Home Latest News & Updates वैवाहिक विवादों में ससुराल वालों को घसीटने और बच्चों को मोहरा बनाने के चलन पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर

वैवाहिक विवादों में ससुराल वालों को घसीटने और बच्चों को मोहरा बनाने के चलन पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर

by Sanjay Kumar Srivastava 25 July 2026, 5:08 PM IST (Updated 25 July 2026, 6:39 PM IST)
25 July 2026, 5:08 PM IST (Updated 25 July 2026, 6:39 PM IST)
वैवाहिक विवादों में ससुराल वालों को घसीटने और बच्चों को मोहरा बनाने के चलन पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बदला लेने के लिए ससुराल वालों को घसीटने और एक-दूसरे को बदनाम करने के लिए बच्चों का इस्तेमाल किए जाने के चलन पर गहरी चिंता जताई है. 23 जुलाई को जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की पीठ ने माता-पिता के आपसी झगड़े के कारण एक नाबालिग की बुआ के खिलाफ दर्ज पॉक्सो (POCSO) केस को रद्द कर दिया. कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट की आलोचना की, जिसने बिना सबूतों की जांच किए केस खारिज करने से मना कर दिया था.

मां के आरोपों से कोर्ट हैरान

कोर्ट ने कहा कि यह एक आम चलन बन चुका है. लेकिन हम तलाकशुदा मां द्वारा लगाए गए इन आरोपों से हैरान हैं कि उसके बेटे का उसकी बुआ (पिता की बहन) द्वारा लगातार यौन उत्पीड़न किया जाता है. कोर्ट ने कहा कि यह FIR, तलाकशुदा पिता द्वारा मामा के खिलाफ दर्ज कराई गई FIR के जवाब में दर्ज कराई गई लगती है. पिता ने भी उतने ही चौंकाने वाले आरोप लगाए थे, जिसमें लड़के की जुड़वां बहन के खिलाफ अपराध का आरोप लगाया गया था. शीर्ष अदालत ने आपसी सहमति से सितंबर 2023 में पारित तलाक के आदेश को देखा और कहा कि अपीलकर्ता उन जुड़वां बच्चों की बुआ है जो उसके भाई (अब तलाकशुदा) के हैं. बेंच ने गौर किया कि बच्चे पिता की कस्टडी में हैं और मां के घर जाने के अधिकारी भी हैं.

न्याय प्रक्रिया का किया दुरुपयोग

मां का आरोप था कि यौन उत्पीड़न की शिकायत उसके बेटे ने तब भी की थी जब वह ससुराल में रह रही थी और उसने खुद भी ऐसी एक घटना देखी थी. शीर्ष अदालत ने पाया कि तलाक के समय ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया गया था और न ही 17 मार्च 2024 को FIR दर्ज होने से पहले कभी कोई शिकायत की गई थी. यह FIR पिता द्वारा ठीक वैसी ही FIR दर्ज कराने के कुछ ही घंटों बाद दर्ज कराई गई थी. कोर्ट ने कहा कि FIR को पढ़ने पर ही उस पर भरोसा नहीं होता. अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील सना रईस खान ने तर्क दिया कि अभियोजन आपराधिक न्याय प्रक्रिया का एक दुरुपयोग था.

कोर्ट ने कहा- शिकायत में कोई दम नहीं

खान ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किए गए पीड़ित बच्चे के बयान से आरोप स्वाभाविक रूप से अलग थे. शीर्ष अदालत ने आदेश में कहा कि उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने शुरू में कार्यवाही पर रोक लगा दी. रिकॉर्ड के अवलोकन से पता चला कि प्रथम दृष्टया मां द्वारा दर्ज की गई शिकायत में कोई दम नहीं है. शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 की धारा 8 के तहत पुणे जिले के खड़की पुलिस स्टेशन में दर्ज बुआ के खिलाफ एफआईआर को रद्द कर दिया.आदेश में कहा गया कि कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी.

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News Source: PTI

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