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चीनी महंगी होने के पीछे इथेनॉल है कारण? सरकार ने बताई सच्चाई, समझें मिठास के महंगे होने का पूरा गणित

by Neha Singh 24 August 2026, 3:24 PM IST (Updated 24 August 2026, 3:28 PM IST)
24 August 2026, 3:24 PM IST (Updated 24 August 2026, 3:28 PM IST)
Sugar Price Hike

Sugar Price Hike: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है. लेकिन इस बार देश में चीनी कम पड़ गई है. लगभग 10 साल बाद ऐसी स्थिति बनी है जब भारत को चीनी बाहर से मंगानी पड़ रही है. चीनी की कमी होने के कारण उसके दाम में तेजी से उछाल आया है. 40-50 रुपए प्रति किलो मिलने वाली चीनी सीधा छलांग लगाकर 65-70 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गई है. इससे आम आदमी से लेकर दुकानदार और बड़ी कंपनियों को भी झटका लगा है. साथ ही रक्षा बंधन और जन्माष्टमी जैसे त्योहारों का मौसम करीब आ गया है. ऐसे में मिठाई कारोबारियों के लिए चीनी की बढ़ती कीमत चिंता का बड़ा कारण बन गई है.

चीनी की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे ज्यादा चर्चा इथेनॉल की हो रही है. माना जा रहा है कि गन्ने का एक हिस्सा चीनी की जगह इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने से बाजार में चीनी की उपलब्धता पर असर पड़ा है, लेकिन क्या चीनी की बढ़ी हुई कीमतों का मुख्य कारण इथेनॉल है? या उत्पादन में उतार-चढ़ाव, स्टॉक और बाजार की मांग जैसे दूसरे कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं? एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीनी की कीमतों को सिर्फ इथेनॉल से जोड़ने से पूरी कहानी नहीं पता चलती. इस खबर में समझें कि चीनी की कीमतों में मौजूदा उछाल के पीछे की असली कारण क्या हैं.

अचनाक बढ़ी कीमत

बाजारों में रिटेल चीनी की कीमत 70 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई है. पिछले महीने ही कीमतों में 20 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है, जबकि पिछले चार से पांच दिनों में अचानक 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है. गुड़, बतासा (चीनी की कमी) और नकुलदाना जैसे चीनी से जुड़े उत्पादों की कीमतें में भी इसी तरह की तेजी देखी जा रही है. चीनी की कमी और त्योहारों का सीजन देखते हुए केंद्र सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी आयात करने की इजाजत दी है, यह कदम आखिरी बार एक दशक पहले उठाया गया था. यह चीनी ब्राजील से मंगाई जा रही है. सरकार और नेशनल कोऑपरेटिव शुगर फेडरेशन (NCSF) के मुताबिक, चीनी की पहली बड़ी खेप दीवाली से ठीक पहले 15 अक्तूबर, 2026 से पहले भारत पहुंच जाएगी. इस पूरी ड्यूटी फ्री चीनी को भारत में आयात करने की आखिरी तारीख 31 अक्तूबर तय की गई है.

होल्डिंग पर रोक

इसी के साथ सरकार ने चीनी की जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए नए नियम लागू किए हैं. सरकार ने हलवाई, कन्फेक्शनरी मेकर्स, सॉफ्ट ड्रिंक, बिस्किट निर्माता जैसी बल्क कस्टमर्स पर स्टॉकहोल्डिंग लिमिट भी लगा दी है. इसके तहत जो कंपनियां या यूनिट्स महीने में 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं, उन कंपनियों को अब ज्यादा से ज्यादा 15 दिन की चीनी रखने की इजाजत होगी. पहले यह लिमिट 30 दिन थी, लेकिन अब इसे आधा कर दिया गया है. इसके अलावा देश भर के सभी चीनी डीलरों के लिए 400 टन के स्टॉक की लिमिट तय की गई है. कोई भी डीलर स्टॉक मिलने की तारीख से 30 दिनों से ज्यादा स्टॉक नहीं रख सकता है. यह नए नियम 1 सितंबर, 2026 से 30 नवंबर, 2026 तक पूरे देश में लागू रहेंगे.

इथेनॉल पर सरकार की सफाई

सरकार ने शुक्रवार को उन दावों को खारिज कर दिया कि इथेनॉल प्रोडक्शन के लिए चीनी का इस्तेमाल करने से चीनी की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. कंज्यूमर अफेयर्स, फूड और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन मिनिस्ट्री ने एक बयान में कहा, “चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी का कारण इथेनॉल प्रोडक्शन के लिए चीनी का इस्तेमाल करना बताना गलत है.” पेट्रोल में डोपिंग के लिए इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा, असल में 2022-23 के लगभग 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 सीजन में लगभग 9 प्रतिशत रह गया है, जबकि भारत का लगभग तीन-चौथाई इथेनॉल प्रोडक्शन अब अनाज, खासकर मक्के से आता है.

सरकार ने चीनी की कीमत में बढ़ोतरी की वजह उम्मीद से कम चीनी प्रोडक्शन, त्योहारों के मौसम से पहले ज़्यादा डिमांड, मौसम से फसल को नुकसान, ग्लोबल सप्लाई में कमी और इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी को बताया.

अनुमान से कम उत्पादन

मई में रेटिंग एजेंसी ICRA की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 (SY2026) के लिए कुल चीनी उत्पादन पिछले साल के 29.6 मिलियन टन के मुकाबले 5.03 परसेंट बढ़कर 31.10 मिलियन टन होने का अनुमान है. इसमें कहा गया है कि इथेनॉल की ओर 3.1 मिलियन टन के अनुमानित डायवर्जन के बाद नेट चीनी प्रोडक्शन 28 मिलियन टन रहने की संभावना है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 28.3 मिलियन टन की घरेलू खपत और पहले से किए गए 0.7 मिलियन टन के एक्सपोर्ट को देखते हुए, सितंबर 2026 तक चीनी का क्लोजिंग स्टॉक लगभग 4.3 मिलियन टन होने की उम्मीद है, जबकि पिछले साल यह 5.3 मिलियन टन था. साथ ही, यह भी कहा गया है कि 4.3 मिलियन टन चीनी लगभग दो महीने ही चल पाएगी, जो पिछले सालों की तुलना में थोड़ा कम इन्वेंट्री लेवल दिखाता है.

गन्ना उत्पादक राज्यों ने सीजन 2025-26 के लिए शुरुआत में लगभग 34.3 मिलियन टन अनुमान था, लेकिन असल उत्पादन घटकर लगभग 30.6 मिलियन टन रहने की उम्मीद है, जो लगभग 11% (3.7 मिलियन टन) की बड़ी गिरावट दिखाता है.

गन्ना उत्पादन में कमी

कृषि मंत्रालय के डेटा के मुताबिक, 2022-23 में देश में गन्ने की खेती का एरिया लगभग 5.9 मिलियन हेक्टेयर था, जो 2024-25 में घटकर लगभग 5.45 मिलियन हेक्टेयर रह गया. इसका मतलब है कि दो साल में लगभग 0.45 मिलियन हेक्टेयर की कमी आई है. इसी दौरान, कुल गन्ने का प्रोडक्शन भी लगभग 490 मिलियन टन से घटकर लगभग 453 मिलियन टन रह गया. इसका सीधा असर चीनी की उपलब्धता पर पड़ा.

खराब मौसम और बीमारियां

Sugar Price Hike

सरकार ने गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारियों के साथ-साथ ज़्यादा बारिश से हुए पानी के जमाव को इसकी कमी की वजह बताया. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में गन्ने को भारी नुकसान हुआ है. गन्ने की सबसे लोकप्रिय किस्म (Co-0238) में रेड रॉड और टॉप बोरर जैसे कीड़ो और बीमारियों का गंभीर हमला हुआ है. कुछ इलाकों में भारी बारिश से जलजमाव हो गया और फसल खराब हो गई. कुछ जगहों पर मानसून की कमी और लेट बारिश से खेतों में सूखे जैसी स्थिति बन गई, जिससे गन्ने में रस नहीं बन पाया.

त्योहारों के मौसम में डिमांड

भारत में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार अगस्त और नवंबर के बीच आते हैं. इस दौरान, कन्फेक्शनरों, मिठाई बनाने वालों और कोल्ड ड्रिंक कंपनियों की तरफ से चीनी की बल्क डिमांड काफी बढ़ जाती है. सप्लाई में कमी और डिमांड में अचानक बढ़ोतरी से कीमतों में तेजी आई है.

पेराई का सीजन छोटा हुआ

नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने कहा कि महाराष्ट्र में चीनी मिलों का पेराई का मौसम भी छोटा हो गया है. जो मिलें पहले लगभग 150 दिन पेराई करती थीं, वे अब केवल 100 दिन ही पेराई कर रही हैं. उनके अनुसार, गन्ना किसानों के लिए फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) और चीनी के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) मिलों पर आर्थिक दबाव डाल रहे हैं.

दुनिया भर में बढ़ी चीनी की कीमतें

चीनी की सप्लाई में कमी सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ग्लोबल घटना है. 2026-27 के लिए दुनिया भर में चीनी की कमी लगभग 33 LMT होने का अनुमान है. मौसम की स्थिति को लेकर चिंताओं ने वैश्विक स्तर पर असर डाला है। इस वजह से इंटरनेशनल चीनी की कीमतें 30 जून 2026 को $474 प्रति टन से तेजी से बढ़कर 20 अगस्त 2026 को $552 प्रति टन हो गई हैं. यह दो महीने से भी कम समय में 16% से ज्यादा की बढ़ोतरी है.

Sugar Price Hike

जमाखोरी की आशंका

जब मार्केट में यह खबर फैली कि इस बार स्टॉक कम है, तो कुछ बड़े ट्रेडर्स और सट्टेबाजों ने मुनाफा कमाने के लिए चीनी जमा करना (ब्लैक मार्केटिंग) शुरू कर दिया. इससे मार्केट में चीनी की आर्टिफिशियल कमी हो गई और रिटेल कीमतें ₹55 से ₹65 प्रति kg तक पहुंच गईं.

सरकार की सलाह

सरकार ने कहा कि इथेनॉल प्रोग्राम ने चीनी इंडस्ट्री में स्ट्रक्चरल सरप्लस को ठीक करने, मिल फाइनेंस को मजबूत करने और किसानों को पेमेंट में सुधार करने में मदद की है. भारत आमतौर पर सालाना 32-34 मिलियन टन चीनी का प्रोडक्शन करता है, जबकि घरेलू खपत लगभग 28-29 मिलियन टन है. सरप्लस सालों में, ज़्यादा इन्वेंट्री मिलों में वर्किंग कैपिटल को लॉक कर सकती है और गन्ना किसानों को पेमेंट में देरी का कारण बन सकती है.

सरकार ने कहा कि 20 अगस्त तक, 2025-26 सीजन के लिए गन्ने का 97 प्रतिशत बकाया चुका दिया गया था. इसमें यह भी कहा गया है कि इंडस्ट्री की बेहतर फाइनेंस की वजह से सरकारी मदद पर उसकी निर्भरता कम हो गई है, 2014 और 2021 के बीच लगभग 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई, लेकिन 2021-22 के बाद से ऐसी किसी सब्सिडी की घोषणा नहीं की गई है. सरकार ने राज्यों और मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की भी सलाह दी है. इससे अक्टूबर में चीनी का प्रोडक्शन बढ़कर 1 मिलियन टन से ज़्यादा होने की उम्मीद है, जबकि आम तौर पर यह 300,000-400,000 टन होता है, जिससे त्योहारों के मौसम में सप्लाई मजबूत करने में मदद मिलेगी.

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