Saudi Arabia Oil Pipeline: मिडिल ईस्ट में चल रही जंग अब सिर्फ मिसाइलों और ड्रोन तक सीमित नहीं रह गई है. इसका असर समुद्र, तेल और दुनिया के कारोबार तक पहुंच चुका है. एक तरफ सऊदी अरब ने ड्रोन हमले के बाद अपनी बहुत ही अहम ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है. वहीं, दूसरी तरफ यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने रेड सी के दक्षिणी प्रवेश द्वार के पास रणनीतिक मायून द्वीप पर कब्जा कर लिया है. ये द्वीप बाब-अल-मन्देब स्ट्रेट के काफई करीब है, जिसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में गिना जाता है. इन दोनों घटनाओं ने मिडिल ईस्ट की पहले से तनावपूर्ण स्थिति को और खतरनाक बना दिया है. चिंता सिर्फ सऊदी अरब या यमन की नहीं है. सवाल ये है कि अगर तेल की सप्लाई और जहाजों की आवाजाही पर दबाव बढ़ता गया, तो इसका असर दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल से लेकर महंगाई और सामान की कीमतों तक कितना पड़ सकता है.

सऊदी की पाइपलाइन क्यों है इतनी खास?
सऊदी अरब ने शुक्रवार को बताया कि ड्रोन हमले के बाद उसने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को एहतियाती तौर पर बंद कर दिया है. ये पाइपलाइन करीब 1,200 किलोमीटर लंबी है. ये देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को रेड सी के किनारे स्थित यानबु पोर्ट तक पहुंचाती है. इस पाइपलाइन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि ये सऊदी अरब को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचाती है. होर्मुज में इस समय ईरान से जुड़ा तनाव और जहाजों पर हमले पहले ही वैश्विक तेल बाजार की चिंता बढ़ा रहे हैं. ऐसे में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए एक तरह का वैकल्पिक रास्ता बन गई थी. रिपोर्टों के मुताबिक ये पाइपलाइन रोजाना करीब 40 से 50 लाख बैरल तेल ले जाने की क्षमता रखती है. इसका मतलब है कि अगर इसका संचालन लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो वैश्विक तेल बाजार पर दबाव और ज्यादा बढ़ सकता है. सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने इसे फिलहाल एहतियाती कदम बताया है. हालांकि, पाइपलाइन कब तक बंद रहेगी, इसे लेकर तत्काल कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं दी गई.
ड्रोन हमला कहां से आया?
सऊदी अरब ने इस हमले के लिए इराक से आए कई ड्रोन को जिम्मेदार ठहराया है. सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह फिलहाल जवाबी हमला नहीं करेगा, ताकि इराक की सरकार को अपने स्तर पर कार्रवाई करने का मौका मिल सके. इसके बाद इराक की सरकार ने भी जांच शुरू कर दी. रिपोर्टों के मुताबिक इराकी अधिकारियों ने ये पता लगाया कि सऊदी अरब को निशाना बनाने वाले हमले मेसैन प्रांत के एक ठिकाने से शुरू किए गए थे. इसके बाद वहां के ऑपरेशनल कमांडर को पद से हटा दिया गया. यानी एक तरफ सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव है. दूसरी तरफ इराक में मौजूद ईरान समर्थित समूहों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम ने मिडिल ईस्ट की जंग को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है.

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कहानी पहुंचती है रेड सी तक
पाइपलाइन विवाद के साथ ही यमन से आई खबर ने दुनिया का ध्यान और खींच लिया. ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने मायून आइलैंड पर कब्जा कर लिया. इसे पेरिम आइलैंड भी कहा जाता है. ये छोटा और देखने में लगभग बंजर ज्वालामुखीय आइलैंड है, लेकिन इसकी लोकेशन इसकी खासियत है. ये बाब-अल-मन्देब स्ट्रेट के बीच है. इस समुद्री मार्ग पर नजर रखने के लिहाज से इसका रणनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है. यही वो जगह है जहां रेड सी और अदन की खाड़ी (Gulf of Aden) एक-दूसरे से जुड़ते हैं. इसलिए यहां किसी भी सैन्य समूह की मजबूत मौजूदगी का मतलब है कि वो दुनिया के बड़े व्यापारिक समुद्री रास्ते पर दबाव बना सकता है. ताजा रिपोर्टों के अनुसार हूतियों ने रेड सी के पश्चिमी तट पर तेजी से बढ़त बनाई है. उन्होंने मोखा जैसे महत्वपूर्ण इलाकों पर भी कब्जा किया है. कुछ रिपोर्टों में बाकी आइलैंड्स पर भी उनकी पकड़ मजबूत होने की बात कही गई है.
बाब अल-मन्देब क्यों है खास?
अब एक आसान उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जाने वाला कोई ऐसा रास्ता है, जिससे हर दिन हजारों करोड़ रुपये का सामान गुजरता है. अगर उसी रास्ते के एंट्री गेट पर किसी लड़ाकू संगठन का प्रभाव बढ़ जाए, तो दुनिया भर के कारोबारी अचानक सतर्क हो जाएंगे. बाब अल-मन्देब कुछ ऐसा ही समुद्री चेकपॉइन्ट है. रेड सी के रास्ते यूरोप और एशिया के बीच सामान और ऊर्जा की बड़ी मात्रा पहुंचती है. इसके आगे स्वेज कनाल आता है, जो जहाजों के लिए एशिया और यूरोप के बीच बहुत छोटा समुद्री रास्ता बनाता है. अगर बाब अल-मन्देब असुरक्षित होता है, तो जहाजों को अफ्रीका के चारों ओर घूमकर जाने का ऑप्शन चुनना पड़ सकता है. इससे यात्रा का समय, ईंधन खर्च और शिपिंग कोस्ट बढ़ जाती है. लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस के आंकड़े बताते हैं कि हूती हमलों के बाद बाब अल-मन्देब से गुजरने वाला समुद्री ट्रैफिक पहले ही सामान्य स्तर से काफी नीचे जा चुका था. 2023 के आखिर में शुरू हुई रेड सी क्राइसेस के दौरान ट्रैफिक में लगभग 60 फीसदी तक गिरावट देखी गई थी. हालांकि, बाद में कुछ गतिविधियां वापस आईं. लेकिन सऊदी लिंक्ड शिपिंग पर हूती दबाव ने जोखिम फिर बढ़ा दिया.

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रेड सी क्यों बना दूसरा रास्ता?
ईरान वॉर के दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ा तो सऊदी अरब ने रेड सी के रास्ते अपने तेल निर्यात को बढ़ाना शुरू किया. यानबू बंदरगाह इस रणनीति में बहुत महत्वपूर्ण बन गया. यानी सऊदी अरब ने सोचा कि अगर होर्मुज में दिक्कत है, तो रेड सी वाला रास्ता इस्तेमाल किया जाए. ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन के जरिए तेल को देश के पूर्व से यानबु तक लाया जा सकता था. फिर वहां से जहाजों के जरिए तेल आगे भेजा जा सकता था. लेकिन अब समस्या ये है कि जिस वैकल्पिक रास्ते को सऊदी अरब ने होर्मुज के दबाव से बचने के लिए चुना था, उसी के दक्षिणी हिस्से में हूतियों की सैन्य मौजूदगी बढ़ गई है. लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस के अनुसार होर्मुज संकट के बाद यानबु से तेल निर्यात में तेज वृद्धि हुई थी, लेकिन हूती हमलों और समुद्री नाकेबंदी के खतरे ने इस रास्ते पर दबाव बढ़ा दिया.
100 डॉलर के पार तेल
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सीधा असर ऑयल मार्केट पर दिखाई दे रहा है. मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के साथ कच्चे तेल की कीमतें इस हफ्ते 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं. बाजार के लिए चिंता ये् है कि अगर होर्मुज और बाब अल-मन्देब दोनों समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ता है, तो दुनिया के लिए सुरक्षित तेल आपूर्ति के विकल्प कम हो सकते हैं. तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक नहीं रहता. महंगा क्रूड यानी महंगा ट्रांसपोर्ट, महंगी मैन्युफैक्चरिंग और कई मामलों में महंगी रोजमर्रा की चीजें भी हो सकती हैं. इसीलिए दुनिया की नजर अब सिर्फ वॉर के मैदान पर नहीं, बल्कि समुद्री रास्तों और तेल टैंकरों की आवाजाही पर भी है.

क्या है हूतियों की रणनीति?
हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ रेड सी में समुद्री दबाव बढ़ाने की घोषणा की है. उनका कहना है कि ये कार्रवाई यमन के उन इलाकों पर सऊदी नाकेबंदी के जवाब में है, जहां हूतियों का नियंत्रण है. इसका मतलब साफ है कि, हूतियों का लक्ष्य सिर्फ जमीन पर कब्जा करना नहीं, बल्कि सऊदी अरब की आर्थिक और ऊर्जा क्षमता पर भी दबाव बनाना है. वैसे, मायून द्वीप से पहले हूती लड़ाकों ने यमन के रेड सी तट पर मोखा बंदरगाह पर भी बढ़त बनाई. ये जगह बाब अल-मन्देब से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर है. सऊदी अरब ने मोखा पर कब्जे के बाद वहां के एयरपोर्ट को निशाना बनाया. हालांकि, तत्काल किसी बड़े नुकसान या मौत की खबर नहीं आई.
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अब कहां से भेजेगा तेल?
अगर रेड सी का दक्षिणी रास्ता लंबे समय तक जोखिम भरा रहता है, तो सऊदी अरब को अपने तेल के लिए वैकल्पिक रूट ढूंढ़ने होंगे. एक ऑप्शन ये है कि तेल को रेड सी से उत्तर की तरफ भेजकर स्वेज कनाल के जरिए बीच में ले जाया जाए. दूसरा ऑप्शन मिस्र के जरिए पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करना है. लेकिन दोनों रास्ते ज्यादा लंबे और महंगे हैं. खासकर एशियाई ग्राहकों के लिए इससे समय और लागत दोनों बढ़ सकते हैं. लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस ने भी चेतावनी दी है कि बाब अल-मन्देब में खतरा बढ़ने से टैंकर ऑपरेटर को रास्ता बदलना पड़ सकता है. इससे शिपिंग कोस्ट बढ़ सकता है.

ईरान ने क्या कहा?
इस बीच ईरान ने खुलकर हूतियों का समर्थन किया है. ईरानी सरकार ने सऊदी अरब से हूती-नियंत्रित इलाकों की नाकेबंदी खत्म करने और बातचीत की मेज पर लौटने की अपील की. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड की तरफ से भी संकेत दिया गया कि यमन को किसी संभावित ईरान-अमेरिका समझौते का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम की सबसे चिंताजनक तस्वीर यमन के आम लोगों से जुड़ी है. 2022 के बाद यमन में कुछ शांति बनी हुई थी. लेकिन रेड सी तट पर अचानक बढ़ी लड़ाई ने उस शांति को खतरे में डाल दिया है. यमन पहले ही सालों की जंग से तबाह है. संघर्ष ने करीब 1.5 लाख लोगों की जान ली और करोड़ों लोगों इस जंग की आग में धकेला. अब पिछले एक हफ्ते में ही 46,000 से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं. कई परिवार अपना जरूरी सामान तक ठीक से नहीं ले पाए. अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी इसका असर पड़ा है.
अब आगे क्या?
फिलहाल मिडिल ईस्ट की इस नई स्थिति में तीन मोर्चे सबसे अहम हैं, तेल, समुद्री रास्ते और यमन की जमीन. अगर सऊदी अरब की ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन जल्दी शुरू हो जाती है और बाब अल-मन्देब में जहाजों की आवाजाही सुरक्षित रहती है, तो बाजार कुछ राहत की सांस ले सकता है. लेकिन अगर हूतियों की बढ़त जारी रहती है, साऊदी के तेल ढांचे पर हमले बढ़ते हैं और होर्मुज भी तनाव में रहता है, तो दुनिया को संकट का सामना करना पड़ सकता है.
News Source: PTI
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