Home मनोरंजन सिर्फ घड़ी बनाने की कहानी नहीं, बल्कि सपनों और टाटा की विरासत को सलाम करती है Made in India: A Titan Story

सिर्फ घड़ी बनाने की कहानी नहीं, बल्कि सपनों और टाटा की विरासत को सलाम करती है Made in India: A Titan Story

by Preeti Pal 4 June 2026, 4:06 PM IST (Updated 4 June 2026, 4:10 PM IST)
4 June 2026, 4:06 PM IST (Updated 4 June 2026, 4:10 PM IST)
सिर्फ घड़ी बनाने की कहानी नहीं, बल्कि सपनों और टाटा की विरासत को सलाम करती है Made in India: A Titan Story

Made in India: A Titan Story Review: भारत में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने टाइटन का नाम न सुना हो. आज जब किसी भारतीय के हाथ में टाइटन की घड़ी दिखाई देती है, तो वो सिर्फ टाइम देखने के लिए ही नहीं होती. उस घड़ी के साथ जुड़ा होता है एक ब्रांड का भरोसा, टाटा ग्रुप की प्रेस्टीज और एक ऐसे सपने की कहानी जिसने भारत के कॉर्पोरेट इतिहास को बदलकर रख दिया. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि टाइटन जैसी वर्ल्ड क्लास कंपनी आखिर बनी कैसे? दरअसल, इसी सवाल का जवाब देती है अमेजन प्राइम वीडियो की नई वेब सीरीज ‘मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी’. ये कहानी है एक सपने की, एक ऐसी सोच की जिसने भारत के लोगों को सिर्फ घड़ियां पहनना नहीं सिखाया, बल्कि दुनिया को ये भी दिखाया कि भारतीय कंपनियां भी वर्ल्ड लेवल का ब्रांड बना सकती हैं.

दमदार एक्टिंग

सीरीज में जिम सर्भ ने टाइटन के फाउंडर विजनरी ज़ेरेक्सेस देसाई का रोल निभाया है. वहीं, नसीरुद्दीन शाह भारत के महान बिजनेसमैन जेआरडी टाटा के कैरेक्टर में नजर आ रहे हैं. दोनों की एक्टिंग इस कहानी को सिर्फ एक बिजनेस ड्रामा नहीं रहने देती, बल्कि इसे एक इमोशनल एक्सपीरियंस में बदल देती है. वैसे भी, अमेजन प्राइम वीडियो की ये सीरीज सिर्फ टाइटन की सक्सेस की कहानी नहीं बताती, बल्कि उस दौर की भी झलक दिखाती है जब भारत लाइसेंस राज, लिमिटेड टेक्निक और फॉरेन कंपनियों के दबदबे से जूझ रहा था. उस टाइम किसी भारतीय कंपनी का वर्ल्ड क्लास वॉच ब्रांड बनाने का सपना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी लगता था.

कुछ ऐसे हुई शुरुआत

टाइटन की शुरुआत साल 1984 में हुई थी. ये टाटा ग्रुप और तमिलनाडु इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (TIDCO) का जॉइंट वेंचर था. हालांकि, इस ब्रांड की कहानी इससे कई साल पहले शुरू हो चुकी थी. दरअसल, साल 1977 में ज़ेरेक्सेस देसाई को एक आइडिया मिला कि भारत में घड़ियों की बड़े लेवल पर डिमांड होती है. 1970 और 80 के दशक में इंडियन मार्केट में घड़ियों की डिमांड तेजी से बढ़ रही थी. उस टाइम ज्यादातर अच्छी क्वालिटी की घड़ियां विदेशों से ही आती थीं. इतना ही नहीं इनकी स्मग्लिंग भी होती थी. ऐसे में भारत के लोग एक ऐसी घड़ी चाहते थे जो स्टाइलिश हो, भरोसेमंद हो और भारतीय पहचान भी रखती हो. उनकी इसी जरूरत को सबसे पहले समझा ज़ेरेक्सेस देसाई ने. वैसे, उस टाइम इस बिजनेस के बारे में सोचना ही, बहुत बड़ी बात थी. यही वजह है कि लगभग 10 सालों की मेहनत और काफी स्ट्रगल के बाद टाइटन ब्रांड की शुरुआत हुई. अमेजन की ये नई वेब सीरीज इसी सपने की शुरुआत से ऑडियन्स को जोड़ती है. जिम सर्भ का कैरेक्टर ज़ेरेक्सेस देसाई सिर्फ एक कॉर्पोरेट ऑफिसर नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह सामने आता है जो मानता है कि भारतीय सिर्फ बड़े और महंगे प्रोडक्ट्स खरीद नहीं सकते, बल्कि उन्हें बना भी सकते हैं.

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आखिर कौन थे ज़ेरेक्सेस देसाई?

भारत में टाइटन का नाम सुनते ही सबसे पहले जिस इंसान को याद किया जाना चाहिए, वो हैं ज़ेरेक्सेस देसाई. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाले देसाई साल 1960 के दशक में टाटा ग्रुप से जुड़े थे. टाटा के साथ मिलकर उन्होंने होटल बिजनेस से लेकर प्रेस सेक्टर तक कई बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं. लेकिन उनका सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन टाइटन और बाद में तनिष्क जैसे बड़े ब्रांड्स को खड़ा करने में रहा. सीरीज की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये देसाई को किसी बिजनेस हीरो की तरह नहीं दिखाती. वो भी गलतियां करते हैं, स्ट्रगल करते हैं, फेलियर से घबराते हैं, लेकिन हार नहीं मानते.

भरोसे का दूसरा नाम टाटा

अगर टाइटन का सपना ज़ेरेक्सेस देसाई ने देखा, तो उसमें जान फूंकने का काम जेआरडी टाटा ने किया. नसीरुद्दीन शाह ने जेआरडी टाटा के कैरेक्टर को इतने बेहतरीन अंदाज़ और सादगी के साथ निभाया है कि कई सीन्स लंबे टाइम तक याद रह जाते हैं. सीरीज में एक बड़ा खास और इमोशनल मूमेंट आता है, जब जेआरडी टाटा फॉरेन ब्रांड की घड़ी पहनने से इनकार कर देते हैं. उनका भरोसा क्लियर था कि, जब तक हम खुद अपनी घड़ी नहीं बना लेते, तब तक घड़ी ही नहीं पहनेंगे. उन्हें पूरा यकीन था कि भारत अपनी घड़ी बना सकता है और दुनिया की बेस्ट लग्जरी घड़ियों से कंपटीशन भी कर सकता है. उसके बाद जेरेक्सेस देसाई और उनके साथियों ने भी घड़ी पहनना बंद कर दिया. टाटा का यही भरोसा देसाई और उनकी टीम के लिए सबसे बड़ी ताकत बनता है.

एक भारतीय की जिद

1980 के दशक में घड़ी बिजनेस पर बड़े लेवल पर स्विस और जापानी कंपनियों का दबदबा था. उन दिनों भारत में एचएमटी जैसी सरकारी कंपनी मौजूद थी, लेकिन मॉर्डन क्वार्ट्ज टेक्निक और डिज़ाइन के मामले में दुनिया हमसे काफी आगे निकल चुकी थी. जब टाटा ग्रुप ने घड़ियों के बिजनेस में अपना नाम बनाने की प्लानिंग की, तो कई फॉरेन एक्सपर्ट्स को ये बात रास नहीं आई. कुछ लोगों का मानना था कि भारत के पास न टेक्निक है, न एक्सपीरियंस और न ही ऐसी कंज्यूमर मार्केट जो प्रीमियम घड़ियों को एक्सेप्ट कर सके. कुछ हद तक वो सही भी थे.

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सक्सेस की कहानी

टाइटन ने तमिलनाडु के होसुर में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू की. उस टाइम ये भारत का सबसा मॉर्डन वॉच मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स में से एक था. तब टाइटन ने सिर्फ फैक्ट्री नहीं बनाई, बल्कि वर्कर्स के लिए टाउनशिप, ट्रेनिंग सेंटर और मॉर्डन वर्क कल्चर की भी शुरुआत की. ज़ेरेक्सेस देसाई का मानना था कि बड़ा और महान ब्रांड, महान लोगों के साथ ही बनाया जाता है. यही सोच सीरीज में बार-बार दिखाई देती है, जहां देसाई कहते हैं कि प्रोसेस से ज्यादा जरूरी होते हैं लोग, क्योंकि वही प्रोसेस को सक्सेसफुल बनाते हैं. खैर, आज के यंगस्टर्स शायद ये इमेजिन भी नहीं कर सकते कि एक टाइम ऐसा था जब घड़ी सिर्फ टाइम बताने का जरिया मानी जाती थी. लेकिन टाइटन कंपनी ने पहली बार भारतीयों को ये अहसास कराया कि घड़ी फैशन स्टेटमेंट भी हो सकती है. खूबसूरत डिज़ाइन, अट्रैक्टिव पैकेजिंग और इमोशनल विज्ञापनों ने टाइटन को एक लाइफस्टाइल ब्रांड बना दिया. टाइटन की फेमस धुन आज भी भारतीय एड हिस्ट्री के सबसे यादगार कैंपेंस में गिने जाते हैं.

कई बड़े ब्रांड्स की जन्मदाता

वैसे, टाइटन की सक्सेस सिर्फ घड़ियों तक लिमिटेड नहीं रही. साल 1994 में कंपनी ने जूलरी बिजनेस में कदम रखा और तब पैदा हुए तनिष्क नाम का ब्रांड. हालांकि, इसकी शुरुआत भी टाइटन की तरह आसान नहीं थी. लेकिन आज तनिष्क भारत के सबसे बड़े और सबसे भरोसेमंद जूलरी ब्रांड्स में शामिल है. इसके बाद कंपनी ने फास्ट्रैक, सोनाटा, टाइटन आईप्लस, स्किन, मिया, जोया और तनीरा जैसे कई सक्सेसफुल ब्रांड लॉन्च किए. आज टाइटन 2000 से ज्यादा स्टोर्स के नेटवर्क और ह्यूज लाइफस्टाइल पोर्टफोलियो के साथ भारत की सबसे बड़ी कंज्यूमर ब्रांड कंपनियों में गिनी जाती है. टाइटन आज सिर्फ एक इंडियन ब्रांड नहीं रह गया है. आज इसे दुनिया की सबसे बड़ी वॉच मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों में गिना जाता है. इसके प्रोडक्ट्स 40 से ज्यादा देशों में पहुंच चुके हैं. हाल के सालों में कंपनी ने प्रीमियम और लक्जरी वॉच सेगमेंट में भी कदम बढ़ाया है. ये अचीवमेंट उस दौर को देखते हुए और भी बड़ी लगती है, जब विदेशी कंपनियां भारत की काबिलियत पर सवाल उठा रही थीं.

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एक्टिंग ने डाली जान

‘मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी’ की कहानी अपने आम में काफी दमदार है, लेकिन जिम सर्भ इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत हैं. उन्होंने ज़ेरेक्सेस देसाई की पर्सनालिटी को पूरी तरह समझा और उसे शानदार तरीके से पर्दे पर उतारा. उनका कैरेक्टर एक ही साथ सेंसिटिव भी है, एंबिशियस भी है और जिद्दी भी. दूसरी तरफ, नसीरुद्दीन शाह ने जेआरडी टाटा के रोल में जान डाल दी. वो कम डायलॉग के बावजूद स्क्रीन पर गहरी छाप छोड़ते हैं. इन दोनों के अलावा कावेरी सेठ, वैभव तत्ववादी और नमिता दुबे भी अपने-अपने कैरेक्टर्स में खूब जमे हैं. बात करें डायरेक्शन और सिनेमेटोग्राफी की तो, इस सीरीज को रॉबी ग्रेवाल ने डायरेक्ट किया है. उनका सबसे बड़ा कमाल ये है कि उन्होंने एक कॉर्पोरेट कहानी को ह्यूमन स्टोरी बना दिया. बोर्डरूम मीटिंग्स, बिजनेस प्रेजेंटेशन और फैक्ट्री डिस्कशन्स को भी उन्होंने इतना गजब का बना दिया है कि ऑडियन्स लगातार कहानी से जुड़ी रहती है. 1980 के दशक का माहौल, ऑफिस, कपड़े, गाड़ियां और पुराने ज़माने के गाने इस वेब सीरीज को और शानदार बनाते हैं.

क्या हैं कमियां?

‘मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी’ लगभग हर मोर्चे पर इम्पेक्ट क्रिएट करती है, लेकिन कुछ एपिसोड्स की स्पीड लोगों को थोड़ी स्लो लग सकती है. हालांकि, जिस दौर की ये कहानी है, उस हिसाब से देखें तो, ये स्लो स्पीड बुरी नहीं लगती. कुछ सपोर्टिंग कैरेक्टर्स को और डिटेल्स मिल सकती थी. वहीं, टाइटन को खड़ा करने में आई कई रियल मुश्किलों को थोड़ा और अच्छी तरह से दिखाया जा सकता था. हालांकि, ये कमियां पूरी कहानी के इम्पेक्ट को कम नहीं करतीं. इसलिए इन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल नहीं है. ये कहना गलत नहीं है कि, ‘मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी’ उन चुनिंदा इंडियन वेब सीरीज में शामिल है जो एंटरटेनमेंट के साथ-साथ इंस्पिरेशन भी देती हैं. ये शो हमें याद दिलाता है कि महान कंपनियां सिर्फ प्रोफिट से नहीं बनतीं, बल्कि लॉन्ग विजन, हिम्मत और भरोसे से बनती हैं. ये सीरीज देखने के बाद आप टाइटन की घड़ी को शायद पहले जैसी नजर से नहीं देख पाएंगे. आपको उसके पीछे छिपे हजारों वर्कर्स की मेहनत, जेआरडी टाटा का भरोसा और ज़ेरेक्सेस देसाई का वो सपना याद आएगा जिसने भारत को दुनिया के सामने सम्मान के साथ खड़ा कर दिया. शायद यही इस वेब सीरीज की सबसे बड़ी जीत है, कि ये टाइटन की कहानी सुनाते-सुनाते भारत की कहानी भी कह जाती है.

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