Panun Kashmir: विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करने वाले ‘पनुन कश्मीर’ संगठन ने शनिवार को एक दिवसीय भूख हड़ताल की. इस दौरान कश्मीरी पंडितों ने समुदाय के खिलाफ हुए कथित नरसंहार को आधिकारिक तौर पर मान्यता देने की मांग उठाई. संगठन ने नरसंहार से संबंधित कानून बनाने और कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए एक अलग मातृभूमि के निर्माण की भी मांग की. पनुन कश्मीर के मुताबिक, यह भूख हड़ताल वर्ष 1990 में कश्मीरी पंडितों के पलायन के मामले में न्याय और जवाबदेही की मांग को लेकर चलाए जा रहे उसके व्यापक अभियान का हिस्सा थी.
नरसंहार को कानूनी मान्यता दिलाने की कोशिश
इसी बीच पनुन कश्मीर के चेयरमैन टीटो गंजू ने कहा कि माइग्रेट कश्मीरी पंडित बीते करीब 37 सालों से कथित तौर पर नरसंहार को आधिकारिक मान्यता दिलाने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने कहा कि हमने नरसंहार का सामना किया और हम चाहते हैं कि उस नरसंहार को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी जाए. उन्होंने दावा किया कि संसद में इस शब्द का इस्तेमाल जरूर हुआ है लेकिन अभी तक इसको आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है. अब आंदोलन कर रहे लोगों ने नरसंहार से जुड़े एक खास कानून बनाने की मांग की है. उनका तर्क है कि ‘जेनोसाइड कन्वेंशन’ पर हस्ताक्षर करने वाले देश के तौर पर भारत के लिए ऐसा कानून लाना जरूरी है.
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पनुन कश्मीर ने रखी ये मांग
गंजू ने कहा कि ‘पनुन कश्मीर’ ने साल 2020 में एक बिल का प्रस्ताव रखा था और वे चाहते थे कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीर से विचार-विमर्श करें. इसके बाद इस बिल को लेकर एक आयोग भी गठित किया जाए. उन्होंने कहा कि 37 साल बाद भी पीड़ित समुदाय को न्याय और रोजी-रोटी के लिए विरोध प्रदर्शन करना पड़ रहा है. संगठन ने सरकार के सामने तीन मुख्य मांगे रखी हैं, जिनमें मुख्य रूप से नरसंहार को मान्यता देना, नरसंहार विरोधी कानून बनाना और एक अलग मातृभूमि देना. उन्होंने बेरोजगार कश्मीरी पंडित युवाओं के लिए केंद्र सरकार के जरिए 15000 नौकरियों और विस्थापित परिवारों को मिलने वाली मासिक राहत राशि को बढ़कर कम से कम 25000 रुपये करने की भी मांग की है.
पंडितों को मिल रही धमकियों पर खड़े किए सवाल
दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री के रोजगार पैकेज के तहत घाटी में काम कर रहे पंडितों को आंतकवादियों की तरफ से मिल रही धमकियों पर सवाल खड़े किए थे. इस पर गंजू ने कहा कि असल में हम उन्हें बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते हैं. उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि नरसंहार विरोधी कानून बनाना जरूरी है ताकि उस स्थिति से निपटा जा सके जिसे उन्होंने नैरेटिव बनाना और जिम्मेदारी स्वीकार न करने की विफलता बताया.
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News Source: PTI
