Home Top News PM Modi और Xi Jinping की मुलाकात से बदलेगी भारत-चीन की कहानी? रिश्तों में कितनी गर्माहट

PM Modi और Xi Jinping की मुलाकात से बदलेगी भारत-चीन की कहानी? रिश्तों में कितनी गर्माहट

by Preeti Pal 12 September 2026, 9:43 AM IST (Updated 24 September 2026, 12:37 PM IST)
12 September 2026, 9:43 AM IST (Updated 24 September 2026, 12:37 PM IST)
PM Modi और Xi Jinping की मुलाकात से बदलेगी भारत-चीन की कहानी? गलवान के बाद रिश्तों में कितनी आई गर्माहट

BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है. करीब सात साल बाद शी जिनपिंग का भारत दौरा ऐसे समय हुआ है, जब भारत और चीन अपने रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं. 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते बहुत तनावपूर्ण हो गए थे, लेकिन अब तस्वीर में कुछ बदलाव दिखाई दे रहे हैं.

कितना बदला माहौल?

2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने भारत-चीन संबंधों को बड़ा झटका दिया था. इस संघर्ष में भारत के 20 और चीन के कम से कम चार सैनिकों की मौत हुई थी. इसके बाद सीमा पर भारी सैन्य तैनाती हुई और दोनों देशों के बीच भरोसा काफी कमजोर हो गया. हालांकि, अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच एक समझौते के बाद सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में कदम बढ़े. इसके बाद सैन्य स्तर पर बातचीत आगे बढ़ी और कुछ इलाकों में सैनिकों की वापसी भी हुई. अब सीधे हवाई संपर्क और कारोबारी गतिविधियों को भी धीरे-धीरे बढ़ावा दिया जा रहा है.

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दोस्ती की वापसी या सिर्फ जरूरत?

मोदी-शी मुलाकात को पूरी तरह दोस्ती की वापसी कहना अभी जल्दबाजी होगी. दोनों देशों के बीच कई बड़े मुद्दे अब भी मौजूद हैं. सीमा विवाद उनमें सबसे अहम है. अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के दावे और सीमा पर जारी सैन्य मौजूदगी भारत की चिंताओं को कायम रखते हैं. इसके बावजूद दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ता काफी बड़ा है. चीन वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत रहा. वहीं, भारत ने चीन से करीब 132 अरब डॉलर का सामान आयात किया. यानी राजनीति में दूरी हो सकती है, लेकिन कारोबार की डोर अभी भी काफी मजबूत है.

रिश्ते सुधारने का मंच

भारत और चीन के बीच बातचीत के लिए ब्रिक्स एक अहम मंच बन चुका है. दोनों देश कई वैश्विक मुद्दों पर एक जैसी चिंताएं रखते हैं, खासकर बहुध्रुवीय दुनिया, ग्लोबल साउथ और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार को लेकर. भारत ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच के बजाय एक ऐसे मंच के रूप में देखता है, जहां अलग-अलग शक्तियों के साथ मिलकर काम किया जा सके. इसी वजह से नई दिल्ली एक तरफ अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रही है. वहीं, दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ भी संवाद बनाए हुए है.

भरोसा के लिए लंबा रास्ता

मोदी और शी की बातचीत से रिश्तों में एक नई शुरुआत की उम्मीद जरूर है, लेकिन दोनों देशों के बीच भरोसा पूरी तरह लौटने में समय लग सकता है. सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, सुरक्षा और चीन-पाकिस्तान संबंध जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं. ऐसे में ब्रिक्स समिट की ये मुलाकात एक बड़े संदेश की तरह देखी जा सकती है. कहा जा सकता है कि, भारत और चीन के बीच मुकाबला जारी है, लेकिन बातचीत के दरवाजे बंद नहीं हैं.

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