Dowry Death: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि शादी के सात साल के भीतर महिला की मौत हो जाती है और दहेज उत्पीड़न का सबूत मिलता है तो भी कानूनन इसे दहेज हत्या ही माना जाएगा, भले ही मौत के मामले में पति या ससुराल वालों की सीधी भागीदारी का प्रत्यक्ष सबूत न हो. अदालत ने कहा कि सीधे सबूत के अभाव में भी केस कमज़ोर नहीं पड़ता. यह टिप्पणी कोर्ट ने दोषी संदीप सिंह होरा की उम्रकैद की सज़ा को घटाकर 10 साल की कठोर सज़ा में बदलते हुए की.
लखनऊ के तालकटोरा पुलिस स्टेशन का मामला
होरा को 2010 में लखनऊ के तालकटोरा पुलिस स्टेशन इलाके में अपनी पत्नी की मौत के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी. होरा ने इस सज़ा के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील की थी. शुक्रवार को अपील पर फ़ैसला सुनाते हुए जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की डिवीज़न बेंच ने दहेज के कारण पत्नी की मौत के मामले में होरा की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन सज़ा कम कर दी. कोर्ट ने कहा कि महिला की मौत उसके ससुराल में असामान्य परिस्थितियों में हुई थी और ट्रायल के दौरान दहेज की मांग को लेकर क्रूरता की बात साबित हो गई थी.
प्रत्यक्ष सबूत न होने पर भी कमजोर नहीं पड़ता केस
कोर्ट ने बताया कि IPC की धारा 304-B के तहत अगर ज़रूरी शर्तें पूरी होती हैं, तो इसे दहेज हत्या मान लिया जाता है. इसलिए, अगर मौत से आरोपी का सीधा संबंध दिखाने वाला कोई सीधा सबूत नहीं भी है, तो भी दहेज हत्या का केस कमज़ोर नहीं पड़ता. हालांकि, साथ ही बेंच ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट उम्रकैद की अधिकतम सज़ा देने के लिए ठोस कारण नहीं बता पाया. कोर्ट ने कहा कि सज़ा तय करते समय ट्रायल कोर्ट ने मामले की गंभीरता बढ़ाने वाले और कम करने वाले हालात के बीच सही संतुलन नहीं बनाया. हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला दुर्लभ मामलों की श्रेणी में नहीं आता है, जिसके लिए उम्रकैद की सज़ा दी जाए.
16 साल पहले हुई थी घटना
कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि होरा ने छह साल, चार महीने और 19 दिन की वास्तविक जेल की सज़ा काट ली थी (या छूट के साथ सात साल, पांच महीने और 21 दिन), और उसके व्यवहार या पिछले रिकॉर्ड के बारे में कोर्ट के सामने कोई नकारात्मक रिपोर्ट पेश नहीं की गई थी. कोर्ट ने देखा कि होरा लगभग 40 साल का है और यह घटना 16 साल पहले हुई थी. बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया जिनमें कहा गया है कि हालांकि IPC की धारा 304-B के तहत उम्रकैद की सज़ा हो सकती है, लेकिन इतनी कड़ी सज़ा सिर्फ़ दुर्लभ मामलों में ही दी जानी चाहिए. इसके अनुसार, बेंच ने होरा की सज़ा कम कर दी और निर्देश दिया कि पहले काटी गई सज़ा की अवधि को नई सज़ा में समायोजित किया जाए. हालांकि, IPC की धारा 498-A और 406 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत होरा की दोषसिद्धि और सज़ा में कोई बदलाव नहीं किया गया.
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News Source: PTI
