BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के पहले दिन भारत की कूटनीति अंतरराष्ट्रीय मीडिया के केंद्र में रही. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-इजरायल संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक व्यापार पर बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में BRICS देशों को साझा घोषणा पर सहमत कराना भारत के लिए अहम कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में खास तौर पर इस बात को रेखांकित किया गया कि अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले BRICS देशों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं था, लेकिन भारत ने इस चुनौती के बीच एक साझा रुख तैयार करने में अहम भूमिका निभाई.
भारत साझा घोषणा तक पहुंचने में सफल रहा
जापान टाइम्स और ब्लूमबर्ग ने मोदी की कूटनीति को बताया अहम सफलता है. The Japan Times ने BRICS के भीतर सहमति बनाने में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका को प्रमुखता देते हुए इसे एक ‘Apparent Diplomatic Coup’ बताया. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान-इजरायल तनाव को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद भारत साझा घोषणा तक पहुंचने में सफल रहा.

वैश्विक शक्तियों को रखा संतुलन
Bloomberg ने भी BRICS देशों के बीच सहमति बनाने में मोदी की भूमिका को रेखांकित किया. रिपोर्ट में कहा गया कि पश्चिम एशिया में गहराते संकट की छाया के बीच भारत ने अलग-अलग रुख रखने वाले देशों को एक मजबूत साझा बयान पर लाने में सफलता हासिल की. यह भारत की उस रणनीति को भी दिखाता है जिसमें नई दिल्ली अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखते हुए बहुपक्षीय मंचों पर सहमति बनाने की कोशिश कर रही है.
BRICS के मंच पर भारत-चीन रिश्तों का नया अध्याय?
BRICS सम्मेलन की एक और बड़ी तस्वीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात रही. लंबे अंतराल के बाद दोनों नेताओं के बीच बातचीत को भारत-चीन रिश्तों में संभावित बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. Associated Press की रिपोर्टिंग में भी दोनों देशों के रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश को प्रमुखता दी गई. शी जिनपिंग ने सम्मेलन की सफल मेजबानी के लिए प्रधानमंत्री मोदी को बधाई दी। इससे यह संकेत गया कि दोनों देश तनाव के दौर से आगे बढ़कर संवाद और स्थिरता की दिशा में कदम बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही अमेरिकी मीडिया में भी मोदी-शी मुलाकात और भारत-चीन रिश्तों में आई नरमी को BRICS सम्मेलन की प्रमुख घटनाओं में गिना गया.

ग्लोबल साउथ की आवाज बनने की होड़
The New York Times ने BRICS के बदलते स्वरूप के बीच प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच विकासशील दुनिया में प्रभाव की प्रतिस्पर्धा को रेखांकित किया. वहीं Wall Street Journal की रिपोर्टिंग में भारत-चीन रिश्तों में बदलाव को भारत की रणनीतिक दिशा में संभावित पुनर्संतुलन के तौर पर देखा गया। इसका बड़ा संदेश यह है कि BRICS अब सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। इसके विस्तार के साथ यह Global South की राजनीति और बदलती विश्व व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है. इस बदलते समीकरण में भारत खुद को चीन के समानांतर एक स्वतंत्र और प्रभावशाली आवाज के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.
भारत की ‘बैलेंसिंग एक्ट’ कूटनीति
BRICS सम्मेलन ऐसे समय आयोजित किया गया जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ा हुआ है. ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे देशों की मौजूदगी ने सम्मेलन के रणनीतिक महत्व को और बढ़ा दिया है. Al Jazeera ने भारत की मेजबानी को एक ‘Delicate Balancing ACT’ के तौर पर पेश किया. भारत के सामने चुनौती यह थी कि वह अलग-अलग पक्षों के साथ अपने संबंधों को बनाए रखते हुए BRICS को किसी एक धड़े का मंच बनने से बचाए. भारत के रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंध हैं, चीन के साथ लंबे समय से सीमा और रणनीतिक मतभेद रहे हैं, जबकि अमेरिका के साथ पिछले वर्षों में भारत की साझेदारी मजबूत हुई है. ऐसे में BRICS की मेज पर भारत की भूमिका सिर्फ मेजबान की नहीं बल्कि अलग-अलग हितों के बीच पुल बनाने वाले देश की भी दिखाई दी.

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भारत के लिए कूटनीतिक संदेश
- सम्मेलन के पहले दिन New Delhi Declaration को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया. रूस की सरकारी समाचार एजेंसी TASS ने प्रधानमंत्री मोदी के हवाले से घोषणा को सर्वसम्मति से अपनाए जाने को प्रमुखता दी.
- मोदी ने BRICS के अगले 20 वर्षों के लिए महत्वाकांक्षी एजेंडे और संगठन के समझौतों के प्रभावी implementation पर जोर दिया. इसका मतलब साफ है कि भारत BRICS को सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय उसके फैसलों को जमीन पर लागू करने वाली व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है.
- दक्षिण अफ्रीका की मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने भी भारत की कूटनीति और सम्मेलन की मेजबानी की सराहना की. दक्षिण अफ्रीका की ओर से BRICS को वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को बदलने और Global South को ज्यादा प्रभावशाली बनाने के मंच के रूप में पेश किया गया.
- इधर भारत की कोशिश भी यही है कि BRICS के माध्यम से विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में ज्यादा मजबूती मिले.
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भारत की बहुस्तरीय कूटनीति
प्रधानमंत्री मोदी का ‘People-Centric’ और ‘Humanity-First’ दृष्टिकोण भी इसी संदेश का हिस्सा है. रूस के साथ रिश्तों का संदेश भी साफ है कि BRICS सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बातचीत ने भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी को भी फिर से रेखांकित किया. इंडोनेशिया के Tempo.co ने दोनों नेताओं की साझेदारी को प्रमुखता दी. इससे भारत की बहुस्तरीय कूटनीति का एक और पहलू सामने आता है. नई दिल्ली एक तरफ पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रही है, तो दूसरी तरफ रूस और BRICS के अन्य देशों के साथ अपने पारंपरिक और रणनीतिक संबंधों को भी बनाए हुए है.

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बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका
BRICS सम्मेलन के पहले दिन की तस्वीर को अगर व्यापक नजरिए से देखें तो इसके केंद्र में सिर्फ संगठन की बैठक नहीं बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति व्यवस्था दिखाई देती है. अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम तनाव, पश्चिम एशिया का संकट और वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत की कोशिश किसी एक शक्ति खेमे का हिस्सा बनने की बजाय अपनी स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका बनाए रखने की है. नई दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन ने इस रणनीति को दुनिया के सामने रखने का बड़ा मंच दिया है.
BRICS Summit 2026 को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और भारत की मेजबानी को प्रमुखता मिली.
जापान टाइम्स और Bloomberg ने BRICS के भीतर सहमति बनाने की मोदी की कोशिश को बड़ी कूटनीतिक सफलता के तौर पर देखा, जबकि अमेरिकी मीडिया ने भारत-चीन रिश्तों में नरमी और Global South में मोदी की भूमिका को रेखांकित किया. अब असली सवाल यह है कि नई दिल्ली घोषणा और सम्मेलन में बनी सहमति को भारत कितना आगे ले जा पाता है.
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