Gram Chikitsalay 2 Review: हमेशा से टीवीएफ प्रोडक्शन की खासियत रही है कि वो बड़ी-बड़ी कहानियों की बजाय छोटे शहरों, गांवों और आम लोगों की लाइफ से जुड़ी कहानियां कहता है. यही वजह है कि उसके शो ऑडियन्स के दिलों तक आसानी से पहुंच जाते हैं. ‘पंचायत’, ‘गुल्लक’, ‘कोटा फैक्ट्री’ और ‘एस्पिरेंट्स’ जैसी सक्सेसफुल वेब सीरीज के बाद ‘ग्राम चिकित्सालय’ भी TVF की उसी परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है. हालांकि, इसका पहला सीजन जब रिलीज़ हुआ तो, लोगों न इसे ‘पंचायत’से कंपेयर किया. लोगों को लगा कि ये शो अपनी अलग पहचान बनाने की बजाय ‘पंचायत’ के फॉर्मूले पर ही चल रहा है. काफी हद तक शो कुछ-कुछ उसी तरह की कहानी रह रहा था. लेकिन अब दूसरे सीजन के साथ ‘ग्राम चिकित्सालय’ की इमेज बदली है. ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ न सिर्फ अपनी कमजोरियों को सुधारती है, बल्कि ये भी साबित करती है कि उसके पास कहने के लिए अपनी अलग कहानी और अपनी अलग दुनिया है. अमेजन प्राइम वीडियो की सिर्फ 5 एपिसोड की ये वेब सीरीज ग्रामीण हेल्थ सिस्टम, सरकारी सिस्टम, करप्शन, अंधविश्वास और इंसानी रिश्तों को एक हल्के-फुल्के लेकिन अच्छे तरीके से दिखाई है.

कहानी
‘ग्राम चिकित्सालय’ सीजन 2 की शुरुआत वहीं से होती है जहां इसका पिछला सीजन खत्म हुआ था. डॉ. प्रभात सिन्हा यानी अमोल पाराशर एक बार फिर भटकंडी गांव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर में लौटते हैं. पिछले सीजन में उनका सबसे बड़ा चैलेंज गांव वालों का भरोसा जीतना था. लेकिन अब उन्हें समझ आता है कि लोगों का यकीन हासिल करना शायद काफी ईजी काम था. असली मुश्किल तो उस सिस्टम से लड़ना है जिसके भरोसे पूरा हेल्थ सेंटर चलता है. हॉस्पिटल में जरूरी दवाइयों की कमी है. रिसोर्सेल लगभग खत्म हो चुके हैं. ऊपर बैठे ऑफिसर्स सिर्फ फाइलों में काम करते हुए ही नज़र आते हैं. ऐसे में प्रभात एक बड़ा सोचता है और अपने हेल्थ सेंटर को आदर्श पीएचसी का दर्जा दिलाने में जुट जाता है. उसे काफी ज्यादाम उम्मीद होती है कि ये सम्मान मिलने के बाद अस्पताल को पहले से अच्छी सुविधाएं और सरकार की तरफ से मदद मिलेगी. लेकिन ये रास्ता बिल्कुल भी आसान नहीं होता. उनके सामने खड़ा है डॉ. चेतक कुमार यानी विनय पाठक, जो गांव के सबसे पॉपुलर लेकिन झोलाछाप डॉक्टर है. इंटरनेट, यूट्यूब, व्हाट्सएप और अब एआई से मिली अधूरी जानकारी के सहारे वो लोगों का इलाज करता है. हैरानी की बात है को वो चेतक गांव वालों के लिए किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं है. दिलचस्प बात ये भी है कि इस बार ‘ग्राम चिकित्सालय’ सिर्फ उसकी डॉक्टरी पर ही फोकस नहीं करती. इस बार सीरीज में उसकी पिछली जिंदगी, उसके अधूरे सपने और उसके फेलियर को भी दिखाया गया है.यही वजह है कि इस बार डॉ. चेतक कुमार का कैरेक्टर पहले से कहीं ज्यादा रियल लगता है.
सपोर्टिंग कैरेक्टर से ज्यादा
पहले सीजन में आकांक्षा रंजन कपूर का कैरेक्टर डॉ. गार्गी सिंह कहानी के किनारे खड़ा दिखाई देता था. लेकिन इस बार सिचुएशन पूरी तरह से बदल गई है. डॉ. गार्गी प्रभात की बराबरी करती हुई दिखाई देती है. उन्हें सिस्टम की कमियां भी समझ आती हैं और उससे निपटने के तरीके भी पता हैं. मैटरनल हेल्थ, डिलिवरी और महिलाओं की हेल्थ प्रोब्लम को लेकर उनका मिशन सीजन 2 की सबसे स्ट्रॉन्ग कहानी बन जाता है. इसके अलावा प्रभात और गार्गी के बीच धीरे-धीरे मज़बूत होता होता रिश्ता भी इस कहानी को और इमोशनल टच देता है. अच्छी बात ये है कि दोनों के बॉन्ड को जबरदस्ती रोमांटिक बनाने की कोशिश नहीं की गई. यही वजह है कि प्रभात और गार्गी के बीच की केमिस्ट्री रियल और कनेक्टिंग लगती है.
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गोविंद की कहानी
इन तीनों के अलावा अगर कोई कैरेक्टर ‘ग्राम चिकित्सालय’ के नए सीजन में सबसे ज्यादा सरप्राइज देता है तो वो है गोविंद. आकाश मखीजा ने वार्ड बॉय गोविंद के रोल को इतना प्यारा बना दिया है कि कई बार ऑडियन्स का फोकस मेन स्टोरी से हटकर उसी पर रह जाता है. वैसे, आकाश हाल ही में रिलीज़ हुई वेब सीरीज राख में नेगेटिव रोल करके पहले ही लाइमलाइट में हैं. खैर, गोविंद की सबसे बड़ी इच्छा है कि उसकी नौकरी परमानेंट हो जाए. लेकिन इसके लिए जिस रिश्वत की डिमांड की जा रही है, वो देना उसके बस की बात नहीं है. परमानेंट जॉब की प्रोब्लम के बीच गोविंद की लाइफ में एक और प्रोब्लम आ जाती है. उस नए संकट का नाम है ‘पकड़वा ब्याह’. उसकी पर्सनल लाइफ और हॉस्पिटल के इंस्पेक्शन से जुड़े सीन्स ऐसा शानदार ह्यूमर बनाते हैं, जिन्हें देखकर आप भी खुद को हंसने से रोक नहीं पाएंगे. ये कहना गलत नहीं है कि गोविंद का पूरा ट्रैक ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ की सबसे इंटरटेनिंग और दिल छू लेने वाली कहानियों में से एक है.
एक्टिंग
अमोल पाराशर इस बार पहले से ज्यादा इम्प्रेसिव नजर आ रहे हैं. डॉ. प्रभात की ईमानदारी, स्ट्रगल और निराशा को उन्होंने बहुत सिंपल तरीके से निभाया है. ऑडियन्स एंड तक चाहती है कि इस इंसान को थोड़ी तो राहत मिल जाए. इसके अलावा विनय पाठक ने हमेशा की तरह अपना काम लाजवाब तरीके से किया है. चेतक कुमार जैसे कैरेक्टर को बहुत आसानी से एक कार्टून जैसा विलेन बनाया जा सकता था. लेकिन विनय पाठक अपनी एक्टिंग से उसमें फ्रेशनेस ह्यूमर और पेन तीनों भर देते हैं. कई बार आप उसके फैसलों से नाराज होते हैं लेकिन फिर भी उसे नापसंद नहीं कर पाते. वहीं, आकांक्षा रंजन कपूर को इस बार ज्यादा स्क्रीन टाइम मिला है. ऐसे में उन्होंने इस मौके का पूरा फायदा उठाया है. साथ ही आनंदेश्वर द्विवेदी एक बार फिर हर सीन में अलग ही लाइमलाइट चुरा ले जाते हैं. कंपाउंडर फुतानी के कैरेक्टर में उनकी कॉमिक टाइमिंग इतनी शानदार है कि कई बार उनका एक छोटा सा डायलॉग भी पूरे सीन को यादगार बना देता है. लोकल लैंग्वेज का यूज इस कैरेक्टर को और बढ़िया बना देता है.
पंचायत का साया
‘ग्राम चिकित्सालय’ सीजन 2 की सबसे बड़ी खासियत ये है कि वो अब पंचायत बनने की कोशिश नहीं करती. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि पंचायत का असर इस बार पूरी तरह खत्म हो गया है. कई बार डॉ. प्रभात का कैरेक्टर अभिषेक त्रिपाठी की याद दिला देता है. दोनों ही पढ़े-लिखे और सिस्टम से परेशान यंग ऑफिसर्स हैं. कुछ सिचुएशन्स तो इतनी मिलती-जुलती हैं कि लोग अपने आप ही ‘ग्राम चिकित्सालय’ और पंचायत की तुलना करने लगते हैं. हालांकि, इस बार सीरीज के मेकर्स इन तुलनाओं से भागने की कोशिश नहीं करते. बल्कि पंचायत के कुछ पॉपुलर कैरेक्टर्स का झलक दिखाकर ये क्लियर कर देते हैं कि, दोनों कहानियां एक ही दुनिया में चल रही हैं. मेकर्स का ये स्टेप कुछ लोगों को पसंद आएगा तो कुछ को नहीं, लेकिन कम से कम ये कोशिश नकली तो नहीं लगती.

राइटिंग में सुधार
वैभव सुमन और श्रेया श्रीवास्तव की राइटिंग इस सीजन की सबसे बड़ी ताकत है. पहले सीजन में कई जगह कहानी भटकती हुई फील होती थी. लेकिन इस बार राइटर जानते हैं कि उन्हें ऑडियन्स से क्या कहना है. गांव का हेल्थ सिस्टम, सरकारी लालफीताशाही, करप्शन , अंधविश्वास और चीज़ों की कमी जैसे सब्जेक्ट को बिना भाषण दिए कहानी में पिरोया गया है. सबसे अच्छी बात ये है कि शो बहुत ज्यादा इमोशनल होने से बचता है. वैसे भी, ह्यूमर और सेंसिटिविटी के बीच बैलेंस बनाए रखना आसान नहीं होता, लेकिन ‘ग्राम चिकित्सालय’ का नया सीजन इसमें सक्सेसफुल रहा है.
शो की कमजोरी
हालांकि, इतना सब कुछ अच्छा होने के बाद भी ‘ग्राम चिकित्सालय’ का नया सीजन परफेक्ट नहीं है. इसकी सबसे बड़ी प्रोब्लम स्पीड है. कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे खिंचते हैं. कई बार लगता है कि कहानी को आगे बढ़ने में काफी टाइम लग रहा है. खासकर इमोशनल सीन्स में ये प्रोब्लम ज्यादा दिखती है. जब तक कहानी अपने इमोशनल पीक पर पहुंचती है, तब तक उसका कुछ असर कम हो चुका होता है. विनय पाठक के कैरेक्टर चेतक कुमार का ट्रांसफॉर्मेशन भी जल्दबाजी में दिखाया गया है. ऑडियन्स शुरुआत से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि उसका क्लाइमैक्स कैसा होगा. लेकिन वहां तक पहुंचने की जर्नी और ज्यादा डिटेलिंग मांगती थी. कुछ सोशल इश्यूज को भी शो सिर्फ टच करके ही आगे निकल जाता है. मिर्गी वाली महिला, डायन से जुड़ी अफवाहें और वुमन हेल्थ प्रोब्लम्स जैसी कहानियों को और गहराई दी जा सकती थी.

देखें या नहीं?
टीवीएफ के कई शो की तरह ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ भी एक दिलचस्प पैराडॉक्स दिखाई देता है. सीरीज सिस्टम की कमियों को दिखाती जरूर है लेकिन अक्सर उन्हें रोमांटिक भी बना देती है.करप्ट ऑफिसर्स मौजूद हैं, लेकिन उन्हें लेकर कोई बड़ा या ठोस सवाल नहीं उठाया जाता. सिस्टम खराब है, लेकिन कहानी का मैसेज अक्सर यही रहता है कि किसी तरह उसके साथ तालमेल यानी बैलेंस बिठाकर आगे बढ़ो. डॉ. प्रभात की ईमानदारी की तारीफ होती है, लेकिन एंड में सक्सेस उसी रास्ते से आती है जिसे डॉ. गार्गी जैसे लोग फॉलो करते हैं. यानी सिस्टम को मत बदलो, उसके अंदर रहकर ही अपना रास्ता निकालो. यही सोच कुछ लोगों को सही लगती है और कुछ को नहीं. खैर, देखा जाए तो ‘ग्राम चिकित्सालय 2’ पहले सीजन से बेहतर है. इस बार कैरेक्टर्स ज्यादा एडवांस हैं, राइटिंग अच्छी है और इमोशनल मूमेंट्स ज्यादा दमदार हैं. सबसे बड़ी बात ये कि शो आखिरकार अपनी अलग पहचान बनाना शुरू कर देता है. यह अब पंचायत की वीक कॉपी नहीं लगता, बल्कि ग्रामीण हेल्थ सिस्टम की अपनी अलग दुनिया रचता है. हालांकि, अभी भी इसे पंचायत के शुरुआती दो सीजन जैसी पॉपुलैरिटी और सक्सेस तक पहुंचने के लिए काफी दूर तक जाना होगा, लेकिन इस बार ये शो सही रास्ते पर है. ऐसे में अगर आपको छोटे शहरों और गांवों की कहानियां पसंद हैं, हल्का-फुल्का ह्यूमर अच्छा लगता है और ऐसे कैरेक्टर्स देखने में मजा आता है जो हर मुश्किल के बावजूद हार नहीं मानते, तो ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ आपको देख लेनी चाहिए. ये कोई क्रांतिकारी सीरीज नहीं है, लेकिन एक ईमानदार कहानी जरूर है.
