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जल उठा था पंजाब-बंगाल: ‘3 जून योजना’ के वो खौफनाक फैसले, जिसने बदल दिया भारत का भूगोल

by Sanjay Kumar Srivastava 3 June 2026, 8:35 PM IST (Updated 3 June 2026, 8:44 PM IST)
3 June 2026, 8:35 PM IST (Updated 3 June 2026, 8:44 PM IST)
दिलों का बंटवारा और जलता हुआ पंजाब-बंगाल: 3 जून योजना के वो खौफनाक फैसले, जिसने बदल दिया भारत का भूगोल

3 June Plan: जून 1947 में ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन ने भारत के विभाजन और दो नए राष्ट्रों भारत और पाकिस्तान के निर्माण की ऐतिहासिक योजना की घोषणा की. ‘माउंटबेटन योजना’ या ‘3 जून योजना’ कहलाने वाली इस योजना ने सदियों पुराने अखंड भारत के भूगोल को हमेशा के लिए बदल दिया.

लॉर्ड माउंटबेटन का भारत आगमन और मिशन

मार्च 1947 में लॉर्ड लुईस माउंटबेटन को ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय के रूप में भेजा गया था. ब्रिटिश प्रधान मंत्री क्लेमेंट एटली ने उन्हें जून 1948 तक भारत को सत्ता हस्तांतरित करने के सख्त निर्देश दिए थे. हालांकि, भारत पहुंचते ही माउंटबेटन को एहसास हुआ कि सांप्रदायिक तनाव और दंगों के कारण जून 1948 तक रुकना आपदा को आमंत्रित करना होगा.

विभाजन और सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि

वर्ष 1946 और 1947 के शुरुआती महीने भारत के इतिहास के सबसे काले समयों में से एक थे. मुस्लिम लीग के ‘सीधी कार्रवाई दिवस’ की घोषणा के बाद कोलकाता, नोआखाली और पंजाब में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे. अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच गतिरोध इतना बढ़ गया था कि देश का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया था.

‘3 जून योजना’ की मूल बात

लॉर्ड माउंटबेटन ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख नेताओं के साथ गहन विचार विमर्श के बाद एक फॉर्मूला तैयार किया. 3 जून 1947 को ऑल इंडिया रेडियो पर अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने निम्नलिखित मुख्य बातें घोषित कीं.

  • विभाजन की स्वीकृति: ब्रिटिश सरकार भारत को एक नहीं, बल्कि दो संप्रभु डोमिनियन (भारत और पाकिस्तान) में विभाजित करेगी.
  • पंजाब और बंगाल का विभाजन: इन दो बड़े राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों को यह निर्णय लेना था कि वे विभाजन चाहते हैं या नहीं. प्रांतों को मुस्लिम बहुल और हिंदू व सिख बहुल क्षेत्रों के आधार पर विभाजित करने का निर्णय लिया गया.
  • उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) और सिलहट: इन क्षेत्रों के लोगों का भविष्य तय करने के लिए जनमत संग्रह कराने का निर्णय लिया गया.
  • स्वदेशी रियासतें: भारत की लगभग 565 रियासतों को या तो भारत में शामिल होने, पाकिस्तान में शामिल होने या पूरी तरह से स्वतंत्र रहने की आजादी दी गई.

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समय सीमा में बदलाव

माउंटबेटन योजना की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि सत्ता हस्तांतरण की तारीख लगभग 10 महीने आगे बढ़ गई थी. ब्रिटिश सरकार ने पहले सत्ता सौंपने की समय सीमा जून 1948 निर्धारित की थी, लेकिन देश में अनियंत्रित स्थिति को देखते हुए माउंटबेटन ने इसे बदलकर 15 अगस्त 1947 कर दिया. इस जल्दबाजी के कारण प्रशासनिक तैयारियों के लिए बहुत कम समय बचा.

यह भारतीय नेताओं की मजबूरी और भारी मन से सहमति थी. कांग्रेस के शीर्ष नेताओं, विशेषकर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने हमेशा अखंड भारत का समर्थन किया था. लेकिन गृहयुद्ध जैसी स्थिति को रोकने के लिए उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था. जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर कहा कि राष्ट्र के अंग काटना कष्टदायक है, लेकिन शांति के लिए आवश्यक है. मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने अंततः योजना को स्वीकार कर लिया, हालांकि जिन्ना ने इसे ‘दीमक खाया हुआ पाकिस्तान’ कहा.

रैडक्लिफ रेखा

कागज पर खींची गई सीमा विभाजन की घोषणा के बाद सीमाओं के निर्धारण के लिए ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ की अध्यक्षता में ‘सीमा आयोग’ का गठन किया गया. रैडक्लिफ को भारत के भूगोल, संस्कृति और जनसांख्यिकी की कोई गहरी समझ नहीं थी. उन्होंने मानचित्रों और जनगणना के आंकड़ों को देखकर कुछ ही हफ्तों में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा खींच दी, जिसे ‘रेडक्लिफ लाइन’ के नाम से जाना जाता है.

इतिहास का सबसे दर्दनाक विस्थापन

3 जून की घोषणा के वास्तविक परिणाम अगस्त 1947 में सामने आए. जैसे ही सीमाओं की घोषणा हुई, मानव इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक विस्थापन शुरू हो गया. करीब डेढ़ करोड़ लोगों को रातों-रात अपना सदियों पुराना घर, जमीन और यादें छोड़कर सीमा के दूसरी ओर भागना पड़ा. पंजाब और बंगाल में लाशों से भरी रेलगाड़ियां आने लगीं और मानवता लहूलुहान होने लगी.

संपत्तियों, सेना और फाइलों का अजीब बंटवारा

भारत और पाकिस्तान के बीच न सिर्फ जमीन का बंटवारा हुआ, बल्कि सरकारी दफ्तरों की मेज-कुर्सियां, टाइपराइटर, रेलवे इंजन, सेना के हथियार और यहां तक ​​कि जेल के कैदी, सरकारी खजाने की नकदी और किताबें भी बांट दी गईं. दोनों देशों के बीच संपत्तियों का बंटवारा 80:20 के अनुपात में किया गया.

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भारत और विश्व के इतिहास पर इसका स्थायी प्रभाव

3 जून 1947 की इस योजना ने दक्षिण एशिया की संपूर्ण भू-राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया. ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया, लेकिन वह अपने पीछे कश्मीर विवाद, स्थायी सीमा तनाव और तीन प्रमुख युद्धों (1948, 1965, 1971) की विरासत छोड़ गया, जिसके परिणाम दोनों देश आज भी भुगत रहे हैं.

महात्मा गांधी ने भरे मन से दी थी स्वीकृति

3 जून की इस घोषणा ने भारतीय राजनीति के शीर्ष नेतृत्व को बेहद कठिन दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जीवनभर अखंड भारत के समर्थक रहे. उन्होंने यहां तक ​​कह दिया कि बंटवारा उनकी लाश पर होगा. लेकिन देश में भड़के सांप्रदायिक दंगों और गृहयुद्ध जैसी स्थिति को देखते हुए उन्होंने भारी मन से इस योजना को अपनी मौन स्वीकृति दे दी ताकि आगे रक्तपात को रोका जा सके.

नेहरू और पटेल ने देश बचाने को स्वीकारा विभाजन

पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं के सामने एक मजबूत और प्रशासनिक रूप से स्थिर भारत के निर्माण की चुनौती थी. नेहरू ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा था कि यह कोई खुशी का मौका नहीं है, लेकिन हमें अपनी मातृभूमि का विभाजन स्वीकार करना होगा ताकि हम आगे बढ़ सकें. सरदार पटेल का मानना ​​था कि यदि विभाजन स्वीकार नहीं किया गया तो देश पूरी तरह टूट जाएगा और गृहयुद्ध में नष्ट हो जाएगा.

मोहम्मद अली जिन्ना ने बताया जीत

दूसरी ओर, मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने इसे अपनी जीत के रूप में देखा, हालांकि जिन्ना भी पंजाब और बंगाल के विभाजन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे. 3 जून को स्वतंत्रता दिवस की घोषणा और विभाजन के महासंकट के साथ ही देश में एक अजीब सा माहौल बन गया. एक तरफ सदियों की गुलामी से आजादी की खुशी थी तो दूसरी तरफ अपने ही घर में पराया हो जाने का डर था.

कम समय मिलने से प्रशासनिक तैयारियां फेल

इस घोषणा के मात्र 72 दिनों के भीतर देश का विभाजन हो गया. इतनी कम समय सीमा के कारण प्रशासनिक तैयारियां पूरी तरह फेल हो गयीं. जैसे ही सीमाएं निर्धारित होने लगीं, इतिहास का सबसे बड़ा मानव विस्थापन शुरू हो गया. करीब 1.5 करोड़ लोगों को रातोंरात अपना घर छोड़कर सीमा पार जाना पड़ा. पंजाब और बंगाल में भड़के सांप्रदायिक दंगों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं. लाशों से भरी रेलगाड़ियां सीमा पार पहुंचने लगीं. महिलाओं और बच्चों पर अमानवीय अत्याचार हुए. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस हिंसा में करीब 5 से 10 लाख लोग मारे गए थे, हालांकि अनौपचारिक आंकड़े इससे कहीं ज्यादा बताते हैं.

इतिहास का एक अमिट पाठ

3 जून 1947 को नई दिल्ली में जो कूटनीतिक निर्णय लिया गया, उसकी कीमत देश की आम जनता ने अपने खून से चुकाई. माउंटबेटन की इस जल्दबाजी ने भारत को भौगोलिक रूप से तो आजाद कर दिया, लेकिन सामाजिक और मानसिक तौर पर एक ऐसा घाव दिया जो आज भी दोनों देशों के रिश्तों में टीस देता है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक निर्णयों में मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी के परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं.

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रियासतों को भारत में मिलाना कठिन चुनौती

3 जून, 1947 को घोषित ‘माउंटबेटन योजना’ ने एक ओर जहां ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अंत और देश के विभाजन को चिह्नित किया, वहीं दूसरी ओर इसने 560 से अधिक स्वायत्त रियासतों के एकीकरण की भारत के सामने सबसे जटिल चुनौती पेश की. अंग्रेजों ने इन देशी राज्यों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने की छूट दे दी थी. इस नाजुक मोड़ पर ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल और वीपी मेनन ने टूटते भारत को कूटनीतिक कुशलता से संभाला.

  • विलय की प्रक्रिया एवं शर्तें: रियासतों के विलय के लिए एक कानूनी दस्तावेज तैयार किया गया, जिसे ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (डीड ऑफ एक्सेशन) कहा गया. भारतीय सत्ता स्वीकार करने के बदले में राजाओं के सामने एक व्यावहारिक समझौता रखा गया.
  • तीन प्रमुख विषय: रियासतों को केवल रक्षा, विदेशी मामले और संचार भारत सरकार को सौंपने थे.
  • आंतरिक स्वायत्तता: राजाओं को उनके राज्यों के आंतरिक प्रशासन और राजस्व पर नियंत्रण का आश्वासन दिया गया था.

अधिकांश रियासतों ने भौगोलिक स्थिति को देखते हुए स्वेच्छा से भारत स्वीकार कर लिया, लेकिन कुछ बड़ी रियासतों ने कड़ा प्रतिरोध किया.

त्रावणकोर और जोधपुर: रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण त्रावणकोर ने सबसे पहले स्वतंत्र रहने का इरादा जताया, लेकिन आंतरिक सार्वजनिक आक्रोश और दृढ़ कूटनीति के बाद उसने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह पाकिस्तान में शामिल होने के करीब थे, लेकिन पटेल ने उन्हें सुरक्षा और रियायतों का आश्वासन देकर भारत में शामिल करा लिया.

जूनागढ़: यहां के नवाब ने पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी थी, जो भौगोलिक दृष्टि से असंभव था. भारी जन विद्रोह के बाद नवाब पाकिस्तान भाग गया और फरवरी 1948 में जनमत संग्रह कराकर इसे भारत का हिस्सा बना दिया गया.

हैदराबाद: यहां के निज़ाम स्वतंत्र रहना चाहते थे और उन्होंने लोगों पर अत्याचार शुरू कर दिए. स्थिति बिगड़ती देख भारत सरकार ने सितंबर 1948 में ‘ऑपरेशन पोलो’ (सैन्य कार्रवाई) के माध्यम से हैदराबाद का भारत में पूर्ण विलय पूरा कर लिया.

जम्मू और कश्मीर: महाराजा हरि सिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे, लेकिन अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी आदिवासियों के आक्रमण के बाद उन्होंने मदद की अपील की और विशेष शर्तों (रक्षा और संचार भारत के अधीन) के साथ विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए.

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