Home Top News ब्रिटेन के भावी PM: जानिए कौन हैं बर्नहम, जिन्होंने सब्र और हौसले से तय किया गांव से लंदन का सफर

ब्रिटेन के भावी PM: जानिए कौन हैं बर्नहम, जिन्होंने सब्र और हौसले से तय किया गांव से लंदन का सफर

by Sanjay Kumar Srivastava 17 July 2026, 9:41 PM IST
17 July 2026, 9:41 PM IST
भविष्य के ब्रिटिश पीएम? जानिए कौन हैं बर्नहम, जिन्होंने सब्र और हौसले से तय किया मैनचेस्टर से लंदन का सफर

UK BURNHAM PROFILE: इंग्लैंड के उत्तरी हिस्से के मेयर एंडी बर्नहम ब्रिटेन के अगले प्रधानमंत्री बनने वाले हैं. एंडी बर्नहम ने सब्र और जोखिम उठाने की हिम्मत के दम पर यह मुकाम हासिल किया. आइए जानते हैं एंडी बर्नहम के जीवन के अनसुलझे रहस्य.

बनेंगे ब्रिटेन के 59वें प्रधानमंत्री

एक दशक पहले बर्नहम ने लंदन में लेबर पार्टी में 20 साल की अपनी तरक्की की राह छोड़ दी और उत्तर की ओर जाकर ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर का चुनाव लड़ने का फैसला किया. एक महीने पहले उन्होंने एक जोखिम भरे विशेष चुनाव में जीत हासिल करके संसद में वापसी की. सोमवार (20 जुलाई)को वह ब्रिटेन के 59वें प्रधानमंत्री बनेंगे. प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के पद पर सिर्फ़ दो साल रहने के बाद अचानक हुए पतन ने 56 वर्षीय बर्नहम को बिना चुनाव लड़े और बिना ज़्यादा अनुभव के इस पद पर पहुंचा दिया है. वह उम्मीदों का भारी बोझ लेकर और इस बात पर बड़े सवालों के साथ ‘नंबर 10 डाउनिंग स्ट्रीट’ में कदम रखेंगे कि वह इसे कैसे संभालेंगे.

कैम्ब्रिज से की है पढ़ाई

मैनचेस्टर की न्यूज़ साइट ‘द मिल’ के संस्थापक जोशी हरमन, जिन्होंने बरसों तक बर्नहम को कवर किया है, कहते हैं, लेबर आंदोलन और देश भर के बहुत से लोगों ने एंडी बर्नहम से अपनी उम्मीदें और कल्पनाएं जोड़ रखी हैं कि देश कैसे चलना चाहिए, लेबर पार्टी को किन मूल्यों के लिए खड़ा होना चाहिए और एंडी बर्नहम किन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्होंने बहुत से लोगों की उम्मीदें जगाई हैं. उनका जन्म लिवरपूल में हुआ था और उन्होंने कैम्ब्रिज में पढ़ाई की थी. बर्नहम ने मैनचेस्टर में अपना नाम बनाया, लेकिन उनका जन्म लिवरपूल में हुआ था और वे उत्तर-पश्चिम इंग्लैंड के इन दो प्रतिद्वंद्वी शहरों के बीच बसे एक गांव में पले-बढ़े.

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रिसेप्शनिस्ट थीं मां

उनके पिता ब्रिटिश टेलीकॉम में इंजीनियर थे और मां रिसेप्शनिस्ट थीं. वे एक मिलनसार कैथोलिक परिवार में पले-बढ़े. बर्नहम ने कहा है कि वे बहुत ज़्यादा धार्मिक नहीं हैं, लेकिन कैथोलिक शिक्षाओं और सेंटर-लेफ्ट लेबर पार्टी ने उनके मूल्यों और सामाजिक न्याय की भावना को आकार देने में मदद की. बर्नहम और उनके भाई अपने परिवार की पहली पीढ़ी थे जो यूनिवर्सिटी गए. कोई आम यूनिवर्सिटी नहीं बल्कि बर्नहम ने देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, कैम्ब्रिज में पढ़ाई की.

पहले कैम्ब्रिज जाने में हिचके थे

सेंट एल्ड्रेड्स कैथोलिक हाई स्कूल में बर्नहम के पूर्व इंग्लिश टीचर स्टीफन हैरिंगटन ने BBC को बताया कि उन्हें अप्लाई करने के लिए बहुत मनाना पड़ा क्योंकि उन्हें लगता था कि एक वर्किंग-क्लास लड़के के तौर पर कैम्ब्रिज जाना उनके बस की बात नहीं है. उन्हें खुद पर भरोसा नहीं था. लेकिन उन्होंने ऐसा किया, और बाकी तो इतिहास है. बर्नहम ने कहा है कि उन्हें कैम्ब्रिज में अजीब लगता था, क्योंकि उनके कई क्लासमेट इंग्लैंड के अमीर दक्षिणी हिस्से के महंगे प्राइवेट स्कूलों से आए थे. लेकिन उन्होंने इंग्लिश में डिग्री हासिल की और अपनी होने वाली पत्नी डच स्टूडेंट मैरी-फ्रांस वैन हील से मिले, जो अब एक मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव हैं. इस जोड़े ने 2000 में शादी की और उनके एक बेटा और दो बेटियां हैं.

ट्रेड मैगजीन में रह चुके हैं पत्रकार

ग्रेजुएशन के बाद बर्नहम ने लेबर पार्टी के नेताओं के लिए रिसर्चर और सलाहकार बनने से पहले ट्रेड मैगज़ीन में पत्रकार के तौर पर काम किया. 2001 में मैनचेस्टर इलाके के लेह ज़िले से संसद के लिए चुने जाने के बाद उन्होंने लेबर पार्टी के प्रधानमंत्रियों टोनी ब्लेयर और गॉर्डन ब्राउन के कार्यकाल में सरकार में अहम पद हासिल किए. उन्होंने 2007 से 2010 के बीच ब्राउन की कैबिनेट में ट्रेज़री के चीफ सेक्रेटरी, कल्चर सेक्रेटरी और हेल्थ सेक्रेटरी के तौर पर काम किया. 2009 में एक अहम घटना हुई, जब 1989 की हिल्सबरो स्टेडियम त्रासदी की याद में आयोजित कार्यक्रम में लोगों ने उन्हें टोका-टाकी की.

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इस त्रासदी में लिवरपूल सॉकर टीम के 97 प्रशंसक कुचले जाकर मारे गए थे. पीड़ित परिवारों ने पुलिस की उस झूठी कहानी को गलत साबित करने के लिए सालों तक लड़ाई लड़ी थी जिसमें कहा गया था कि इसके लिए बेकाबू प्रशंसक ज़िम्मेदार थे.बर्नहम इन परिवारों के समर्थक बने और उन्होंने नई जांच, माफ़ी और एक ऐसे कानून के लिए ज़ोर दिया जो सरकारी अधिकारियों पर यह ज़िम्मेदारी डाले कि वे त्रासदियों के बारे में सच बताएं, चाहे उनकी प्रतिष्ठा पर कोई भी असर पड़े.

मेयर के तौर पर ‘किंग ऑफ द नॉर्थ’ के नाम से हुए मशहूर

2010 में लेबर पार्टी के सत्ता से बाहर होने के बाद बर्नहम ने उसी साल और 2015 में पार्टी की लीडरशिप के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार हार गए. 2017 में जब लेबर पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर स्थिति में थी, उन्होंने ग्रेटर मैनचेस्टर का मेयर बनने के लिए संसद से इस्तीफा दे दिया. मेयर बनने से उनकी खूबियां उभरकर सामने आईं. लोगों को एक साथ लाने की क्षमता, मौकों को पहचानने की पैनी नज़र और व्यावहारिक सोच. उनके काम करने के तरीके को ‘मैनचेस्टरिज़्म’ कहा जाने लगा, यह बिज़नेस-फ्रेंडली समाजवाद का एक रूप था, जिसका मकसद ट्रांसपोर्ट, हाउसिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में निवेश के लिए प्राइवेट और पब्लिक फंड का इस्तेमाल करना था.

मैनचेस्टर को बनाया बेहतर

मैनचेस्टर कभी मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र था, इसे औद्योगिक क्रांति का जन्मस्थान माना जाता है, लेकिन ब्रिटिश इंडस्ट्री के ढहने के साथ यह शहर कमजोर पड़ गया था. उनके कार्यकाल में शहर ने खूब तरक्की की. खाली पड़ी औद्योगिक जगहों पर ऊंची-ऊंची इमारतें बनने लगीं. बिखरे हुए पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को सरकारी नियंत्रण में लेने और उसे बेहतर बनाने के लिए बर्नहम की काफी तारीफ हुई.

खाली समय में फुटबॉल खेलना था पसंद

उन्होंने सूट-टाई छोड़कर जींस और डार्क टी-शर्ट पहनना शुरू किया. ‘ओएसिस’, ‘द स्मिथ्स’ और ‘न्यू ऑर्डर’ जैसे बैंड्स के लिए अपने प्यार के बारे में बात की और खाली समय में फुटबॉल खेला या DJ बैटल में 1990 के दशक के गाने बजाए. COVID-19 महामारी के दौरान उन्होंने कंज़र्वेटिव प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की तीखी आलोचना की. उन्होंने संकट से निपटने के जॉनसन के तरीके को ‘लंदन-केंद्रित’ बताया, जिससे उत्तरी शहरों को नुकसान हो रहा था. तभी उन्हें ‘किंग ऑफ़ द नॉर्थ’ (उत्तर का राजा) का उपनाम मिला, यह ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ से प्रेरित नाम था, जो उनके अपने इलाके की वकालत करने और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा, दोनों को दर्शाता था.

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उन्होंने कहा है कि उन्होंने केंद्र सरकार में अपने काम को ‘अधूरे काम’ के रूप में देखा और उन्हें मौका तब मिला जब पार्टी की अलोकप्रियता से चिंतित लेबर सहयोगियों ने स्टार्मर को इस्तीफा देने के लिए प्रेरित किया. लेकिन बर्नहैम को अभी भी संसद में एक सीट की जरूरत थी. एक लेबर विधायक ने इस्तीफा देने पर सहमति व्यक्त की, जिससे मेकरफील्ड के मैनचेस्टर-क्षेत्र जिले के लिए एक विशेष चुनाव शुरू हो गया. बर्नहैम ने आव्रजन विरोधी पार्टी रिफॉर्म यूके के उम्मीदवार को हराया और विजेता के रूप में अपनी साख मजबूत की. लेबर नेता के रूप में स्टार्मर की जगह लेने की बाद की प्रतियोगिता में वह एकमात्र उम्मीदवार थे.

करेंगे एकता और उम्मीद पर आधारित राजनीति

अब हर्मन का कहना है कि बर्नहैम ‘एकता और उम्मीद पर आधारित नई राजनीति’ और ‘ऐसी अर्थव्यवस्था जो सबके लिए काम करे’ लाएंगे, चाहे लोग कहीं भी रहते हों. उनकी योजना का एक अहम हिस्सा क्षेत्रीय नेताओं को ज़्यादा अधिकार देना है, और वे प्रधानमंत्री कार्यालय का कुछ हिस्सा मैनचेस्टर में ‘नंबर 10 नॉर्थ’ में ले जाने की योजना बना रहे हैं.हर्मन ने कहा कि बरनहम की कुछ खास खूबियां हैं, खासकर लोगों को अपनी बात से सहमत करने की क्षमता और दूसरों के दुख-दर्द को समझने का गुण, जो कई राजनेताओं में नहीं होता. उन्होंने आगे कहा कि आने वाले प्रधानमंत्री के पास “देश को ज़्यादा निष्पक्ष बनाने और लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के कुछ सिद्धांत हैं, जिन पर वे सच में यकीन करते हैं.

करना पड़ेगा आर्थिक चुनौतियों का सामना

आलोचकों का कहना है कि बरनहम की राजनीति कुछ अहम मुद्दों पर साफ नहीं है, जैसे कि उनके वादों को पूरा करने के लिए पैसा कहां से आएगा. उन्हें भी उन्हीं राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा जिन्होंने स्टारमर को मुश्किल में डाला था, जैसे सुस्त अर्थव्यवस्था, बहुत ज़्यादा दबाव वाली सार्वजनिक सेवाएं और बढ़ती महंगाई का बोझ. उन्हें विदेश नीति के मुद्दों का ज़्यादा अनुभव नहीं है, चाहे वह यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से निपटना.

एक अच्छे और मजाकिया इंसान हैं एंडी

7 करोड़ की आबादी वाले देश को चलाना 30 लाख की आबादी वाले इलाके को संभालने से बहुत अलग है. लेकिन मैनचेस्टर के म्यूज़िक एंटरप्रेन्योर साशा लॉर्ड, जो बरनहम के नाइटटाइम इकॉनमी एडवाइज़र रह चुके हैं, ने कहा कि इस राजनेता का एक मज़बूत पक्ष भी है जो उन्हें मुश्किल हालात का सामना करने में मदद करेगा. लॉर्ड ने कहा कि वे लोगों से भिड़ने से नहीं डरते. सबको लगता है कि एंडी एक अच्छे और मज़ाकिया इंसान हैं. लेकिन यकीन मानिए, जब वे कुछ चाहते हैं तो उसे हासिल करके ही रहते हैं.

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