Iran-Pakistan-Saudi-Turkey Meeting: महीनों से चल रहे पश्चिम एशिया संघर्ष को खत्म करने की पहल हर बार किसी न किसी कारण विफल हो जाती है. अब पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मिलकर समाधान निकालने की एक और कोशिश की है. आज ईरान की राजधानी तेहरान में हो रही सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक को क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है. इस बैठक में सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और तुर्की की खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कलिन भी शामिल हो रहे हैं.
इस बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, इजराइल की गतिविधियों, फिलिस्तीन के हालात और लेबनान से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है. ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और स्थायी शांति स्थापित करने की कोशिशें चल रही हैं, इन तीन देशों के अधिकारियों के ईरान दौरे पर दुनिया की नजरें टिकी हैं. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इस बैठक को रास्ता खोलने वाला बताया है.
पाकिस्तान ने रखा प्रस्ताव
इस्माइल बघाई ने सोमवार को बताया कि तेहरान में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक क्षेत्रीय सुरक्षा पर सहयोग बढ़ाने का रास्ता खोल सकती है. ईरानी समाचार एजेंसी ISNA के अनुसार, उन्होंने अपनी साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह जानकारी दी. जब उनसे इस बैठक के बारे में पूछा गया, तो बघाई ने पुष्टि की कि तैयारियां पूरी हो चुकी हैं.
बघाई ने बताया कि इस बैठक का प्रस्ताव पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की पिछली तेहरान यात्रा के दौरान आया था, जिसका ईरान ने सकारात्मक स्वागत किया. इससे पता चलता है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय देशों के बीच बातचीत को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है. अब यह बैठक तीनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करने का एक मंच बनेगी. ईरानी प्रवक्ता के अनुसार, यह बैठक केवल मौजूदा हालात पर चर्चा तक सीमित नहीं रहेगी, इसमें भविष्य में क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सहयोग के संभावित रास्तों पर भी विचार किया जाएगा.

क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग पर जोर
ईरान का लंबे समय से यह मानना रहा है कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को आकार देने में क्षेत्रीय देशों की मुख्य भूमिका होनी चाहिए. इस्माइल बघाई ने अपने बयान में इसी भावना को दोहराते हुए कहा कि ईरान, क्षेत्र के देशों द्वारा आपसी सहयोग बढ़ाने के उन प्रयासों का स्वागत करता है, जिनमें उनके अपने हितों और सुरक्षा चिंताओं का ध्यान रखा गया हो. बघाई के अनुसार, क्षेत्रीय देशों के बीच इस तरह की बैठकें भविष्य में एक साझा सुरक्षा ढांचा विकसित करने की दिशा में शुरुआती कदम हो सकती हैं. उनका मानना है कि क्षेत्र में स्थायी शांति कायम करने के लिए, स्थानीय देशों को बाहरी ताकतों पर निर्भर रहने के बजाय आपसी बातचीत के जरिए समाधान खोजना चाहिए.
उन्होंने आगे कहा कि पिछले दो वर्षों और विशेष रूप से पिछले आठ महीनों की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग और भरोसे के बिना स्थायी सुरक्षा हासिल करना मुश्किल है. उनके विचार में, केवल सैन्य ताकत के दम पर सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती. इसके लिए इन देशों के बीच बातचीत, भरोसा और साझा हितों पर सहमति होना भी जरूरी है.
इजराइल, फिलिस्तीन और लेबनान से जुड़े मुद्दों पर ध्यान
तेहरान में होने वाली बैठक के एजेंडे में पश्चिम एशिया से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दे शामिल है. बघाई द्वारा रेखांकित किए गए मुद्दों में इजराइल की गतिविधियां, फिलिस्तीन और उसके आस-पास के क्षेत्रों की स्थिति और लेबनान के हालात शामिल हैं. ये मामले लंबे समय से पश्चिम एशिया में तनाव का कारण रहे हैं, जिससे इन पर होने वाली चर्चाएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती हैं.
ईरान ने इजराइल की नीतियों और क्षेत्र में उसकी भूमिका को लेकर लगातार चिंता जताई है. बघाई ने इजराइल की क्षेत्रीय गतिविधियों को सुरक्षा के लिए खतरा बताया. ईरान के नजरिए से क्षेत्रीय स्थिरता के लिए देशों के बीच तनाव कम होना और बातचीत के जरिए विवादों का समाधान होना जरूरी है. हालांकि, इजराइल और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को देखते हुए, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस बैठक से दोनों देशों के संबंधों में कोई बड़ा बदलाव आएगा.
ईरान ने बाहरी हस्तक्षेप पर चिंता जताई
क्षेत्रीय सुरक्षा पर ईरान के रुख का एक मुख्य सिद्धांत यह है कि पश्चिम एशिया के देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था खुद तय करनी चाहिए. राजनयिक अली बघेरी ने कहा कि ईरान का रक्षा मॉडल उसकी अपनी घरेलू क्षमताओं और संसाधनों पर आधारित है. उनके अनुसार, देश की रणनीतिक नीति क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग के जरिए सुरक्षा सुनिश्चित करने और बाहरी हस्तक्षेप का मुकाबला करने पर केंद्रित है. IRIB के अनुसार, बघेरी ने अमेरिका और इजराइल की भूमिकाओं पर भी सवाल उठाए और इजराइल की क्षेत्रीय गतिविधियों को पश्चिम एशिया की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा बताया.

ईरान का मानना है कि क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़े फैसले वहां स्थित देशों के हितों और चिंताओं को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए. हालांकि, पश्चिम एशिया के सभी देशों का इस मुद्दे पर एक जैसा नजरिया नहीं है. हर देश के अपने अलग राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी हित हैं. परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र के लिए एक सामूहिक सुरक्षा ढांचा तैयार करना कोई आसान काम नहीं होगा. इसके लिए जरूरी होगा कि ये देश अपने मतभेदों के बावजूद आपस में बातचीत जारी रखें.
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग
इस बैठक को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहली बार ‘मक्का पैक्ट’ के तीनों सदस्य देशों के प्रतिनिधि इस स्तर पर ईरान के साथ बातचीत कर रहे हैं. अगस्त में हुए इस रक्षा समझौते के तहत, किसी एक सदस्य देश पर होने वाले सशस्त्र हमले को बाकी सभी सदस्य देशों पर हुआ हमला माना जाएगा. खबरों के अनुसार, 5 अक्टूबर को ये तीनों देश ‘मक्का रक्षा गठबंधन’ (Mecca Defense Alliance) के तहत सामूहिक रक्षा उपायों को सक्रिय करने पर सहमत हुए. यह फैसला सऊदी अरब के सामने मौजूद सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए लिया गया था. रियाद में आयोजित इस गठबंधन की राजनीतिक और रक्षा रणनीति समिति की एक आपातकालीन बैठक के दौरान, तीनों देशों ने क्षेत्रीय सुरक्षा हालात और सऊदी अरब के सामने मौजूद खतरों पर चर्चा की. बातचीत का मुख्य जोर सैन्य सहयोग और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर था, खासकर यमन में हूथी विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर किए गए हमलों के मद्देनजर.
इसके अलावा, ऐसी खबरें भी हैं कि सऊदी अरब के भीतर सैन्य बलों और रक्षा क्षमताओं की तैनाती को तेज करने का फैसला लिया गया है. इससे पता चलता है कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की अपने रक्षा संबंधों को मजबूत करने को प्राथमिकता दे रहे हैं. इससे पहले, 7 अगस्त को इन तीनों देशों ने ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ (Mecca Joint Defense Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे उनके रक्षा सहयोग को और गहरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था.
संकट का समाधान निकल सकता है?
तेहरान में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ अधिकारियों की यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब यह क्षेत्र सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. इजराइल और ईरान के बीच तनाव, फिलिस्तीनी मुद्दा, लेबनान के हालात और इस क्षेत्र के विभिन्न देशों के अलग-अलग सुरक्षा हित, किसी भी सामूहिक पहल के रास्ते में बड़ी रुकावटें पैदा करते हैं. यह बैठक बातचीत के लिए एक नया रास्ता खोल सकती है. अगर इसमें शामिल देश क्षेत्रीय सुरक्षा पर आम सहमति बनाने और अपने मतभेदों को कम करने में सफल रहते हैं, तो इससे भविष्य में सहयोग के नए अवसर पैदा हो सकते हैं. इससे तनाव कम करने और विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है. हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि केवल एक बैठक से पश्चिम एशिया का संकट खत्म हो जाएगा. क्योंकि इससे पहले शांति समझौते आखिरी चरण में आकर फेल हो गए हैं.
News Source: ANI
