Home Latest News & Updates उम्र 99, जज्बा आज भी जवान! आजादी के लिए 17 साल की उम्र में घर से निकले भवानीशंकर की प्रेरणादायी कहानी

उम्र 99, जज्बा आज भी जवान! आजादी के लिए 17 साल की उम्र में घर से निकले भवानीशंकर की प्रेरणादायी कहानी

by Nikul Patel 14 August 2026, 3:27 PM IST (Updated 14 August 2026, 3:42 PM IST)
14 August 2026, 3:27 PM IST (Updated 14 August 2026, 3:42 PM IST)
Inspiring Story Bhavanishankar Pandya

Bhavanishankar Pandya : 99 वर्ष की उम्र…जीवन के अनगिनत पड़ाव पार कर चुके इस पड़ाव पर शरीर भले ही उम्र का एहसास कराता हो, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनके विचार, संकल्प और देशप्रेम पर उम्र का कोई असर नहीं होता. अहमदाबाद में रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी भवानीशंकर हरगोविंददास पंड्या ऐसे ही प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं. महज 17 वर्ष की किशोर उम्र में देश की आजादी के लिए घर छोड़ने वाले भवानीशंकर पंड्या आज 99 वर्ष की उम्र में भी जब देश की बात करते हैं तो उनके भीतर वही युवा जोश और उत्साह दिखाई देता है. उनके लिए आजादी इतिहास की किताब का कोई अध्याय नहीं है, बल्कि उन्होंने आजादी को जिया है.

इतिहास को जीवंत रूप में देखने जैसा

उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत देखी, स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, गिरफ्तारी दी, जेल की सजा भुगती और 15 अगस्त 1947 को देश को आजाद होते अपनी आंखों से देखा. यही वजह है कि भवानीशंकर पंड्या की बातें इतिहास पढ़ने जैसी नहीं, बल्कि इतिहास को जीवंत रूप में देखने जैसा अनुभव कराती हैं. 25 मई 1927 को महेमदाबाद तहसील के सरसवणी गांव में जन्मे भवानीशंकर पंड्या का बचपन ही राष्ट्रसेवा के संस्कारों के बीच बीता. सरसवणी गांव राष्ट्रसंत रविशंकर महाराज की जन्मभूमि के रूप में जाना जाता है और भवानीशंकर पंड्या का घर महाराज के घर के ठीक सामने था. बचपन से ही रविशंकर महाराज का सानिध्य, उनके विचार और सेवा भावना भवानीशंकर पंड्या के मन पर गहरी छाप छोड़ते रहे. यही संस्कार आगे चलकर देश के लिए कुछ कर गुजरने के संकल्प में बदल गए.

आजादी के लिए घर छोड़ने का फैसला किया

उस दौर में स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक आजादी हासिल करना नहीं था. इसका अर्थ था कि गुलामी की बेड़ियां तोड़ना, अन्याय के खिलाफ खड़ा होना और देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करना. ‘करो या मरो’ के आह्वान के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े. अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीयों के साथ होने वाला अन्याय और अपमान भवानीशंकर पंड्या को भीतर तक विचलित करता था. महात्मा गांधी के विचारों और देशभक्ति के वातावरण से प्रेरित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए. वर्ष 1939 में हरिपुरा में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में सेवा करने का अवसर उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा. इसके बाद वर्ष 1942 के ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई. जब महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान से पूरे देश में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित हुई, तब भवानीशंकर पंड्या ने भी अपनी युवा जिंदगी देश के नाम समर्पित कर दी.

एक वर्ष साबरमती जेल में बिताया

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का परिणाम गिरफ्तारी के रूप में सामने आया. भवानीशंकर पंड्या को बोरसद जेल में 21 दिन का कारावास भुगतना पड़ा. इसके बाद अदालत ने उन्हें एक वर्ष की सजा सुनाई और उन्हें साबरमती जेल भेज दिया गया. साबरमती जेल के दिन उनके जीवन की ऐसी स्मृतियां हैं जिन्हें वे आज भी गर्व के साथ याद करते हैं. जेल की चारदीवारी के भीतर उन्हें देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे कई राष्ट्रसेवकों के साथ रहने का अवसर मिला. लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर, जुगतराम दवे, पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, ईश्वरभाई पटेल, धीरुभाई देसाई और मोतीभाई बारवटिया जैसे राष्ट्रसेवकों के साथ जेलवास उनके लिए संघर्ष के साथ-साथ राष्ट्रसेवा के मूल्यों को समझने का अनूठा अनुभव रहा. जेल के बाहर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष चल रहा था, तो जेल के भीतर भी स्वतंत्र भारत का सपना जीवंत था.

अंग्रेजी शासन का अंत हुआ

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ. अंग्रेजी शासन का अंत हुआ, लेकिन भवानीशंकर पंड्या के लिए राष्ट्रसेवा समाप्त नहीं हुई. केवल उसका स्वरूप बदल गया. रविशंकर महाराज के संस्कारों से प्रेरित होकर उन्होंने ‘शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण’ का रास्ता अपनाया. शिक्षक के रूप में करियर शुरू करने के बाद उन्होंने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में प्रिंसिपल और निदेशक के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं. उनके लिए कक्षा केवल पढ़ाने की जगह नहीं थी, बल्कि देश के भविष्य को गढ़ने का कार्यस्थल थी. गरीब और जरूरतमंद विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किए. उनके मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और विभिन्न क्षेत्रों में सफल हुए. एक दौर में वे देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए युवाओं के साथ सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे और दूसरे दौर में उसी नई पीढ़ी को शिक्षित कर राष्ट्रनिर्माण के लिए तैयार कर रहे थे. स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनकी सेवाओं के सम्मान में गुजरात सरकार की ओर से उन्हें प्लॉट आवंटित किया गया और पेंशन भी मंजूर की गई. लेकिन राष्ट्रसेवा को जीवन में सर्वोच्च स्थान देने वाले भवानीशंकर पंड्या ने पेंशन स्वीकार करने से इनकार कर दिया. उनकी भावना थी कि इस राशि का उपयोग देश और समाज के हित में किसी अन्य कल्याणकारी कार्य के लिए किया जाए. पेंशन का त्याग उनके लिए केवल सरकारी लाभ को अस्वीकार करना नहीं था, बल्कि यह उनके पूरे जीवन दर्शन का प्रतिबिंब था.

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मुझे अभी पांच साल और जीना है’

99 वर्ष की उम्र में भी भवानीशंकर पंड्या के भीतर सेवानिवृत्ति का भाव नहीं है। देश की प्रगति की बात करते समय आज भी उनकी आंखों में युवा जैसी चमक और भविष्य के प्रति विश्वास दिखाई देता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की चर्चा करते हुए वे भावुक होकर कहते हैं कि वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें अभी पांच वर्ष और आयु मिले, ताकि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश का स्वर्णिम इतिहास देख सकें।उनके ये शब्द केवल एक बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी की भावना नहीं हैं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य में अटूट विश्वास रखने वाले एक राष्ट्रप्रेमी की अंतरात्मा की आवाज हैं।वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में लाख-लाख बधाई देते हैं और भारत को और अधिक शक्तिशाली, समृद्ध तथा वैभवशाली बनते देखने की इच्छा व्यक्त करते हैं.

आजादी कोई सहज उपहार नहीं थी

भवानीशंकर पंड्या का जीवन राष्ट्रसेवा के दो अमर अध्यायों की कहानी है. पहले अध्याय में उन्होंने गुलामी के खिलाफ संघर्ष किया, गिरफ्तारी दी और जेल की सजा भुगती. दूसरे अध्याय में उन्होंने शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बनाया और कई पीढ़ियों के भविष्य को आकार दिया. आज जब स्वतंत्र भारत में जन्मी नई पीढ़ी आजादी और अपने अधिकारों को सहज रूप से अनुभव करती है, तब भवानीशंकर पंड्या जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनगाथा हमें याद दिलाती है कि आजादी कोई सहज उपहार नहीं थी. इसके पीछे असंख्य युवाओं का तप, त्याग, संघर्ष, जेलवास और बलिदान छिपा है. भवानीशंकर पंड्या उस संघर्ष के केवल साक्षी नहीं हैं, बल्कि वे उस संघर्ष के जीवंत दस्तावेज हैं।देशसेवा की कोई उम्र सीमा नहीं होती. सेवा करने का तरीका बदल सकता है, समय बदल सकता है, पीढ़ियां बदल सकती हैं, लेकिन सच्चा देशप्रेम कभी सेवानिवृत्त नहीं होता. इस स्वतंत्रता पर्व पर भवानीशंकर पंड्या जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करना केवल अतीत को याद करना नहीं है, बल्कि वर्तमान को जिम्मेदारी और भविष्य को संकल्प से जोड़ना है.

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