US-Iran War: पश्चिम एशिया में जारी भीषण सैन्य संघर्ष ने पूरे विश्व को आर्थिक और कूटनीतिक रूप से झकझोर कर रख दिया है. 13 जून 2025 को शुरू हुआ ईरान-इजरायल युद्ध अब अपने एक साल पूरे कर चुका है, जबकि 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए साझा हमलों के बाद भड़का अमेरिका-ईरान युद्ध भी अपने 100 दिन पूरे कर चुका है.
इस विनाशकारी महासंग्राम में अब तक 96 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वैश्विक आर्थिक नुकसान हो चुका है. शुरुआत में भारी सैन्य क्षति और अपने सर्वोच्च नेता को खोने के बावजूद ईरान ने जिस मजबूती से मैदान-ए-जंग में वापसी की है, उसने वाशिंगटन से लेकर यरूशलेम तक रणनीतिकारों को हैरान कर दिया है. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान के कड़े नियंत्रण ने पूरी दुनिया को रिकॉर्ड तोड़ महंगाई और मंदी की कगार पर धकेल दिया है.
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वैश्विक आर्थिक विकास पर चोट: मंदी का बढ़ता खतरा
इस युद्ध ने कोरोना महामारी के बाद पटरी पर लौट रही वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है. विश्व बैंक (World Bank) की हालिया ‘ग्लोबल इकोनॉमिक प्रोस्पेक्ट्स’ रिपोर्ट के अनुसार विकास दर में भारी गिरावट आई है. वैश्विक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 2.9% से घटाकर 2.5% कर दिया गया है, जो महामारी के बाद का सबसे निचला स्तर है.
- तेल की कीमतों में उछाल: होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लगभग 40% तक महंगा हो चुका है.
- शिपिंग और लॉजिस्टिक्स संकट: खाड़ी देशों का हवाई क्षेत्र बंद होने से एमिरेट्स और कतर एयरवेज जैसी विमानन कंपनियों का परिचालन ठप हो गया है. समुद्री मार्ग असुरक्षित होने से माल ढुलाई का किराया चार गुना बढ़ गया है.
अमेरिका पर असर
28 फरवरी को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान पर 900 से अधिक हवाई हमले करने वाले अमेरिका को अंदाजा नहीं था कि यह लड़ाई इतनी लंबी खिंचेगी.
अर्थव्यवस्था और महंगाई
- ब्याज दरों में बढ़ोतरी: ईंधन की कीमतें आसमान छूने के कारण अमेरिका में ‘हेडलाइन पीसीई मुद्रास्फीति’ (PCE Inflation) में भारी उछाल आया है. फेडरल रिजर्व को महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों को रिकॉर्ड स्तर पर बनाए रखना पड़ रहा है.
- घरेलू मोर्चे पर नाराजगी: अमेरिकी नागरिकों के लिए खाद्यान्न, बिजली और परिवहन की लागत अचानक बढ़ गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा युद्ध को लेकर किए जा रहे दावों और समझौतों की जमीनी हकीकत में अंतर के कारण घरेलू राजनीति गरमा गई है.
सैन्य और रणनीतिक नुकसान
- पेंटागन को खाड़ी देशों और लाल सागर में अपने युद्धपोतों को तैनात रखने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं. ईरान के जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमलों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी नुकसान पहुंचा है, जिससे अमेरिकी रक्षा बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है.
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इजरायल पर असर
जून 2025 से ही इजरायल इस युद्ध का मुख्य केंद्र रहा है. ईरान, हिजबुल्लाह और हूती के लगातार हमलों ने इजरायल को गंभीर संकट में डाल दिया है.
आर्थिक ढांचा ध्वस्त
- उत्पादन ठप: इजरायल के लाखों रिजर्व सैनिकों को मोर्चे पर तैनात किए जाने के कारण वहां के तकनीकी, कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों में श्रमबल की भारी कमी हो गई है.
- बुनियादी ढांचे को क्षति: ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल हमलों ने इजरायल के कई सैन्य एयरबेस और पेट्रोकेमिकल प्लांट्स को निशाना बनाया है, जिसके पुनर्निर्माण में अरबों डॉलर का खर्च आ रहा है. इजरायल का पर्यटन उद्योग पूरी तरह ठप हो चुका है.
- आर्थिक रेटिंग में गिरावट: अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इजरायल की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग (Credit Rating) को घटा दिया है, जिससे देश पर कर्ज का बोझ बढ़ गया है और महंगाई बेकाबू हो चुकी है.
भारत पर युद्ध के मुख्य प्रभाव
भारत भले ही युद्ध क्षेत्र से भौगोलिक रूप से दूर हो, लेकिन पश्चिम एशिया उसका रणनीतिक पड़ोस है, जिससे भारत इस संकट से अछूता नहीं रह पाया है.
- ऊर्जा संकटः कच्चे तेल के दाम में 40% उछाल, घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल और माल ढुलाई महंगी.
- व्यापार में बाधाः होर्मुज और लाल सागर ब्लॉकैड, भारतीय निर्यातकों का शिपिंग खर्च और समय बढ़ा.
- प्रवासियों की सुरक्षाः खाड़ी में 80 लाख से ज्यादा भारतीय, रोजगार संकट और रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) में कमी.
- महंगाई का दबाव: भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें कई बार बढ़ानी पड़ी हैं, जिसने खुदरा महंगाई को बढ़ा दिया है.
- व्यापारिक गलियारों को झटका: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं ठंडे बस्ते में चली गई हैं. कूटनीतिक स्तर पर, भारत को अपने पुराने मित्र ईरान और रणनीतिक साझेदार इजरायल-अमेरिका के बीच संतुलन बनाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
पूरी दुनिया असुरक्षित
सैन्य विश्लेषकों और पिट्सबर्ग इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स (PIIE) के वित्तीय मॉडलों के अनुसार, यदि यह युद्ध आने वाले महीनों में समाप्त नहीं हुआ, तो दुनिया को काफी विनाशकारी परिणाम भुगतने होंगे.
- 335 लाख करोड़ का कुल नुकसान: यदि युद्ध अगले एक साल और खिंचता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को होने वाला कुल नुकसान 335 लाख करोड़ रुपये के पार जा सकता है.
- तेल 167 डालर प्रति बैरल के पार: यदि होर्मुज जलडमरूमध्य लगातार तीन तिमाहियों तक पूरी तरह बंद रहता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 167 डालर प्रति बैरल के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को छू सकती हैं. इससे दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में हाहाकार मच जाएगा.
- खाद्य संकट और भुखमरी: युद्ध के कारण उर्वरक (Fertilizers) और प्राकृतिक गैस का उत्पादन ठप हो गया है. विकासशील और गरीब देशों में कृषि उत्पादन घटने से बड़े पैमाने पर खाद्य असुरक्षा और भुखमरी फैल सकती है.
- खाड़ी देशों के आर्थिक मॉडल का अंत: यह युद्ध सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देशों के ‘सुरक्षित निवेश और पर्यटन हब’ वाले नैरेटिव को हमेशा के लिए खत्म कर देगा, जिससे इस क्षेत्र से खरबों डॉलर का विदेशी निवेश बाहर निकल जाएगा.
होर्मुज बंद होने से इन देशों पर पड़ा विशेष प्रभाव
- भारत (India): भारत अपनी तेल जरूरतों का 80% से अधिक आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा इसी जलमार्ग से आता है. इसके बंद होने से देश में पेट्रोल-डीजल की किल्लत और चौतरफा महंगाई बढ़ गई है.
- चीन (China): दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक होने के नाते, चीन की ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर होर्मुज से जुड़ी है. इस रास्ते के बंद होने से चीनी विनिर्माण (Manufacturing) और वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है.
- जापान और दक्षिण कोरिया: ये दोनों देश अपने 90% से अधिक कच्चे तेल के लिए पूरी तरह खाड़ी देशों पर ही निर्भर हैं. इस संकट ने इनके तकनीकी और ऑटोमोबाइल उद्योगों की उत्पादन लागत को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है.
- यूरोपीय देश : रूस-यूक्रेन संकट के बाद यूरोप कतर और अन्य खाड़ी देशों से आने वाली तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) और कच्चे तेल पर निर्भर हो गया था. होर्मुज ने यूरोप में एक बार फिर ऊर्जा और बिजली का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है.
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भारत की संतुलित कूटनीति: गुटनिरपेक्षता और संवाद
अमेरिका-ईरान युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत ने अपनी कुशल कूटनीति और रणनीतिक सूझबूझ से अपनी अर्थव्यवस्था को बड़े झटके से बचा लिया है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में युद्ध के कारण जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बाधित हुए तो भारत के सामने पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों और महंगाई पर काबू पाने की दोहरी चुनौती थी. इस संकट के दौरान भारत ने संतुलित और स्वतंत्र कूटनीति अपनाई. भारत ने न तो अमेरिका का पक्ष लिया और न ही ईरान का, बल्कि दोनों देशों के साथ अपने मजबूत द्विपक्षीय संबंधों का फायदा उठाया.
- अमेरिकी छूट: भारत ने अमेरिकी प्रशासन के साथ प्रभावी संवाद करके रणनीतिक मोर्चों पर रियायतें हासिल कीं.
- नौसैनिक सुरक्षा: भारत ने भारतीय नौसेना (Indian Navy) के जरिए खाड़ी क्षेत्र में अपने व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा एस्कॉर्ट प्रदान किया, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य से पेट्रोलियम उत्पादों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सकी.
तेल और गैस आयात की त्रिस्तरीय रणनीति
भारत ने किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय आपूर्ति विविधीकरण की ठोस नीति अपनाई
- वेनेजुएला का विकल्प: भारत ने एक बड़ा रणनीतिक दांव खेलते हुए वेनेजुएला से कच्चे तेल के आयात में भारी बढ़ोतरी की. इसके परिणामस्वरूप वेनेजुएला, सऊदी अरब को पीछे छोड़कर भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया.
- प्रतिबंधों में ढील का फायदा: जब अमेरिका ने समुद्री जहाजों पर पहले से लदे ईरानी तेल पर अस्थाई रूप से पाबंदियों में ढील दी, तो भारत ने तुरंत इसका लाभ उठाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार से किफायती तेल सुरक्षित किया.
- वैकल्पिक रूट और पाइपलाइन: भारत ने खाड़ी देशों में संघर्ष क्षेत्र से बचने के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की हबशान-फुजैराह और सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट जैसी पाइपलाइन अवसंरचनाओं का उपयोग करने वाले उत्पादकों पर अपना ध्यान केंद्रित किया.
हालांकि, जिनेवा में ब्लूमबर्ग की रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता के प्रयास तेज हो गए हैं और आने वाले दिनों में एक स्थायी युद्धविराम की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर बंदूकें शांत नहीं होतीं और होर्मुज जलमार्ग को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए पूरी तरह बहाल नहीं किया जाता, तब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे तबाही के बादल छंटने वाले नहीं हैं.
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