Home Top News 40 साल बाद पिघली बर्फ: न्यूजीलैंड पहुंचे PM मोदी का वो एक फैसला, जो उड़ा देगा दुश्मनों की नींद

40 साल बाद पिघली बर्फ: न्यूजीलैंड पहुंचे PM मोदी का वो एक फैसला, जो उड़ा देगा दुश्मनों की नींद

by Sanjay Kumar Srivastava 10 July 2026, 9:43 PM IST (Updated 10 July 2026, 9:49 PM IST)
10 July 2026, 9:43 PM IST (Updated 10 July 2026, 9:49 PM IST)
कांग्रेस युग के चार दशक बाद पिघली सियासी बर्फ: न्यूज़ीलैंड पहुंचे मोदी का वो एक फैसला, जो उड़ा देगा दुश्मनों की नींद

PM Modi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का न्यूज़ीलैंड दौरा दोनों देशों के रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा संबंधों के लिहाज से एक ऐतिहासिक मोड़ है, क्योंकि पिछले 40 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली न्यूज़ीलैंड यात्रा है. इससे पहले साल 1986 में कांग्रेस सरकार के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने न्यूज़ीलैंड का दौरा किया था. प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के बीच व्यापार, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

न्यूजीलैंड दौरा और इसके वैश्विक मायने

भारतीय कूटनीति के इतिहास में 10 जुलाई 2026 का दिन एक बड़े मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन देशों के दौरे के अंतिम चरण में न्यूज़ीलैंड की व्यापारिक राजधानी ऑकलैंड पहुंचे, जहां न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने हवाई अड्डे पर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. चार दशकों के इस लंबे अंतराल के बाद हो रहे किसी भारतीय प्रधानमंत्री के दौरे ने न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक नई ऊर्जा फूंक दी है, बल्कि वैश्विक मंच, विशेषकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक नया भू-राजनीतिक समीकरण भी तैयार कर दिया है.

दोनों देशों के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह दौरा?

प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा भारत और न्यूज़ीलैंड, दोनों के लिए ही अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह महज एक औपचारिक राजनयिक यात्रा नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस आर्थिक और सुरक्षात्मक हित छिपे हैं.

  • आर्थिक समृद्धि और एफटीए (FTA) को रफ्तार: दोनों देशों ने हाल ही में अप्रैल 2026 में एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर किए हैं. प्रधानमंत्री लक्सन के अनुसार, यह समझौता न्यूज़ीलैंड के निर्यात को अगले दो दशकों में सालाना 1.1 बिलियन से 1.3 बिलियन डॉलर तक बढ़ा सकता है. पीएम मोदी की इस यात्रा से इस समझौते को जमीन पर उतारने और व्यापारिक बाधाओं को दूर करने में बड़ी मदद मिलेगी.
  • रक्षा और समुद्री सुरक्षा: भारत और न्यूज़ीलैंड दोनों ही एक ‘मुक्त, खुले और सुरक्षित हिंद-प्रशांत क्षेत्र’ के पैरोकार हैं. चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच दोनों देशों का एक साथ आना रक्षा सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिए आवश्यक था.
  • प्रवासी भारतीयों का प्रभाव: न्यूज़ीलैंड में लगभग 3 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो वहां का तीसरा सबसे बड़ा जातीय समूह हैं. ऑकलैंड के स्पार्क एरेना में पीएम मोदी का भव्य सामुदायिक संबोधन इस बात का प्रतीक है कि दोनों देशों के बीच ‘पीपुल-टू-पीपुल’ यानी जन-स्तरीय संबंध कितने मजबूत हो चुके हैं.

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वैश्विक स्तर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख और दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में न्यूज़ीलैंड की रणनीतिक स्थिति के कारण इस दौरे के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव काफी गहरे हैं.

  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन: न्यूज़ीलैंड पारंपरिक रूप से पश्चिमी देशों के ‘फाइव आइज’ (Five Eyes) खुफिया गठबंधन का हिस्सा रहा है. भारत के साथ इसकी बढ़ती नजदीकियां चीन के एकतरफा विस्तारवाद को नियंत्रित करने और हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में मदद करेंगी.
  • ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) के नेता के रूप में स्थापित कर रहा है. न्यूज़ीलैंड जैसे विकसित प्रशांत द्वीप राष्ट्र के साथ साझेदारी से वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के विविधीकरण जैसे मुद्दों पर एक मजबूत साझा मंच तैयार होगा.
  • बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग: न्यूज़ीलैंड ने लगातार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है. इस यात्रा के बाद वैश्विक मंचों पर दोनों देशों का कूटनीतिक समन्वय और मजबूत होगा.

इतिहास के झरोखे से: कांग्रेस सरकार के दौरान भारत-न्यूजीलैंड संबंध

यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच राजनयिक संबंध वर्ष 1952 में स्थापित हुए थे. कांग्रेस सरकारों के दौरान दोनों देशों के रिश्ते हमेशा सौहार्दपूर्ण और दोस्ताना रहे, लेकिन उनमें वह रणनीतिक और आर्थिक गहराई नहीं थी जो आज देखी जा रही है.

  • शुरुआती दौर और ठहराव: 1968 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उसके बाद 1986 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने न्यूज़ीलैंड की यात्रा की थी. इन यात्राओं ने सांस्कृतिक और खेल (विशेषकर क्रिकेट) के स्तर पर संबंधों को बढ़ावा दिया, लेकिन शीतयुद्ध के दौर की वैश्विक राजनीति और भारत की बंद अर्थव्यवस्था के कारण व्यापारिक संबंध बेहद सीमित रहे.
  • कृषि और डेयरी विवाद: कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए (UPA) शासनकाल के दौरान भी संबंध बेहतर करने की कोशिशें हुईं. न्यूज़ीलैंड ने 2011 में अपनी ‘ओपनिंग डोर्स टू इंडिया’ नीति और ‘न्यूज़ीलैंड इंक. इंडिया स्ट्रेटजी’ लॉन्च की थी. हालांकि, दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत 2011 में ही शुरू हुई थी, लेकिन न्यूज़ीलैंड के डेयरी उत्पादों पर भारी सब्सिडी और भारत के घरेलू डेयरी किसानों के हितों की रक्षा के टकराव के कारण कांग्रेस सरकार के समय यह वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी और लगभग ठंडे बस्ते में चली गई.
  • सीमित रक्षा सहयोग: उस दौर में रक्षा सहयोग केवल संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों या छिटपुट नौसैनिक अभ्यासों तक ही सीमित था.

मोदी-लक्सन की बनी एक मजबूत रणनीतिक जोड़ी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह ऐतिहासिक न्यूज़ीलैंड यात्रा केवल 40 साल के कूटनीतिक सूखे को खत्म नहीं करती, बल्कि यह बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की मजबूत स्थिति को भी दर्शाती है. जहां कांग्रेस के दौर के संबंध केवल सांस्कृतिक और क्रिकेट की पिचों तक सीमित थे, वहीं आज मोदी सरकार के कार्यकाल में यह संबंध आधुनिक रक्षा तकनीक, अरबों डॉलर के निवेश और मुक्त व्यापार (FTA) के ठोस धरातल पर खड़े हैं.

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ऑकलैंड का प्रसिद्ध स्काई टॉवर (Sky Tower) जब भारतीय तिरंगे के रंगों में रंगा, तो उसने दुनिया को यह संदेश दे दिया कि प्रशांत महासागर का यह खूबसूरत देश अब भारत को अपने सबसे भरोसेमंद और महत्वपूर्ण वैश्विक साझेदार के रूप में देखता है. आने वाले समय में यह ‘विनिंग पार्टनरशिप’ (Winning Partnership) दोनों देशों की जनता के लिए समृद्धि और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए सुरक्षा की एक नई गारंटी बनेगी.

ऑकलैंड में मोदी का गर्मजोशी से स्वागत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को अपने तीन देशों के दौरे के आखिरी चरण में न्यूज़ीलैंड पहुंचे. इस दौरान वे न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफ़र लक्सन के साथ बातचीत करेंगे और भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित करेंगे. 40 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का न्यूज़ीलैंड का यह पहला दौरा है. एयरपोर्ट पर लक्सन ने मोदी का स्वागत किया और दोनों नेताओं ने गर्मजोशी से गले मिलकर एक-दूसरे का अभिवादन किया.

मोदी ने कहा कि कुछ देर पहले ही ऑकलैंड पहुंचा हूं. एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए प्रधानमंत्री लक्सन का आभारी हूं. उन्होंने कहा कि यह दौरा ऐतिहासिक है, क्योंकि चार दशकों में न्यूज़ीलैंड का यह पहला प्रधानमंत्री स्तरीय दौरा है. मैं प्रधानमंत्री लक्सन के साथ बातचीत करने और भारत-न्यूज़ीलैंड दोस्ती के सभी पहलुओं पर चर्चा करने के लिए उत्सुक हूं. मैं कल ऑकलैंड में एक सामुदायिक कार्यक्रम को भी संबोधित करूंगा.

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खुलेंगे सहयोग के नए रास्ते

विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि यह ऐतिहासिक दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों को मज़बूत करेगा और कई क्षेत्रों में सहयोग के नए रास्ते खोलेगा, खासकर व्यापार, रक्षा, खेल, संस्कृति, शिक्षा और लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान के मामले में. इसे ऑकलैंड में खास स्वागत! बताते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि मोदी के न्यूज़ीलैंड दौरे के मौके पर मशहूर स्काई टावर को रोशन किया गया, जो हमारे दोनों देशों के बीच दोस्ती का प्रतीक है.

नई दिल्ली से रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनका यह दौरा मार्च 2025 में लक्सन के भारत दौरे के बाद भारत-न्यूज़ीलैंड संबंधों में आई मज़बूती को और आगे बढ़ाएगा. मोदी ने कहा कि इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड का उनका दौरा भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’, ‘महासागर विज़न’ और आज़ाद व खुले इंडो-पैसिफिक के प्रति भारत के नज़रिए को और मज़बूत करेगा. न्यूज़ीलैंड के अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान वह लक्सन के साथ आर्थिक, व्यापारिक और कमर्शियल संबंधों को और बेहतर बनाने के तरीकों पर बातचीत करेंगे.

भारतीयों को भी संबोधित करेंगे मोदी

मोदी एक कम्युनिटी प्रोग्राम में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित भी करेंगे.ऑस्ट्रेलिया की तीन दिन की यात्रा पूरी करने के बाद मोदी न्यूज़ीलैंड पहुंचे. ऑस्ट्रेलिया में मोदी ने प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ के साथ शिखर वार्ता की और दोनों नेताओं ने शांतिपूर्ण इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सुनिश्चित करने में द्विपक्षीय साझेदारी की अहम भूमिका पर ज़ोर दिया. दोनों नेताओं के बीच हुई शिखर वार्ता की एक मुख्य बात रक्षा संबंधों, खासकर समुद्री क्षेत्र में, को काफ़ी मज़बूत करने पर उनका फ़ोकस था. दो साल से ज़्यादा समय तक चली बातचीत के बाद ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की कमर्शियल सप्लाई के लिए सिविल न्यूक्लियर एनर्जी पर एक समझौते को अंतिम रूप दिया गया, ताकि नई दिल्ली के न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट्स के लिए ईंधन मिल सके. इससे पहले मोदी इंडोनेशिया में थे, जहां अहम खनिजों, समुद्री सुरक्षा और अन्य प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए 14 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए.

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