Standup Comedy: सोशल मीडिया पर इन दिनों स्टैंड-अप कॉमेडी को लेकर बड़ी बहस छिड़ी हुई है. वजह बनी कॉमेडियन प्राणित मोरे के शो की एक वायरल क्लिप. इस क्लिप ने लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर कॉमेडी और आपत्तिजनक कंमेंट्स के बीच की रेखा कहां खींची जानी चाहिए. दरअसल, मामला एक लाइव शो में हुई बातचीत से शुरू हुआ. शो में मौजूद एक लड़के ने अपनी डेटिंग एक्सपीरियंस का जिक्र करते हुए कहा कि उसने एक लड़की को 370 रुपये की बिरयानी खिलाई थी. इसके बदले में उसे कुछ तो वसूलना था. ये सुनकर वहां मौजूद लोग हंस पड़े और कॉमेडियन ने भी इसे मजाक की तरह ही लिया. लेकिन जैसे ही ये वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचा, रिएक्शन्स की बाढ़ आ गई. कई लोगों ने इसे लड़कियों को यूज करने की चीज़ की तरह देखने वाली मेंटालिटी की तरह लिया. इसके बाद सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग इतनी बढ़ी कि उस लड़के ने माफी मांगी, सोशल मीडिया अकाउंट बंद किया और बाद में उसकी नौकरी भी चली गई. प्राणित मोरे ने भी लोगों से माफी मांगते हुए कहा कि उन्हें उस कमेंट को चैलेंज करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. हालांकि, तब तक बहस काफी आगे बढ़ चुकी थी.
मेडिकल स्टूडेंट पर आया गुस्सा
इसी कंट्रोवर्सी के बीच एक और पुराना वीडियो सामने आया, जिसमें मेडिकल स्टूडेंट सेजल पवार डेड बॉडीज के बारे में मजाक करती नजर आईं. इस वीडियो पर भी लोगों ने सवाल उठाए. उनका कहना है कि अगर ऐसे कमेंट्स किसी लड़की के बारे में होते तो रिएक्शन्स कुछ और ही निकलते. खैर, बाद में सेजल ने भी माफी मांगी. लेकिन तब तक ट्रोलिंग सिर्फ इन दो वीडियो तक नहीं रही थी. अब सवाल पूरे कॉमेडी कल्चर पर उठने लगे हैं. कई फेमस कॉमेडियन्स ने भी इस बहस में हिस्सा लिया. कुछ का मानना था कि ऐसे मजाक सोसाइटी की सोच को दिखाती है. वहीं, कुछ ने कहा कि लड़कियों को अक्सर ईजी पंचलाइन बना दिया जाता है और यही सबसे बड़ी प्रोब्लम की जड़ है. देखा जाए तो, भारतीय स्टैंड-अप कॉमेडी में ये पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले समय रैना के शो में रणवीर इलाहाबादिया ने भी मज़ा की सारी सीमाएं पार कर दी थीं. पिछले कुछ सालों में कई कॉमेडी एक्ट्स और शोज लड़कियों, रिलेशनशिप्स और प्राइवेट लाइफ पर किए गए मजाकों को लेकर कंट्रोवर्सी में रहे हैं. अब कई लोगों का कहना है कि बार-बार एक ही तरह के सब्जेक्ट्स को कॉमेडी को बेस बनाना सोसाइटी में गलत चीज़ों को भी नॉर्मल बना देता है.

लाइव कॉमेडी शो
370 रुपये की बिरयानी वाली कंट्रोवर्सी ने ‘क्राउड वर्क’ यानी ऑडियन्स के साथ लाइव बातचीत वाली कॉमेडी पर भी फोकस ला दिया है. इस फॉर्मेट में कॉमेडियन ऑडियन्स के जवाबों पर एकदम से रिएक्शन देते हैं. यही इसकी खासियत है, लेकिन यही कॉन्सेप्ट इसका सबसे बड़ा रिस्क भी है. ऑडियन्स में बैठे लोग कुछ भी कह सकते हैं. ऐसे में स्टेज संभाल रहे आर्टिस्ट की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. वैसे भी, कॉमेडी सिर्फ चौंकाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने के लिए भी होती है. मजाक कंट्रोवर्शियल सब्जेक्ट्स पर हो सकता है, लेकिन उसके पीछे एक सोच और ह्यूमर का होना बहुत जरूरी है. यही वजह है कि आज बहस सिर्फ दो वायरल वीडियो की नहीं है. असली सवाल ये है कि क्या हंसी के नाम पर सब कुछ एक्सेप्ट किया जा सकता है, या फिर कुछ लिमिटेशन्स ऐसी हैं जिन्हें पार करने पर मजाक, मजाक नहीं रह जाता?
भारत में स्टैंड-अप की कहानी
आज स्टैंड-अप कॉमेडी दुनिया का सबसे पॉपुलर एंटरटेनमेंट फॉर्मेट बन चुका है. लेकिन इसकी शुरुआत कहां से हुई, इस बारे में ज्यादातर लोग जानते ही नहीं हैं. दरअसल, कभी भारत में कॉमेडी का मतलब फिल्मों में हीरो के करीबी दोस्त, टीवी पर आने वाले कॉमेडी शो या फिर कैसेट्स और सीडी पर रिकॉर्ड किए गए चुटकुले हुआ करते थे. लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. स्टैंड-अप कॉमेडी एक बड़ा बिजनेस बन चुका है, जहां कॉमेडियन अपने दम पर थिएटर भर रहे हैं, करोड़ों व्यूज बटोर रहे हैं और सोशल के साथ-साथ पॉलिटिकल मुद्दों पर खुलकर बात कर रहे हैं. लेकिन ये बदलाव रातोंरात नहीं आया. इसके पीछे लगभग दो दशकों की मेहनत, एक्सपेरिमेंट्स और लगातार बदलती ऑडियन्स की पसंद छिपी हुई है.
फिल्मों से हुई शुरुआत
2000 के दशक की शुरुआत तक भारत में कॉमेडी फिल्मों और टीवी तक ही लिमिटेड थी. हालांकि, हमारे कवि अपने कमेंट्स और कविताओं से सदियों से लोगों को एंटरटेन करते रहे हैं. मगर प्रोपर कॉमेडी की बात करें तो, पहले महमूद, जॉनी वॉकर और जॉनी लीवर जैसे कलाकार कॉमेडी के सबसे बड़े चेहरे थे. फिल्मों में उनका होना ही ऑडियन्स को हंसाने के लिए काफी होता था. दूसरी तरफ टीवी पर जसपाल भट्टी का शो खूब पॉपुलर हुआ. उनकी कॉमेडी आज भी याद की जाती है. उस टाइम लाइव स्टैंड-अप कॉमेडी का कोई बड़ा स्टेज नहीं था. कॉमेडियन छोटे प्रोग्राम, प्रेस क्लबों या कॉर्पोरेट इवेंट्स में परफॉर्म किया करते थे. आम जनता की तो, इस दुनिया तक पहुंच काफी लिमिटेड थी. वहीं, भारत में मॉर्डन स्टैंड-अप कॉमेडी का असली दौर साल 2008 से 2010 के बीच शुरू हुआ. इसी बीच वीर दास ने ‘वीर्डअस हैमेच्योर नाइट्स’ नाम से ओपन माइक शो शुरू किए. इस तरह के प्रोग्रामों ने नए टैलेंट को स्टेज दिया. फ्यूचर के कई बड़े कॉमेडियन पहली बार एक दूसरे से ऐसे ही मिले. तब स्टैंड-अप कॉमेडी अपने शुरुआती दौर में थी. लोग समझ नहीं पाते थे कि स्टेज पर अकेला खड़ा इंसान सिर्फ बातचीत और अपने किस्सों से भी ऑडियन्स को हंसा सकता है.

मुंबई में आया ‘द कॉमेडी स्टोर’
साल 2010 इंडियन स्टैंड-अप कॉमेडी के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ. तब ब्रिटेन की फेमस कॉमेडी कंपनी ‘द कॉमेडी स्टोर’ ने मुंबई में अपना स्टेज शुरू किया. शुरुआत में यहां सिर्फ विदेशी कॉमेडियन परफॉर्म किया करते थे, लेकिन बाद में भारत के लोगों के लिए भी ऑडिशन रखे गए. हालांकि, पहले ऑडिशन में इंडियन्स की सिचुएशन खास नहीं रही. कई लोग स्टैंड-अप कॉमेडी की जगह फिल्मी डायलॉग और शेक्सपीयर की लाइनें सुनाने पहुंच गए. फिर भी ये एक नई शुरुआत थी. भारतीय आर्टिस्ट्स को पहली बार इंटरनेशनल लेवल के कॉमेडियन्स के साथ स्टेज शेयर करने और उनसे सीखने का मौका मिला.
रसेल पीटर्स ने बदली सोच
भारत में स्टैंड-अप कॉमेडी को पॉपुल बनाने में कनाडा के कॉमेडियन रसेल पीटर्स का बड़ा हाथ है. दरअसल, 2004 और 2006 के उनके वीडियो इंटरनेट और कॉलेज नेटवर्क्स में तेजी से वायरल होने लगे. इंडियन यंगस्टर्स ने पहली बार देखा कि कोई आर्टिस्ट फैमिली, कल्चर, भाषा और डेली लाइफ पर मजाक करके भी सुपरस्टार बन सकता है. उनके शो ने यंगस्टर्स को ये यकीन दिलाया कि भारतीय एक्सपीरियंस भी कॉमेडी का सब्जेक्ट बन सकते हैं. वहीं, साल 2010 और 2011 को भारतीय स्टैंड-अप का ‘गोल्डन पीरियड’ कहा जा सकता है. इसी बीच कई ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने आगे चलकर इंडस्ट्री की पूरी दिशा ही बदल दी. रोशन जोशी, तन्मय भट्ट, आशीष शाक्य, अदिति मित्तल, वरुण ठाकुर, जाकिर खान, करुणेश तलवार और बाकी कलाकार इसी टाइम में स्टेज पर एक्टिव हुए. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों में रेगुलर ओपन माइक शुरू होने लगे. नए लोगों को हर हफ्ते परफॉर्म करने का मौका मिलने लगा.
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कॉमेडी ग्रुप्स
2012 में भारतीय कॉमेडी ने एक और बड़ा कदम उठाया. कॉमेडियन्स ने फील किया कि अकेले स्ट्रगल करने की बजाय ग्रुप बनाकर काम करना ज्यादा अच्छा होगा. यहीं से कई फेमस कॉमेडी कलेक्टिव्स का जन्म हुआ. ऑल इंडिया बकचोद (AIB), ईस्ट इंडिया कॉमेडी (EIC) और शिट्ज़ेनगिगल्स (SnG) जैसे ग्रुप्स ने भारतीय कॉमेडी को नई पहचान दी. इन टीमों ने लाइव शो के साथ-साथ यूट्यूब पर भी शानदार कंटेंट बनाना शुरू किया. धीरे-धीरे लाखों लोग इन्हें फॉलो करने लगे. वैसे, ये बात पूरी तरह से सही है कि, अगर किसी एक चीज ने भारतीय स्टैंड-अप को घर-घर पहुंचाया, तो वो यूट्यूब था. AIB के स्केच वीडियो, EIC की सोशल कॉमेडी और बाद में कनन गिल और बिस्वा कल्याण रथ के मूवी रिव्यू जैसी सीरीज इंटरनेट पर जबरदस्त हिट हुईं. तब लोगों को पहली बार लगा कि कॉमेडी सिर्फ टीवी चैनलों तक लिमिटेड नहीं है. यानी अब कोई भी अपने मोबाइल कैमरे से वीडियो बनाकर लाखों लोगों तक पहुंच सकता है.

फीमेल कॉमेडियन्स
हालांकि, शुरुआत में स्टैंड-अप कॉमेडी में मेल यानी पुरुषों का दबदबा था. मगर धीरे-धीरे फीमेल आर्टिस्ट्स ने भी इस इंडस्ट्री में अपनी जगह बनानी शुरू की. अदिति मित्तल, नीति पाल्टा और बाद में कई फीमेल कॉमेडियन्स ने स्टेज पर अपनी अलग पहचान बनाई. उन्होंने लड़कियों के एक्सपीरियंस, सोशल एक्सपेक्टेशन्स और रिलेशनशिप्स पर खुलकर बात की, जिससे कॉमेडी का दायरा और बड़ा हुआ. फिर साल 2013 और 2014 आते-आते स्टैंड-अप कॉमेडी इंडियन पॉप कल्चर का हिस्सा बन चुकी थी. टिकट वाले शो हाउसफुल होने लगे, कॉमेडियन टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर छाने लगे और ब्रांड्स भी उन्हें बड़े लेवल पर सपोर्ट करने लगे. इसी दौर में कपिल शर्मा का टीवी शो भी बड़ा सक्सेसफुल रहा. दूसरी तरफ डिजिटल कॉमेडियन नई जेनेरेशन के फेवरेट बन रहे थे.
आगे का रास्ता
आज भारतीय स्टैंड-अप कॉमेडी सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट बन चुकी है. ये सोसाइटी, पॉलिटिक्स, रिलेशनशिप्स, जॉब, फैमिली और डेली लाइफ की परेशानियों पर बात करती है. फिल्मों के कॉमिक कैरेक्टर्स से शुरू हुआ ये सफर अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, इंटरनेशनल टूर और करोड़ों ऑडियन्स तक पहुंच चुका है. ऐसे में पिछले 15 सालों का इतिहास देखा जाए, तो ये कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय स्टैंड-अप कॉमेडी की सबसे दिलचस्प कहानियां शायद अभी लिखी जानी बाकी हैं. लेकिन सवाल अब भी वही हैं कि क्या, सारी हदों को पार कर जाना ही मज़ाक रह गया है? क्या अब मज़ाक का हवाला देकर कोई भी किसी के सम्मान के साथ खेल सकता है? क्या सामने वाली की बेइज्जती किए बिना ह्यूमर नहीं निकल सकता? क्या कुछ लोगों को हंसाने के लिए कुछ लोगों को ऑब्जेक्टिफाई करना जरूरी है? क्या अब क्रिएटिविटी के नाम पर गाली-गलौज करना ही कॉमेडी रह गई है? क्या लड़कियों पर भद्दे कमेंट्स और जोक्स पास करना अब नॉर्मल हो गया है? ऐसे कई सवाल आज उठ रहे हैं, जिनके जवाब मिलने बहुत ज्यादा जरूरी हो गए हैं. वैसे, ये सवाल दोनों तरफ के लोगों से होने चाहिएं, स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर इन चीज़ों को परोसने वालों से भी और उस ऑडियन्स से भी, जो वहां बैठकर तालियां बजाती है.
