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ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात के बीच भारी बवाल: व्हाइट हाउस के बाहर ‘चीन तिब्बत खाली करो’ के लगे नारे

by Sanjay Kumar Srivastava 25 September 2026, 8:46 PM IST
25 September 2026, 8:46 PM IST
ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात के बीच भारी बवाल: सड़कों पर उतरे हजारों प्रदर्शनकारी, 'चीन तिब्बत खाली करो' के लगे नारे

Xi Jinping: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तीन दिवसीय अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिकी राजधानी की सड़कों पर भारी विरोध प्रदर्शन हुआ. तिब्बती, उइघुर, हांगकांग और अन्य चीनी विरोधी प्रवासी समुदायों ने एकजुट होकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ह्वाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात कर रहे थे, ठीक उसी समय ह्वाइट हाउस के बाहर और चीनी दूतावास के सामने हजारों प्रदर्शनकारियों ने चीन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की.

सड़कों पर उतरे हजारों प्रदर्शनकारी

तिब्बती प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर और तख्तियां थीं, जिन पर ‘हम चीन को तिब्बत से बाहर चाहते हैं’ और ‘फ्री तिब्बत’ जैसे नारे साफ लिखे हुए थे. इस व्यापक विरोध प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी प्रशासन और वैश्विक मंच का ध्यान तिब्बत, शिनजियांग (पूर्वी तुर्किस्तान) और हांगकांग में बीजिंग द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन की ओर खींचना था.

चीन से नाराजगी के मुख्य कारण

चीनी सरकार के खिलाफ इन प्रवासी समुदायों का गुस्सा सालों से दबा हुआ है, जो शी जिनपिंग के वॉशिंगटन आगमन पर फूट पड़ा. प्रदर्शनकारियों की नाराजगी के पीछे कई गंभीर और ऐतिहासिक कारण हैं.

  • तिब्बत की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को मिटाने की कोशिश: प्रदर्शन में शामिल तिब्बती कार्यकर्ताओं और नेताओं का आरोप है कि चीनी सरकार तिब्बत में ‘जबरन आत्मसातीकरण’ की नीति चला रही है. हाल ही में पारित ‘जातीय एकता कानून’ के तहत तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से दूर कर सरकारी आवासीय स्कूलों में भेजा जा रहा है, जहां उन्हें अपनी मातृभाषा छोड़कर केवल मंदारिन (चीनी भाषा) सीखने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

तिब्बती समुदाय का मानना है कि यह उनकी सदियों पुरानी संस्कृति, भाषा और बौद्ध पहचान को पूरी तरह खत्म करने की एक सोची-समझी साजिश है. पूर्व तिब्बती सांसद थोंडुप त्सेरिंग ने कहा कि शी जिनपिंग का यहां स्वागत नहीं है क्योंकि चीन ने तिब्बत पर अवैध कब्जा कर रखा है और उनकी नीतियां तिब्बती पहचान को मिटाने के लिए हैं.

  • धार्मिक स्वतंत्रता पर पूर्ण प्रतिबंधः तिब्बत और शिनजियांग दोनों ही क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियों पर कड़ा पहरा है. चीनी अधिकारियों द्वारा बौद्ध मठों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और दलाई लामा की तस्वीरों या उनकी शिक्षाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध है. प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (UN) के सामने एक तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रंगज़ेन द्वारा किए गए आत्मदाह का मुद्दा भी उठाया, जो चीन के धार्मिक दमन के खिलाफ एक हताश कदम था.

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  • शिनजियांग में उइघुर मुसलमानों का उत्पीड़नः उइघुर मानवाधिकार परियोजना (UHRP) के कार्यकारी निदेशक ओमर कनात सहित उइघुर समुदाय के नेताओं ने शिनजियांग (पूर्वी तुर्किस्तान) की स्थिति को बेहद डरावना बताया. चीन पर शिनजियांग में लाखों उइघुर मुसलमानों को नजरबंदी शिविरों (Detention Camp) में रखने, उनसे जबरन मजदूरी कराने, उनकी मस्जिदों को नष्ट करने और उनकी जनसांख्यिकी को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर सामूहिक नसबंदी जैसे कदम उठाने के आरोप हैं. प्रदर्शनकारियों ने इसे सीधे तौर पर ‘नरसंहार’ करार दिया.
  • अंतरराष्ट्रीय दमनः अमेरिका में रह रहे इन प्रवासी समुदायों ने शिकायत की है कि चीनी खुफिया एजेंसियां और उनके समर्थक अब विदेशों (जैसे अमेरिका और यूरोप) में भी उन्हें डराने-धमकाने और उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रहे हैं. वॉशिंगटन में प्रदर्शन के दौरान भी कुछ चीन-समर्थक समूहों द्वारा तिब्बती और उइघुर प्रदर्शनकारियों के झंडों को ढकने और उनके साथ धक्का-मुक्की करने की घटनाएं सामने आईं.

वॉशिंगटन में मार्च और अमेरिकी नेताओं का समर्थन

यह ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से सुनियोजित था. प्रदर्शनकारियों ने वाशिंगटन में चीनी दूतावास के बाहर से अपनी रैली शुरू की, जो ड्यूपॉन्ट सर्कल से होते हुए सीधे अमेरिकी कैपिटल (संसद भवन) तक पहुंची. इस दौरान ‘स्टूडेंट्स फॉर अ फ्री तिब्बत’ (SFT) और ‘तिब्बती यूथ कांग्रेस’ (TYC) के कार्यकर्ताओं ने ह्वाइट हाउस के पास एक ऊंचे ट्राइपॉड पर चढ़कर एक विशाल बैनर लहराया, जिस पर लिखा था: ‘शी जिनपिंग नरसंहार के दोषी हैं – फ्री तिब्बत’.

मानवाधिकार हनन का उठा मुद्दा

इस प्रदर्शन को अमेरिकी राजनीतिक हलकों से भी मजबूत समर्थन मिला. पूर्व अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी, सांसद जिम मैकगवर्न और कई अन्य अमेरिकी सांसदों ने प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचकर बीजिंग की नीतियों की कड़ी आलोचना की. नैन्सी पेलोसी ने अमेरिकी कांग्रेस की तरफ से तिब्बत के अधिकारों की लड़ाई में हमेशा साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया. प्रवासी संगठनों ने राष्ट्रपति ट्रंप से मांग की कि वे चीन के साथ व्यापार और तकनीक पर चर्चा करने के साथ-साथ इन मानवाधिकारों के गंभीर हनन के मुद्दों को भी मेज पर रखें.

चीन का क्या है रुख?

हमेशा की तरह, बीजिंग ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. चीनी सरकार का आधिकारिक रुख यह है कि तिब्बत और शिनजियांग में उठाए गए कदम केवल क्षेत्र के आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और आतंकवाद व उग्रवाद से निपटने के लिए हैं. चीन इन्हें अपना आंतरिक मामला बताता रहा है. लेकिन वॉशिंगटन की सड़कों पर उमड़ी हजारों प्रदर्शनकारियों की भीड़ और ‘हम चीन को तिब्बत से बाहर चाहते हैं’ के गूंजते नारे यह साबित करने के लिए काफी थे कि चीन के भीतर चल रहा दमन अब वैश्विक स्तर पर चीनी नेतृत्व के लिए एक बड़ा राजनयिक सिरदर्द बन चुका है.

प्रदर्शन में तिब्बती, उइघुर, हांगकांग, दक्षिणी मंगोलियाई थे शामिल

तिब्बती, उइघुर और दूसरे प्रवासी समुदायों ने वॉशिंगटन डीसी में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिकी राजधानी की तीन दिन की यात्रा का विरोध किया. उन्होंने तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान/शिनजियांग और दूसरे इलाकों में मानवाधिकारों के मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देने की मांग की. जब शी ने वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की, तो तिब्बती प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए. इन प्रदर्शनों में तिब्बती, उइघुर, हांगकांग, दक्षिणी मंगोलियाई और चीनी लोकतंत्र कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. ये विरोध प्रदर्शन दिन भर चले कार्यक्रमों का हिस्सा थे, जिनमें चीनी दूतावास के बाहर प्रदर्शन, अमेरिकी कैपिटल की ओर मार्च और कई प्रवासी और मानवाधिकार संगठनों के प्रतिनिधियों की रैली शामिल थी.

पूर्वी तुर्किस्तान नहीं था कभी चीन का हिस्सा

विरोध प्रदर्शन के दौरान, उइघुर मानवाधिकार परियोजना (UHRP) के कार्यकारी निदेशक ओमर कनात ने तिब्बती और उइघुर समुदायों द्वारा उठाए गए मुद्दों के बीच समानताएं बताईं. कनात ने कहा कि तिब्बतियों और उइघुरों की स्थिति एक जैसी है. जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, तिब्बत कभी चीन का हिस्सा नहीं था. पूर्वी तुर्किस्तान भी कभी चीन का हिस्सा नहीं था. पूर्वी तुर्किस्तान पर 1949 में कब्ज़ा किया गया था. तिब्बत पर 1959 में कब्ज़ा किया गया था.

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उन्होंने आरोप लगाया कि चीनी सरकार की नीतियों ने तिब्बत में धार्मिक गतिविधियों, भाषा और सांस्कृतिक जीवन पर रोक लगा दी है और कहा कि उइघुरों को भी ऐसी ही पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है. कनात ने कहा कि तिब्बत में चीनी सरकार ने धार्मिक गतिविधियों, तिब्बती भाषा और सांस्कृतिक जीवन पर कड़ी पाबंदियां लगाई हैं. तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर दिया जाता है और उन्हें उनकी भाषा, संस्कृति या आस्था के बिना पाला-पोसा जाता है. अब उइघुर बच्चों का भी यही हाल हो रहा है क्योंकि बोर्डिंग स्कूल सिस्टम पूर्वी तुर्किस्तान में भी फैल रहा है.

तिब्बतियों और उइगरों की एकजुटता जरूरी

उन्होंने आगे कहा कि उइघुरों ने बड़े पैमाने पर मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने, जबरन मज़दूरी, निगरानी, ​​परिवार से अलग होने और हमारे धर्म, भाषा और संस्कृति पर व्यापक पाबंदियों का सामना किया है. कनात ने कहा कि ये मुद्दे सिर्फ़ चीन के अंदर रहने वाले समुदायों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रवासी समुदायों के लोगों को भी दबाव का सामना करना पड़ता है. यह दमन एक बहुत बुनियादी चीज़ पर चोट करता है – हमारी अपनी पहचान को बचाए रखने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की हमारी क्षमता पर. इसीलिए तिब्बतियों और उइगरों के बीच एकजुटता मायने रखती है. यह आज और भी ज़रूरी है, क्योंकि वाशिंगटन DC में शी जिनपिंग का स्वागत किया जा रहा है.

प्रदर्शन में 2,000 से ज्यादा तिब्बती शामिल

कनात ने कहा कि तिब्बती, उइघुर और चीन सरकार द्वारा भुला दिए गए अन्य लोगों के लिए, दमन चीनी सीमा पर ही खत्म नहीं होता. यहां विदेशों में भी, हममें से कई लोगों के सामने एक मुश्किल सवाल होता है – क्या हम खुलकर बोलें या अपने परिवारों की सुरक्षा करें? चीन का नया ‘एथनिक यूनिटी लॉ’ (जातीय एकता कानून) इस डर को और भी गंभीर बना देता है. तिब्बती प्रदर्शन का नेतृत्व ‘तिब्बती यूथ कांग्रेस’ और ‘कैपिटल एरिया तिब्बती एसोसिएशन’ ने किया, जिसमें ‘इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत’, ‘स्टूडेंट्स फॉर ए फ्री तिब्बत’, ‘तिब्बती नेशनल कांग्रेस’ और अन्य संगठनों का समर्थन मिला. इन प्रदर्शनों में पूरे उत्तरी अमेरिका से 2,000 से ज़्यादा तिब्बती शामिल थे.

दमनकारी नीतियों के आरोप को बीजिंग ने किया खारिज

ये विरोध-प्रदर्शन शी की ट्रंप के साथ मुलाकातों के समय ही हुए. इसमें शामिल संगठनों ने अमेरिकी प्रशासन से अपील की कि वे द्विपक्षीय बातचीत के दौरान तिब्बत और मानवाधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दों को उठाएं. तिब्बती प्रदर्शनकारियों ने बीजिंग के साथ तिब्बत का मुद्दा उठाने और लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद के समाधान की दिशा में प्रयास करने की भी मांग की. ये विरोध-प्रदर्शन तिब्बत और शिनजियांग में चीन की नीतियों को लेकर बीजिंग और तिब्बती व उइघुर समर्थक समूहों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को दर्शाते हैं.

बीजिंग इन आरोपों को खारिज करता है कि उसकी नीतियां दमनकारी हैं. उसका कहना है कि इन क्षेत्रों में उठाए गए उसके कदमों का मकसद विकास, स्थिरता और चरमपंथ का मुकाबला करना है. ये प्रदर्शन ऐसे समय में हुए जब शी की अमेरिकी यात्रा के दौरान ट्रंप के साथ बातचीत में चीन-अमेरिका संबंधों – जिनमें ताइवान, व्यापार, तकनीक और मानवाधिकार जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं, पर खास तौर पर ध्यान केंद्रित किया गया.

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