Suman Kalyanpur: “रहें ना रहें हम, महका करेंगे… बनके कली, बनके सबा, बाग़-ए-वफ़ा में…” म्यूज़िक की दुनिया में कुछ आवाज़ें कभी ख़ामोश नहीं होतीं. वो अपने गानों के जरिए पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में जिंदा रहती हैं. हिंदी सिनेमा की ऐसी ही खूबसूरत आवाज़ थी सुमन कल्याणपुर की. शायद अपने इसी गाने के साथ सुमन कल्याणपुर ने बरसों पहले ही अपनी विरासत का ऐलान कर दिया था. अपने पीछे 740 से ज्यादा गीतों की विरासत छोड़कर वो भले ही इस दुनिया से विदा हो गई हों, लेकिन उनके सुर हमेशा महकते रहेंगे. उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास थी कि कई बार लोग उन्हें लता मंगेशकर समझ बैठते थे, लेकिन सुमन ने इतनी बड़ी म्यूज़िक इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान और मुकाम खुद बनाया. हालांकि, अब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और म्यूज़िक की दुनिया ने उस मधुर आवाज़ को खो दिया है, जिसने दशकों तक अपने सुरों से लोगों का दिल जीता. 28 जनवरी, 1937 को पैदा हुईं सुमन कल्याणपुर ने 31 मई, 2026 को अपनी अंतिम सांस ली. उनका नाम हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा सिंगर्स में शामिल है, जिन्होंने अपनी आवाज़ से एक अलग पहचान बनाई. फिर भले ही उनकी आवाज़ को अक्सर लता मंगेशकर से कंपेयर किया जाता रहा हो.

ढाका से मुंबई तक का सफर
सुमन कल्याणपुर का जन्म उस जमाने में हुआ जब भारत ब्रिटिशों का गुलाम था. भारत के ढाका में सुमन हेम्माडी ने जन्म लिया. उनके पिता शंकर राव हेम्माडी कर्नाटक के उडुपी जिले के एक सारस्वत ब्राह्मण फैमिली से थे. वो तब सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में एक हाई पोस्ट पर काम करते थे. परिवार में 6 बहन-भाई थे और सुमन उनमें से सबसे बड़ी थीं. साल 1943 में उनका परिवार मुंबई आ गया. यहीं से उनकी लाइफ पूरी तरह बदल गई. बचपन से ही सुमन को म्यूज़िक और फिल्में, दोनों में ही अच्छी-खासी दिलचस्पी थी. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मुंबई के बड़े और फेमस सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में पेंटिंग की पढ़ाई शुरू की. हालांकि, सुमन की लाइफ में म्यूज़िक के लिए इतना प्यार था कि, उन्होंने पेंटिंग के साथ-साथ क्लासिकल सिंगिंग की भी ट्रेनिंग शुरू कर दी.
शौक बन गया लाइफ
सुमन ने शुरुआत में म्यूज़िक को सिर्फ एक शौक की तरह फॉलो किया था. लेकिन धीरे-धीरे यही शौक उनकी लाइफ का सबसे बड़ा जुनून बन गया. इसके बाद उन्होंने पंडित केशव राव भोले, उस्ताद अब्दुल रहमान खान, गुरु यशवंत देव और गुरुजी मास्टर नवरंग जैसे दिग्गज गुरुओं से म्यूज़िक की बारीकियां सीखीं. दिलचस्प बात ये है कि उस दौर में उनकी फैमिली में आर्ट और म्यूज़िक को पसंद तो किया जाता था, लेकिन किसी को पब्लिक स्टेज पर परफॉर्म करने की परमिशन नहीं थी. इसके बावजूद सुमन ने साल 1952 में ऑल इंडिया रेडियो के लिए गाने का ऑफर एक्सेप्ट कर लिया. यही उनकी पहली पब्लिक परफॉर्मेंस थी और यहीं से उनके म्यूज़िक करियर की शुरुआत भी हुई. गुरु यशवंत देव ने ही मराठी फ़िल्म शुक्राची चांदनी में उन्हें प हली बार गाने का मौका दिलवाया.

पहला ब्रेक
सुमन का पहला गाना मराठी फिल्म “शुक्राची चांदणी” के लिए रिकॉर्ड हुआ, जो साल 1953 में रिलीज हुई. उनकी आवाज़ ने लोगों का ध्यान खींचा. लोगों को उनकी आवाज़ इतनी पसंद आई कि, उन्हें जल्द ही हिंदी फिल्मों में गाने का मौका भी मिल गया.मोहम्मद रफी ने सुमन की आवाज़ को पहचाना और उन्होंने साल 1954 में रिलीज हुई फिल्म “मंगू” में गाने का मौका दिया. इसी फिल्म के साथ सुमन कल्याणपुर ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा. हालांकि कई लोग फिल्म “दरवाजा” को उनकी पहली हिंदी फिल्म मानते हैं. दरअसल, “दरवाजा” मंगू से पहले रिलीज हुई थी. खैर, इस फिल्म में उन्होंने फेमस म्यूजिशियन नौशाद के डायरेक्शन में कई खूबसूरत गाने गाए. उस वक्त सुमन की उम्र सिर्फ 17 साल थी. सब कुछ ठीक चल रहा था, सुमन के सपने सच होने ही वाले थे कि, फिर किस्मत ने झपट्टा मारा. फिल्म के बीच में ही मेकर्स ने म्यूजिशियन को बदल लिया. अब नौशाद की जगह ओपी नय्यर ने ले ली थी. ओपी को गीता दत्त, आशा भोंसले और शमशाद की मोटी आवाज ज्यादा पसंद थी. यही वजह है कि उन्होंने सुमन का सिर्फ एक गाना ही फिल्म में रखा-कोई पुकारे धीरे से तुझे. लेकिन सुमन और नौशाद, दोनों ने ही हार नहीं मानी. उसी साल नाशाद के डायरेक्शन में फ़िल्म दरवाजा के लिए सुमन ने 5 गाने गाए और फिल्म इंडस्ट्री में अपने पैर मजबूती से जमा लिए. तब तक वो सुमन हेमाड़ी थी. फिर मुंबई के बिजनेसमैन रामानंद कल्याणपुर से शादी के बाद वो सुमन कल्याणपुर हो गईं.
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तलत महमूद का साथ
सुमन कल्याणपुर के करियर में बड़ा मोड़ तब आया जब वो उस ज़माने के फेमस सिंगर तलत महमूद से मिलीं. एक म्यूज़िक फेस्टिवल में तलत ने सुमन की आवाज़ सुनी. उन्हें सुमन की आवाज बहुत पसंद आई. उनसे इम्प्रेस होकर तलत महमूद ने उनके साथ गाना गाने के लिए हांमी भर दी. उस टाइम किसी नए आर्टिस्ट के लिए ये बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. यहीं से फिल्म इंडस्ट्री का ध्यान सुमन कल्याणपुर की तरफ गया और उनका करियर तेजी से आगे बढ़ने लगा. फिर 1960 और 1970 के दशक में सुमन कल्याणपुर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे पॉपुलर सिंगर्स में शामिल हो गईं. उन्होंने हिंदी के अलावा बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, उड़िया, असमिया, कन्नड़ के साथ-साथ कई और भाषाओं में भी गाने गाए. आज उनके खाते में 740 से ज्यादा फिल्मी और नॉन फिल्मी गाने दर्ज हैं. उन्होंने उस दौर के लगभग सभी बड़े म्यूज़िक डायरेक्टर्स के साथ काम किया, जिनमें शंकर जयकिशन, मदन मोहन,एस. डी. बर्मन, हेमंत कुमार और लक्ष्मीकांत जैसे बड़े नाम शामिल हैं.

मोहम्मद रफी संग जोड़ी
एक टाइम था जब एचएमवी ने 50 लव सॉन्ग्स के 4 कैसेट्स रिलीज़ किए थे. उनमें से 7 गाने सुमन के ही गाए हुए थे. उनकी आवाज़ करोड़ों लोगों तक पहुंच रही थी, उनके गाने सुपरहिट हो रहे थे, लेकिन हैरानी की बात ये थी कि जिन कैसेट कवर्स पर दूसरे आर्टिस्ट्स की तस्वीरें चमकती थीं, वहां सुमन का चेहरा शायद ही कभी दिखाई देता था. मानो किसी टूरिस्ट के हाथ में टिकट तो है, लेकिन फिर भी उसे बीच रास्ते बस से उतार दिया जाए. हालांकि किस्मत ने उनके लिए एक सुनहरा मोड़ भी संभालकर रखा था. 1960 के दशक के आखिर और 1970 के शुरुआती सालों में जब गानों की रॉयल्टी को लेकर मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के बीच प्रॉब्लम चल रही थी और दोनों ने साथ गाना बंद कर दिया, तब सुमन कल्याणपुर के लिए नए दरवाजे खुले. म्यूज़िक डायरेक्टर्स को मोहम्मद रफी के साथ नई आवाज़ की जरूरत थी और सुमन से अच्छी आवाज़ उन्हें कहा मिलती.
सुमन कल्याणपुर की जोड़ी सबसे ज्यादा पसंद की गई मोहम्मद रफी के साथ. दोनों ने 140 से ज्यादा गाने साथ में गाए, जो आज भी म्यूज़िक लवर्स की प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं. कुछ टाइम के लिए ऐसा लगा कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सुमन कल्याणपुर का सितारा पूरे शबाब पर है. उनकी आवाज़ रेडियो से लेकर महफिलों तक में गूंजने लगी थी. लेकिन ये सुनहरा दौर ज्यादा लंबा नहीं चला. जैसे ही रफी और लता के बीच सुलह हुई और दोनों ने फिर से साथ गाना शुरू किया, फिल्म इंडस्ट्री का नज़रियां भी बदल गया. धीरे-धीरे सुमन के हिस्से आने वाले बड़े मौके कम होने लगे और म्यूज़िक इंडस्ट्री फिर उसी पुराने तरीकें फॉलो करने लगी.
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फेमस गाने
फिर भी, कमाल की बात ये रही कि जिन गानों ने उस दौर में लोगों के दिलों में जगह बनाई, वो आज भी उतने ही फ्रेश और पॉपुलर हैं. उनके सबसे हिट गानों की लिस्ट में “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे”, “ना ना करते प्यार”, “तुमने पुकारा और हम चले आए”, “दिल ने फिर याद किया” और “चांद तकता है इधर”, तुमसे ओ हसीना कभी मोहब्बत, जिंदगी इम्तिहान लेती है और रहें ना रहें हम शामिल हैं. यही गाने सुमन कल्याणपुर की असली जीत थी. चाहे सुमन को वो शोहरत न मिली जिसकी वो हकदार थीं, लेकिन उनकी आवाज़ ने आज भी करोड़ों दिलों में घर बसाया हुआ है.

जब आवाज़ बनी कन्फ्यूजन
सुमन कल्याणपुर की आवाज़ की सबसे बड़ी खासियत उसकी मिठास थी. यही वजह थी कि कई बार लोग उनके गानों को लता मंगेशकर के गीत समझ बैठते थे.रेडियो पर अक्सर गाने बजते थे, लेकिन सिंगर का नाम नहीं बताया जाता था, जिससे कन्फ्यूज़न और बढ़ जाती थी. हालांकि, सुमन ने इन बातों को सीरियसली नहीं लिया. उनका कहना था कि कॉलेज के दिनों में वो लता जी के गाने गाती थीं.
मलाल
सुमन कल्याणपुर ने अपने करियर में कई बेहतरीन गाने गाए. हालांकि, ‘ए मेरे वतन के लोगों’ न गा पाने का उन्हें हमेशा मलाल रहा. एक इंटरव्यू में सुमन कल्याणपुर ने खुद बताया था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने ये गाना गाने के लिए उन्हें मुझे बुलाया गया था. इसके लिए रिहर्सल भी हुई थी, लेकिन स्टेज के पास पहुंचते ही उन्हें इसकी बजाय दूसरा गाना गाने के लिए कहा गया. वो ‘पंडित नेहरू के सामने ये गाना गाने के लिए काफी ज्यादा एक्साइटेड थीं. सुमन को हमेशा ये बात चुभती रही. खैर, भले ही सुमन कल्याणपुर आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गाए हुए गाने हमेशा हमारे दिल को सुकून देते रहेंगे.
