Naxal free India: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐतिहासिक घोषणा करते हुए भारत को पूरी तरह से ‘नक्सल मुक्त’ घोषित कर दिया है. केंद्र सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च की समय सीमा से पहले ही सुरक्षा बलों के कड़े अभियानों के कारण देश से इस पांच दशक पुरानी समस्या का संपूर्ण उन्मूलन हो चुका है. कभी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माने जाने वाले लाल आतंक (वामपंथी उग्रवाद) की कमर टूट चुकी है और प्रभावित इलाकों में विकास का एक नया सवेरा शुरू हो गया है. उधर, रांची में 27 माओवादियों ने गुरुवार (21 मई) को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.
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झारखंड के डीजीपी तदाशा मिश्रा की मौजूदगी में पुलिस के सामने अपने हथियार सौंपे. अधिकारियों ने कहा कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी सीपीआई (माओवादी) के अंतिम सक्रिय पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा के समूह से हैं, जिस पर 1 करोड़ रुपये का इनाम है. वह सारंडा और कोल्हान क्षेत्रों में सक्रिय था. पुलिस ने बताया कि आत्मसमर्पण करने वालों में 123 मामलों में वांछित ‘सब जोनल कमांडर’ सागेन अंगारिया उर्फ डोकोल और जेजेएमपी का ‘सब जोनल कमांडर’ सचिन बेग भी शामिल है. आइए जानते हैं भारत में नक्सलवाद के उदय से लेकर इसके अंत तक का इतिहास.

क्या है नक्सलवाद का इतिहास?
भारत में नक्सलवाद की शुरुआत मई 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के ‘नक्सलबाड़ी’ गांव से हुई थी. इसी गांव के नाम पर इस विचारधारा को ‘नक्सलवाद’ कहा गया. यह आंदोलन चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग के विचारों से प्रेरित था, इसलिए इसे ‘माओवाद’ भी कहा जाता है. इसके मुख्य सूत्रधार चारू मजूमदार और कानू सान्याल थे. उनका मानना था कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल अमीरों और जमींदारों के हित में काम करती है, इसलिए सशस्त्र क्रांति (हथियारों के बल पर) के जरिए सत्ता पर कब्जा करना ही गरीबों को हक दिलाने का एकमात्र रास्ता है.
लोग नक्सली क्यों बने?
नक्सलवाद के शुरुआती दौर में आदिवासियों और भूमिहीन किसानों का जुड़ना कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण थे. आजादी के बाद भी ग्रामीण इलाकों में सामंतों और जमींदारों का दबदबा था. वे बंधुआ मजदूरी कराते थे और गरीब किसानों की जमीनों को हड़प लेते थे. नक्सलबाड़ी में भी एक आदिवासी युवक को उसकी जमीन से बेदखल करने के बाद ही पहला हिंसक विद्रोह भड़का था.
जल, जंगल और जमीन से बेदखली
देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों (जैसे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा) के आदिवासी वनों पर निर्भर थे. खनन परियोजनाओं और कड़े वन कानूनों के कारण आदिवासियों को उनके प्राकृतिक आवासों से बेदखल कर दिया गया, जिससे उनमें भारी असंतोष पनपा.
भौगोलिक अलगाव और विकास का अभाव
जिन इलाकों में नक्सलवाद फैला, वे घने जंगलों और पहाड़ों से घिरे थे. वहां दशकों तक न सड़कें थीं, न स्कूल, न अस्पताल और न ही प्रशासन की कोई पहुंच थी. इस बुनियादी शून्य का फायदा उठाकर नक्सलियों ने वहां अपनी समानांतर अदालतें (जन अदालत) और सरकारें चलानी शुरू कर दीं.

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प्रशासनिक उपेक्षा व शोषण
स्थानीय पुलिस और वन अधिकारियों द्वारा आदिवासियों का आर्थिक व शारीरिक शोषण किया जाता था. नक्सलियों ने आदिवासियों को सुरक्षा देने का वादा किया और उनके गुस्से को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया.
क्या भारत सचमुच नक्सलवाद से मुक्त हो गया है?
हां, भारत आधिकारिक तौर पर अब नक्सल मुक्त घोषित हो चुका है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सुरक्षा बलों के अथक प्रयासों और ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’, ‘प्रहार’, ‘ऑक्टोपस’ तथा ‘डबल वूल’ जैसे चौतरफा अभियानों की बदौलत देश से नक्सलियों का पूरी तरह सफाया कर दिया गया है.
बस्तर में बदला परिदृश्य
गृह मंत्री ने बस्तर (छत्तीसगढ़) की धरती से बताया कि जो इलाका कभी देश में लाल आतंक का सबसे बड़ा गढ़ था, वहां अब लोकतंत्र और विकास की जीत हुई है. जहां कभी बारूद की गंध होती थी, वहां अब हर गांव में स्कूल, राशन की दुकानें और बैंक खुल रहे हैं.सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक (2014-2025) में देश में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 53% से अधिक की भारी गिरावट आई. जहां पहले हज़ारों की संख्या में आम नागरिक और जवान मारे जाते थे, वहीं सुरक्षा बलों की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के कारण नक्सलियों की भौगोलिक और वित्तीय शक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई है.
देश में वर्तमान में कितने नक्सल प्रभावित क्षेत्र या जिले हैं?
गृह मंत्रालय द्वारा किए गए हालिया वर्गीकरण और समीक्षा के अनुसार, भारत में नक्सलियों का प्रभाव अब लगभग शून्य हो चुका है, लेकिन सुरक्षा और विकास की निरंतरता बनाए रखने के लिए जिलों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. वर्ष 2014 में देश के 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, जो 2025 तक घटकर केवल 11 रह गए.
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हालिया समीक्षा (फरवरी 2026) के अनुसार केवल बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा (सभी छत्तीसगढ़ में) को सबसे गंभीर रूप से प्रभावित माना गया था, जबकि कुल सक्रिय श्रेणियां सिमटकर 7 जिलों तक रह गईं. अप्रैल 2026 की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, पूर्ण प्रभाव वाले जिले केवल बीजापुर (छत्तीसगढ़) और पश्चिमी सिंहभूम (झारखंड) बचे हैं. इस श्रेणी में छत्तीसगढ़ का कांकेर और झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम शामिल हैं, जहां नक्सलवाद अंतिम सांसें ले रहा है और सुरक्षा बलों की पैनी नजर बनी हुई है.

सबसे खूंखार नक्सली कमांडर
भारत के इतिहास में कई ऐसे नक्सली कमांडर रहे जिन्होंने सुरक्षा बलों पर बड़े आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया. हाल के महीनों में सुरक्षा बलों ने एक-एक करके इन सभी मोस्ट वांटेड नक्सलियों का खात्मा कर दिया है.
मडवी हिडमाः हिडमा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर 1 का सबसे खूंखार और बेरहम कमांडर था. उसे बस्तर क्षेत्र में आतंक का दूसरा नाम माना जाता था. वह 2010 के ताड़मेटला (दंतेवाड़ा) नरसंहार का मास्टरमाइंड था, जिसमें 76 CRPF जवान शहीद हुए थे. इसके अलावा 2013 की झीरम घाटी घटना (जिसमें छत्तीसगढ़ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मारा गया) और 2021 के सुकमा-बीजापुर हमले (22 जवानों की शहादत) के पीछे भी इसी का हाथ था.
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हिडमा मारा जा चुका है. नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमाओं पर सुरक्षा बलों ने एक बड़े संयुक्त ऑपरेशन में हिडमा को उसकी पत्नी राजय के साथ मार गिराया. उसने अपने लिए चार स्तरीय सुरक्षा घेरा बनाया था, जिसे जवानों ने भेद दिया. हिडमा पर भारत सरकार और विभिन्न राज्यों द्वारा 1 करोड़ रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित था.
नंबला केशव राव उर्फ ‘बसवराज’: बसवराज प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) का सर्वोच्च नेता और महासचिव था. वह पेशे से एक इंजीनियर था और नक्सलियों के मिलिट्री विंग का प्रमुख था, जिसने गुरिल्ला युद्ध तकनीकों और आईईडी (IED) नेटवर्क को मजबूत किया. मई 2025 में छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के घने जंगलों में सुरक्षा बलों के साथ हुई एक ऐतिहासिक मुठभेड़ में बसवराज समेत 27 कट्टर नक्सली मारे गए थे. इस खूंखार नक्सली सरगना पर भी 1 करोड़ रुपये का इनाम था.
पातीराम मांझी उर्फ ‘अनल दा’: झारखंड के सारंडा जंगलों में माओवादियों का सबसे बड़ा रणनीतिकार और पोलित ब्यूरो स्तर का नेता था. जनवरी 2026 में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में चलाए गए ‘ऑपरेशन मेगाबुरु’ के दौरान सीआरपीएफ और राज्य पुलिस ने अनल दा समेत 16 बड़े नक्सलियों को ढेर कर दिया. अनल दा पर देश के अलग-अलग राज्यों में कुल मिलाकर 2.35 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था.

नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने के लिए क्या है योजना?
भारत सरकार की रणनीति केवल बंदूक के बल पर नक्सलवाद को खत्म करने की नहीं रही, बल्कि ‘समर्पण और पुनर्वास’ की नीति इसके मूल में रही है. भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाने के लिए सरकार निम्नलिखित कदम उठा रही है.
आकर्षक आत्मसमर्पण नीतियां
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को तुरंत नकद वित्तीय सहायता दी जाती है ताकि वे अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकें. इसके अलावा उन्हें हथियार सौंपने पर अतिरिक्त बोनस राशि भी मिलती है.
कौशल विकास और शिक्षा
केंद्रीय गृह मंत्री के अनुसार, सरकार ने मुख्यधारा में लौटे लगभग 3,000 पुनर्वासित नक्सलियों के लिए कौशल विकास और शिक्षा के वास्ते करोड़ों रुपये का बजट आवंटित किया है. उन्हें रोजगार के नए अवसर और तकनीकी प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं ताकि वे सम्मान के साथ समाज में जी सकें.

सुरक्षा बलों में नौकरियां
बस्तर और अन्य क्षेत्रों में आत्मसमर्पण करने वाले कई पूर्व नक्सलियों को राज्य पुलिस की ‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ (DRG) जैसी विशेष इकाइयों में शामिल किया गया है. ये लोग अब अपनी स्थानीय भौगोलिक समझ का उपयोग कर देश की सुरक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं और समाज के सम्मानित नागरिक बन चुके हैं.
सुरक्षा कैंपों को विकास केंद्रों में बदलना
छत्तीसगढ़ में लगभग 70 केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के कैंपों को अब विकासोन्मुख केंद्रों में बदल दिया गया है. इन केंद्रों के माध्यम से स्थानीय आदिवासियों और आत्मसमर्पण करने वाले परिवारों तक सीधे सरकारी कल्याणकारी योजनाएं, मुफ्त अनाज, एलपीजी सिलेंडर, और नल से जल पहुंचाया जा रहा है.
सांस्कृतिक और खेल पुनरुत्थान
बस्तर की कला, संगीत, खेल और परंपराओं को जो नक्सलियों ने कुचल दिया था, उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए सरकार ने ‘बस्तर ओलंपिक’ और ‘बस्तर पंडुम’ जैसे बड़े सांस्कृतिक और खेल आयोजनों की शुरुआत की है, जिससे स्थानीय युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा मिल सके.
भारत से नक्सलवाद का पूरी तरह खात्मा देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है. जो आंदोलन कभी सामाजिक न्याय और भूमि सुधारों के नाम पर शुरू हुआ था, वह समय के साथ केवल हत्याओं, लेवी (जबरन वसूली) और विकास विरोधी हिंसा का जरिया बनकर रह गया था. आज देश के सबसे पिछड़े और दुर्गम जंगलों में भी तिरंगा लहरा रहा है और वहां के आदिवासियों के हाथों में बंदूक की जगह शिक्षा, तकनीक और अधिकार आ चुके हैं.
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