Home Latest News & Updates ‘हमें खुशियां चाहिए, जिम्मेदारियां नहीं’, लिव-इन-रिलेशनशिप पर बोले मोहन भागवत, LGBTQ पर कही बड़ी बात

‘हमें खुशियां चाहिए, जिम्मेदारियां नहीं’, लिव-इन-रिलेशनशिप पर बोले मोहन भागवत, LGBTQ पर कही बड़ी बात

by Neha Singh 28 July 2026, 9:10 AM IST (Updated 28 July 2026, 2:06 PM IST)
28 July 2026, 9:10 AM IST (Updated 28 July 2026, 2:06 PM IST)
RSS Chief Mohan Bhagwat

Mohan Bhagwat on Live-in Relationship: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चीफ मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि शादी एक अनुशासन है जो धर्म सिखाता है, जबकि लिव-इन रिलेशनशिप की असलियत पूरी दुनिया में देखी जा सकती है. विश्व मांगल्य सभा द्वारा आयोजित ‘कंटेंपररी मदरहुड’ पर एक इवेंट में मोहन भागवत के जेन-Z, लिव-इन-रिलेशनशिप और LGBTQ समुदाय समेत नए जमाने के कई मुद्दों पर अपने विचार साझा किए.

माता-पिता और जेन-Z

भागवत ने कहा कि जेन Z जेनरेशन इमोशनल है और शांत दिमाग से नहीं सोचती. जो उन्हें पसंद आता है, वहीं असली लगता है. नई पीढ़ी के ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत पर माता-पिता की चिंताओं को दूर करते हुए उन्होंने कहा कि बड़ों को पहले वह काम करना चाहिए जो वे नई पीढ़ी से चाहते हैं. उन्होंने कहा “वह बदलाव बनें जो आप समाज में देखना चाहते हैं. सोशल मीडिया पर अपना समय कम करें. मोबाइल डिसिप्लिन का पालन करें. हम सरकार की ओर देखते हैं. हमारी परंपरा में, सरकार दूसरे नंबर पर है; समाज पहले. हम कहते हैं कि सरकार को यह कानून या वह कानून बनाना चाहिए… हम अपने घर पर ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं. हम बच्चों को मोबाइल डिसिप्लिन के बारे में बताते हैं, लेकिन हम खुद इतना मोबाइल से जुड़े हुए हैं कि अगर बच्चा रो रहा हो तो मां उसे मोबाइल दे देती है.” भागवत ने माता-पिता के मोबाइल फ़ोन डिसिप्लिन का पालन करने का समर्थन किया और नई पीढ़ी के बच्चों के सवालों के जवाब देने और परिवार से जुड़े अलग-अलग मुद्दों को सुलझाने के लिए परिवार के सदस्यों के बीच बातचीत के महत्व पर ज़ोर दिया.

लिव-इन-रिलेशनशिप

लिव-इन रिलेशनशिप का साफ तौर पर जिक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि यह समाज की गिरावट और वेस्टर्न कल्चर की अंधी नकल है. उन्होंने कहा, “शादी एक अनुशासन है, जो धर्म सिखाता है. समाज ने इसका विकल्प लिव-इन रिलेशनशिप को बना लिया है. इसके क्या नतीजे हैं? हमें ज़िम्मेदारियां नहीं चाहिए, लेकिन सारी खुशी चाहिए. जब ​​चाहें साथ रहें और जब न चाहें अलग हो जाएं. कोई जिम्मेदारी नहीं. इसके साथ क्या बढ़ेगा? क्या बढ़ रहा है, दुनिया भर में देखिए.” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि मॉडर्निटी की भी जरूरत है और समय के साथ बदलना भी देश की परंपराओं का एक नियम है.

LGBTQ हमारे समाज का हिस्सा हैं

मोहन भागवत ने कहा कि LGBTQ हमारे समाज का हिस्सा हैं और उन्हें हीन भावना से नहीं देखना चाहिए. उन्होंने बताया कि समाज में ऐसी प्रवृत्तियां हमेशा से रही हैं. कुछ प्रवृत्तियां जन्मजात होती हैं, प्रकृति से तय होती हैं. न तो वे खुद को बदल सकते हैं और न ही हम. कुछ प्रवृत्तियां बाद में मानसिक या शारीरिक झुकाव के कारण विकसित होती हैं. ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि यह समुदाय भारत के लिए नया नहीं है. भारतीय संस्कृति ने हमेशा उन्हें अपनाया है. पुराने समय में शिखंडी जैसे किरदारों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास में उनके साथ सम्मान से पेश आया गया.

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News Source: PTI

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