Nepal Women in Shelters: नेपाल इस समय त्रासदी से गुजर रहा है. 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ ने उत्तरी और मध्य नेपाल में सब कुछ तबाह कर दिया है. रोते-बिलखते लोग अपने परिवारवालों को खोज रहे हैं. अब तक 1300 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और 5000 से ज्यादा लापता हैं. मलबे से लाशें निकलती जा रही हैं. लोगों के घर, दुकान और हाटल सब बर्बाद हो गए हैं. बाढ़ अपने पीछे आंसू और बेबसी छोड़ गई है. बाढ़ में जान गंवा देने वालों की पूरी लाशें भी नहीं मिल रही. किसी का सिर्फ हाथ मिला, तो किसी का पैर. लाशों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई हैं कि मुर्दाघर भर गए हैं. अब उन्हें जमीन में दफनाया जा रहा है, ताकि बाद में डीएनए टेस्ट के जरिए उन्हें उनके परिवारों के पास पहुंचाया जा सके.
जो जिंदा बच गए, उनका भी सब कुछ उजड़ गया. हालात इतने खराब हैं कि अब लोगों के पास खाने-पीने के लिए कुछ नहीं बचा है. वे सरकार के भरोसे जिंदा हैं. हजारों लोगों के लिए राहत शिविर अब नई मुसीबत का केंद्र बन गए हैं. रसुवा और नुवाकोट सहित विभिन्न इलाकों में बने अस्थायी शेल्टरों, स्कूलों और सामुदायिक भवनों में करीब 3,500 बेघर लोग रहने को मजबूर हैं. इन शिविरों में रह रहे पीड़ितों के पास उनकी नियमित और जरूरी दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं. बुनियादी सुविधाओं के नाम पर शेल्टरों में साफ पीने के पानी और बुनियादी साफ-सफाई की भारी किल्लत है. ऐसे में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सबसे ज्यादा दिक्कतें हो रही हैं.
14 महीने की बच्ची के लिए नहीं है खाना
नेपाल में आई बाढ़ ने शर्मिला श्रेष्ठा का घर छीन लिया और उन्हें कई दिनों के लिए उनके बच्चे से अलग कर दिया. अब एक भीड़भाड़ वाले शेल्टर में वापस आकर, वह बेबस होकर अपने बच्चे को बड़ों जैसा खाना खाते हुए देखने के अलावा और कुछ नहीं कर सकतीं क्योंकि और कुछ खाने के लिए नहीं है. उनकी 14 महीने की बेटी उनके साथ नॉर्थ-वेस्ट काठमांडू में एक क्लासरूम के फर्श पर सोती है. साथ में उनकी ननद का 18 महीने का बेटा भी है. दोनों बच्चों के लिए कोई बच्चों वाला खाना नहीं है. रविवार को द काठमांडू पोस्ट अखबार ने श्रेष्ठा के हवाले से कहा, “वे बच्चों के लिए कोई खास खाना नहीं दे रहे हैं. हमें वही भारी बड़ों वाला खाना छोटे बच्चे को खिलाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.”

बच्चे को दूध पिलाने के लिए जगह नहीं
33 साल की एक मां बाढ़ के कारण दो या तीन दिनों के लिए अलग होने के बाद अपनी बेटी को ढूंढने के लिए पहाड़ियों में छह घंटे पैदल चलीं. उन्होंने कहा, “मुझे बस रहने के लिए एक अच्छी, सही जगह चाहिए. इससे मन को थोड़ी शांति मिलेगी.” श्रेष्ठा जैसी मांओं के लिए, नेपाल में 26 अगस्त को आई अचानक आई बाढ़ ने कई मुसीबतें खड़ी कर दी हैं, जो बढ़ते पानी में नहीं बल्कि भीड़-भाड़ वाले शेल्टर में, दूध पिलाने के समय, क्लासरूम के फर्श पर और हॉस्पिटल जाने वाली खतरनाक सड़कों पर हो रही हैं. बच्चे भूखे हैं. मांएं बच्चों को दूध पिलाने के लिए मुश्किलों से जूझ रही है. सैकड़ों बेघर लोगों से भरे शेल्टर में, मां होने की सबसे बेसिक जरूरत, बच्चे को दूध पिलाने और आराम देने के लिए एक शांत जगह भी एक लग्जरी जैसी लगती है.
त्रिशूली में, परियार, एक मां जो अपने नवजात बच्चे को तीन महीने से स्तनपान करा रही थीं, 26 अगस्त को बाढ़ का पानी बढ़ने पर अपने घर से भाग गई. अब वह भोटेकोशी-त्रिशूली कॉरिडोर के पास एक शेल्टर में अपने बच्चे को दूध पिला रही है, जहां दर्जनों अजनबी रहते हैं. पास में आदमी स्मोकिंग कर रहे होते हैं और हवा में शराब की महक आती है. परियार ने कहा, “सिगरेट का धुआं है, शराब की बदबू है और बच्चा सो नहीं पा रहा है.” बाढ़ के बाद से उनके ब्रेस्ट मिल्क की सप्लाई कम हो गई है. उन्होंने फॉर्मूला दूध ट्राई किया है, लेकिन ऐसा लगता है कि इससे बच्चे का पेट खराब हो जाता है, जिससे दूध पीने के बाद बच्चा और भी ज्यादा रोता है. परियार ने कहा, “अगर कोई सुरक्षित जगह होती और बच्चे को यहां वैक्सीनेशन मिल पाता, तो यह बेहतर होता. उनकी मांग बहुत मामूली है. “ दूध पिलाने के लिए एक अलग जगह.”
गर्भवती महिलाओं को मिल पाएगा समय पर इलाज?
बाढ़ प्रभावित रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग जिलों में, हजारों औरतें ऐसी ही परेशानियों का सामना कर रही हैं. यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA) का अंदाजा है कि इन तीन जिलों की 15 म्युनिसिपैलिटी में लगभग 4,430 गर्भवती महिलाएं रह रही हैं. यह आंकड़ा लगभग 310,000 की प्रभावित आबादी के आधार पर एक मानवीय प्लानिंग का अनुमान है, न कि अलग-अलग पहचानी गई महिलाओं की गिनती. अनुमान के आधार पर, अगले महीने लगभग 492 बच्चों के जन्म की उम्मीद की है, जिसमें लगभग 74 महिलाओं को इमरजेंसी केयर की जरूरत पड़ सकती है. लेकिन कई महिलाओं के लिए, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वे कब बच्चे को जन्म देंगी. सवाल यह है कि क्या उन्हें जरूरत पड़ने पर मदद मिल पाएगी. इलाके में सेवा देने वाले ज़िला-लेवल के त्रिशूली हॉस्पिटल में, बाढ़ के बाद से नौ डिलीवरी हुई हैं. इसके अलावा गर्भवती महिलाएं बुखार, भ्रूण की कम मूवमेंट और यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन के साथ आ रही हैं. मैटरनिटी डिपार्टमेंट की हेड बसंती पंचा कहती हैं, “बाढ़ की वजह से, हमारी सर्विस डिलीवरी बहुत मुश्किल हो गई है.” बिजली भरोसे लायक नहीं है, जिससे स्टाफ को सर्जरी के लिए जनरेटर चलाना पड़ता है और छोटे बैच में इंस्ट्रूमेंट्स को हाथ से स्टेरिलाइज करना पड़ता है.
बाढ़ ने बढ़ाया स्ट्रेस
पंचा ने कहा, “पहले काठमांडू सिर्फ दो घंटे की रोड ट्रिप पर था. अब बाढ़ के बाद किसी को नहीं पता कि काठमांडू रोड से कितने घंटे की दूरी पर है.” हॉस्पिटल में उन बच्चों के लिए कोई एडवांस्ड नियोनेटल यूनिट नहीं है जिन्हें अचानक इंटेंसिव केयर की ज़रूरत पड़ सकती है. पंचा ने कहा, “प्रेग्नेंसी अपने आप में बहुत सारी नैचुरल एंग्जायटी, स्ट्रेस और शक लाती है कि क्या होगा. लेकिन बाढ़ ने इन महिलाओं पर और भी ज़्यादा स्ट्रेस डाल दिया है.” सेंट्रल नेपाल के चंद्रावती सेकेंडरी स्कूल में, 1,000 से ज़्यादा बेघर लोगों को एक होल्डिंग सेंटर में ठूंस दिया गया है, जिसमें 500 से ज़्यादा महिलाएं शामिल हैं. महिला अधिकार संगठन WOREC की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रेखा श्रेष्ठा कहती हैं, “हर कोई एक ही जगह पर है.”

पीरियड्स में परेशानी
पीरियड्स वाली टीनएजर्स लड़कियों के लिए पर्याप्त सैनिटरी पैड नहीं हैं. उन्होंने कहा कि एक बार में, महिलाओं को एक ही पैड दिया गया और कहा गया कि यह तीन से चार दिन चलना चाहिए. रेखा, जिनकी संस्था ने महिलाओं के लिए फ्रेंडली जगहें बनाना शुरू किया है, ने कहा, “गर्भवती महिलाओं और डिलीवरी के बाद मांओं की खास जरूरतें होती हैं. नहाने, कपड़े सुखाने, स्तनपान कराने के लिए कोई प्राइवेट जगह नहीं होती. यह प्राइवेसी किसी आपदा में कोई एक्स्ट्रा सर्विस नहीं है. यह एक जरूरत है.”
संक्रामक रोगों का खतरा
इसके अलावा अखबार ने बताया कि त्रिशूली अस्पताल के आस-पास तीन विस्थापन कैंपों में लगभग 1,000 लोग रह रहे हैं. ये कैंप भैरंग सेकेंडरी स्कूल, एक कवर्ड हॉल और बेथन एकेडमी में बने हैं. ‘द काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इन कैंपों में अलग-अलग जरूरतों वाले लोग रह रहे हैं, जिनमें गर्भवती महिलाएं, हाल ही में मां बनी महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हैं. लेकिन इन शेल्टरों में साफ पीने के पानी और साफ-सफाई की कमी है. डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों पर बीमारी का खतरा बढ़ सकता है. कोलाणी के एक कैंप में, कोपिला परियार अपनी 62 साल की मां की देखभाल कर रही थीं, जिन्हें अस्थमा है और जिन्हें नियमित रूप से दवा की जरूरत होती है.
दवाइयों की भी कमी
परियार ने ‘द काठमांडू पोस्ट’ को बताया कि हम उनकी सभी दवाइयां नहीं जुटा पाए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि परिवार के पास न तो पैसे हैं और न ही कपड़े. कैंप में पीने का पानी भी नहीं है. अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ के बाद लापता लोगों में परियार का 16 साल का भाई अविनाश और 43 साल की भाभी शांति भी शामिल हैं. पानी की कमी सिर्फ़ कैंपों तक ही सीमित नहीं है. ‘द काठमांडू पोस्ट’ के अनुसार, बाढ़ ने उस नहर को नष्ट कर दिया जो त्रिशूली अस्पताल और आस-पास की बस्तियों में पीने का पानी पहुंचाती थी, साथ ही तुपचे से गुज़रने वाली एक और पाइपलाइन भी बह गई.

तिब्बत की तरफ 21 की मौत
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत बॉर्डर के पास बर्फ-चट्टान के एवलांच से अचानक आई बाढ़ ने उत्तरी और मध्य नेपाल के कस्बों और गांवों को तबाह कर दिया. हिमालय के बॉर्डर इलाके से दक्षिण की ओर बहने वाली भोटेकोशी नदी बाढ़ के पानी को नीचे की ओर ले गई, जिससे घर, गाड़ियां, सड़कें और पुल बह गए और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को नुकसान पहुंचा. चीनी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस आपदा में चीन की तरफ भी कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई, जबकि तिब्बत में 500 से ज़्यादा लोग अभी भी लापता हैं. भारत ने नेपाल के लिए 95 टन आपातकालीन राहत सामग्री भेजी है. दुनियाभर के देश इस समय नेपाल की मदद कर रहे हैं.
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News Source: PTI
