‘वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है…’ पढ़ें दिल की गहराइयों में उतर जाने वाले मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर

'वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है...' पढ़ें दिल की गहराइयों में उतर जाने वाले मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर

15 Feb 2026

'वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है...' पढ़ें दिल की गहराइयों में उतर जाने वाले मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर.

फ़ुर्सत कि रात

जी ढूंडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानां किए हुए.

ख़ुदा की क़ुदरत

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं.

 बे-ख़ुदी 

 बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब',
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है.

ये जान झूट

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता.

कहाँ की दोस्ती 

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह,
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता.

वफ़ा की है उम्मीद

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है.

ज़माने में कोई 

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब',
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था.

जोश-ए-अश्क

'ग़ालिब' हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से,
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किए हुए.

मसाईल-ए-तसव्वुफ़

 ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब',
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता.

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