History of Sohan Halwa: जब आप सोहन हलवे का एक टुकड़ा तोड़ते हैं, तब सोचिएगा कि वो सिर्फ चीनी और घी का स्वाद नहीं है, बल्कि सदियों पुराने इतिहास और एक खोए हुए वतन की खुशबू का भी हिस्सा है.
19 February, 2026
मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि यादों का एक संदूक होती हैं. भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की कड़वाहट के बीच अगर कोई एक चीज अपनी मिठास के साथ सरहद पार कर आई, तो वो था, सोहन हलवा. कड़क, कुरकुरा और घी की खुशबू से लथपथ ये हलवा आज नॉर्थ इंडिया के हर शहर में मशहूर है, लेकिन इसका इतिहास उतना ही पेचीदा है जितना कि इसे बनाने का तरीका.
अक्सर जब हम पुरानी पीढ़ी के लोगों से मिलते हैं, जो मुल्तान जो अब पाकिस्तान में से विस्थापित होकर दिल्ली या हरियाणा आए, तो उनकी बातों में सिर्फ खोए हुए घर या भीड़भाड़ वाली ट्रेनों का जिक्र नहीं होता. उनकी बातों में ‘मुल्तानी’ या ‘सराइकी’ भाषा की मिठास और उस ‘सोहन हलवे’ का स्वाद भी होता है जिसे वो अपनी पोटलियों में साथ लाए थे.

मिथ वर्सेस हकीकत
अगर आप गूगल करेंगे या पुराने किस्सों पर यकीन करेंगे, तो आपको बताया जाएगा कि इसे 1790 के दशक में दिल्ली के एक हलवाई ‘सोहन लाल’ ने सबसे पहले बनाया था यानी ईजाद किया था. विकिपीडिया और पुरानी डिक्शनरी भी इसी कहानी को दोहराती हैं. हालांकि, असलियत इससे कहीं ज्यादा पुरानी और शाही है. मुगल काल की फारसी रसोइयों की किताबों से पता चलता है कि सोहन हलवा शाहजहां के शासनकाल से ही मौजूद था. 18वीं और 19वीं शताब्दी में अवध, बंगाल और रामपुर की रियासतों में भी इसके कई नुस्खे मिलते थे. इसे वहां ‘हलवा-ए-सूहन’ कहा जाता था. फारसी में ‘सूहन’ का मतलब होता है ‘रेती’ या ‘सोन’ जिससे लकड़ी को चिकना किया जाता है. इसकी वजह ये थी कि इस हलवे की बनावट दानेदार, शाइनी और कुरकुरी होती है, जो मुंह में जाते ही घुल जाती है.
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शाही खजाना
आज हम जो सोहन हलवा खाते हैं, वो पुराने जमाने के मुकाबले काफी सिंपल है. मुगल काल में इसे बनाने के लिए गेहूं का आटा, मैदा, घी और चीनी के साथ-साथ कस्तूरी, गुलाब की पंखुड़ियां, चिलगोजे, पिस्ता, बादाम, चिरौंजी और जायफल-जावित्री जैसे महंगे मसालों का इस्तेमाल किया जाता था. ये आज की ‘टॉफी’ जैसा होता था, जिसे अमीर लोग बड़े शौक से खाते थे. वैसे, भारत में इसकी एक और ‘कजिन’ मिठाई फेमस है जिसे हम ‘डोडा’ के नाम से जानते हैं. हालांकि, इसमें भी वही चीजें इस्तेमाल होती हैं, लेकिन इसे बनाने का तरीका थोड़ा अलग है. इस वजह से ये कड़क होने के बजाय नरम होती है.

मुल्तान की पहचान
बंटवारे के बाद मुल्तानी समुदाय के लोग दिल्ली, फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे शहरों में बस गए. उन्होंने अपनी पहचान को जिंदा रखने के लिए जगह-जगह मिठाइयों की दुकानें खोलीं. इतिहासकार मानते हैं कि किसी भी डिश की ‘जड़ों’ को ढूंढने से बेहतर है उसके ‘रास्तों’ को समझना. ऐसे में सोहन हलवा किसी एक हलवाई की दिमागी उपज नहीं थी, बल्कि ये सदियों तक दिल्ली, लाहौर, मुल्तान और लखनऊ की शाही रसोइयों में बनता रहा. ये व्यापारिक रास्तों, मुगलिया खानपान और बंटवारे के बाद के स्ट्रगल की एक खट्टी-मीठी दास्तान है.
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