NDA : मानसून सत्र से पहले NDA ने नॉर्थ ईस्ट से अपना नया राजनीतिक ऑपरेशन शुरू कर दिया है. शुरुआती सफलता भी मिलती दिख रही है. एक-एक सांसद जोड़ने की रणनीति के तहत NDA का कुनबा बढ़ रहा है, जबकि विपक्ष और कई पुराने सहयोगी दलों की ताकत सिमटती नजर आ रही है. पूर्वोत्तर की 25 लोकसभा सीटों पर NDA पहले ही 16 सीटें जीत चुका है. लेकिन अब उसकी नजर उन दलों पर भी है जो गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं. मिजोरम की सत्तारूढ़ पार्टी जेपीएम इसका ताजा उदाहरण है.
हाल ही में राज्यसभा के लिए चुने गए पार्टी सांसद लालतलुआंगकिमा ने संसद में एनडीए सरकार को मुद्दा आधारित समर्थन देने की बात कही है. लोकसभा में भी पार्टी का एक सांसद है. यानी बिना एनडीए में औपचारिक रूप से शामिल हुए भी सरकार को दोनों सदनों में अतिरिक्त समर्थन मिलने लगा है. वहीं, महाराष्ट्र में भी एनसीपी के टूट की बात आ रही है लेकिन बीजेपी के विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि शरद पवार के एनसीपी के सांसद भी हमें बाहर से समर्थन करेंगे. बीजेपी खुल कर ना सही, लेकिन ये इंडीकेट जरूर कर रही है कि बहुत सारे दल टूट कर अलग होंगे और एनडीए के पक्ष में आयेंगे.
नॉर्थ ईस्ट का गणित
- NDA – 16
- विपक्ष/अन्य – 9
- भाजपा – 13
- AGP – 1
- UPPL – 1
- SKM – 1
- कांग्रेस – 7
- VPP – 1
- ZPM – 1
दरअसल बीजेपी की रणनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. संसद के भीतर संख्या बढ़ाने के लिए कई मॉडल पर एक साथ काम किया जा रहा है. कहीं विपक्षी सांसद सीधे बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. कहीं विपक्षी राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे हो रहे हैं. कहीं विपक्षी सांसद NDA की सहयोगी पार्टियों में शामिल हो रहे हैं. कहीं छोटे दलों के जरिए नए राजनीतिक समीकरण बनाए जा रहे हैं और कहीं अलग गुटों को मान्यता दिलाकर संख्या बढ़ाई जा रही है.
बीजेपी के 5 मॉडल
- विपक्षी सांसद सीधे बीजेपी में
- राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे
- सहयोगी दलों में शामिल कराना
- छोटे दलों के जरिए नए समीकरण
- अलग गुट बनाकर मान्यता दिलाना
इस रणनीति का असर सिर्फ विपक्ष पर नहीं बल्कि एनडीए के भीतर भी दिखाई दे रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के 240 सांसद थे. एनडीए में 16 सांसदों के साथ टीडीपी दूसरे नंबर पर और 12 सांसदों के साथ जेडीयू तीसरे नंबर पर थी. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. तृणमूल कांग्रेस से टूटकर आए 20 सांसदों के एक नए समूह के एनडीए के करीब आने से त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया अचानक गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. इसके बाद चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी तीसरे स्थान पर खिसक गई. उधर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 6 सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए. इससे शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई और उसने जेडीयू को पीछे छोड़ दिया. कभी एनडीए की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी रही जेडीयू अब पांचवें स्थान पर पहुंच गई है.
NDA की बदलती रैंकिंग (पहले)
BJP – 240
- TDP – 16
- JDU – 12
- शिवसेना (शिंदे) – 7
- LJP – 5
और अब
- NCPI – 20
- TDP – 16
- शिवसेना – 13
- JDU – 12
- LJP – 5
चर्चा है कि शरद पवार की एनसीपी में भी नए समीकरण बन सकते हैं. अगर वहां टूट या विलय होता है तो एनडीए की आंतरिक रैंकिंग में एक और बड़ा बदलाव संभव है. कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के दो साल पूरे होने के मौके पर सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव यही है कि बीजेपी की निर्भरता अब सिर्फ चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे सहयोगियों पर नहीं रही. नए सहयोगी, टूटे हुए गुट और मुद्दा आधारित समर्थन एनडीए के संख्याबल को लगातार बढ़ा रहे हैं. बीजेपी का लक्ष्य साफ दिख रहा है कि सिर्फ बहुमत नहीं, बल्कि संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के जितना करीब पहुंचा जा सके, उतना पहुंचना.
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