा. इससे भारत के वैज्ञानिक ISRO के भविष्य के प्रोजेक्ट्स में कई एरिया में मदद कर सकते हैं. इससे न सिर्फ भारत को साइंटिफिक फायदे होंगे, बल्कि देश की स्पेस इंडस्ट्री और प्राइवेट स्पेस कंपनियों के लिए नए मौके भी उभर सकते हैं. सबसे बड़ा फायदा स्पेस इकॉनमी हो सकता है. मून बेस प्रोग्राम के लिए रोवर, सेंसर, कम्युनिकेशन इक्विपमेंट, सॉफ्टवेयर, सोलर पावर सिस्टम और दूसरे इक्विपमेंट की जरूरत होगी. ऐसे में भारतीय कंपनियां इस ग्लोबल मार्केट का हिस्सा बन सकती हैं. एक और फायदा मानव अंतरिक्ष मिशन में हो सकता है. भारत का गगनयान प्रोग्राम भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस में भेजने की दिशा में काम कर रहा है. मून बेस मिशन से मिला अनुभव इंसानी स्पेसफ्लाइट क्षमताओं को और मजबूत कर सकता है. इसके अलावा इंटरनेशनल स्पेस कोऑपरेशन में भारत की आवाज और असर बढ़ सकता है.

चांद की रेस में भारत की जगह

भारत के लिए चांद पर मून बेस बनाना अभी भी एक लंबा और मुश्किल लक्ष्य है. इसके लिए टेक्नोलॉजी, फंडिंग, इंटरनेशनल कोऑपरेशन और लॉन्ग-टर्म प्लानिंग की जरूरत होगी. हालांकि, भारत के पास एक मजबूत शुरुआत है. चंद्रयान-3 ने भारत को चांद के साउथ पोल के मुश्किल माहौल में काम करने का कीमती अनुभव दिया है. अगर भारत इस अनुभव को नई टेक्नोलॉजी, इंटरनेशनल पार्टनरशिप और प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री के साथ जोड़ता है, तो वह न केवल मून बेस का हिस्सा बनने की कोशिश करेगा, बल्कि इसके कंस्ट्रक्शन और ऑपरेशन में भी अहम योगदान दे सकता है. यह सब बताता है कि चांद सिर्फ आखिरी मंजिरल नहीं है, यह मंगल और उससे आगे की अंतरिक्ष यात्रा का पहला स्टॉप भी हो सकता है.

चांद पर रहेंगे इंसान! NASA बना रहा स्थायी आवास, 2036 तक पूरा होगा मूनबेस प्लान

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