Ken-Betwa Link Project: देश में इस समय दो बड़े विरोध प्रदर्शनों की चर्चा हो रही है. पहला राजधानी दिल्ली में हो रहा है और दूसरा मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में हो रहा था, जिसे आज सुबह प्रशासन ने खत्म करवा दिया. मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक और दूसरे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के खिलाफ 15 दिन से चल रहा विरोध प्रदर्शन रविवार सुबह खत्म हो गया. पुलिस ने धरनास्थल को जबरन खाली करा दिया और प्रदर्शनकारियों को उनके गांवों में वापस भेज दिया. यह प्रदर्शन सबसे अलग था, क्योंकि यहां ज्यादातर महिलाएं थीं. सरकार का विरोध करने के लिए लोगों ने प्रतीकात्मक रूप से संदेश दिया. यहां जल सत्याग्रह, चिता आंदोलन और फांसी आंदोलन किया गया.
सरकारी की नई परियोजनाओं का अक्सर विरोध किया जाता है. सरकार विकास को प्राथमिकता देती है और प्रभावित लोग अपने घर और जमीन बचाने को. आदिवासी लोगों के लिए घर-जमीन का मूल्य और ज्यादा बढ़ जाता है, क्योंकि उनके पास इसके अलावा कुछ और नहीं होता. छतरपुर जिले के कूपी गांव में बराना नदी के पास भी लोग अपनी जमीन खोने के डर से लड़ रहे थे . इस खबर में आप जानेंगे कि दो नदियों को जोड़ने का सरकार का मेगा प्रोजेक्ट केन-बेतवा लिंक क्या है और आदिवासी लोग इसके खिलाफ क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं.
आज सुबह प्रदर्शनकारियों को हटाया गया
इस प्रदर्शन का नेतृत्व अमित भटनागर कर रहे थे, जो पिछले 11 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे. वे प्रोजेक्ट को लागू करने में कथित गड़बड़ियों पर कार्रवाई और पर्यावरण और कानूनी नियमों का पालन करने की मांग कर रहे थे. प्रदर्शनकारी नेता दिव्या अहिरवार ने आरोप लगाया कि रविवार सुबह करीब 5 बजे बड़ी संख्या में पुलिस वाले साइट पर पहुंचे और भटनागर और दूसरे प्रदर्शनकारियों को मीडिया से बात करने से पहले ही हिरासत में ले लिया. अहिरवार ने दावा किया कि अगर भटनागर या किसी भी प्रदर्शनकारी को कोई नुकसान होता है तो प्रशासन जिम्मेदार होगा और उन्होंने लोगों से भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने की अपील की.

एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस आदित्य पटले ने बताया कि प्रदर्शनकारियों को बसों में उनके गांव पहुंचाया गया. पन्ना जिले के लोगों को वहां से गांव भेज दिया गया, जबकि छतरपुर और आस-पास के इलाकों के लोगों को उनके गांव बसों में छोड़ दिया गया. पटले ने इस बात से इनकार किया कि किसी भी प्रदर्शनकारी को गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया था.
क्यों हटाए गए प्रदर्शनकारी
जब आंदोलन को गैर-लोकतांत्रिक तरीके से तोड़े जाने के बारे में पूछा गया, तो ASP ने कहा कि प्रदर्शन की जगह एक निर्माणाधीन पुल के नीचे थी. दूसरी बात उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी नदी में तब भी आंदोलन कर रहे थे जब पानी का लेवल बढ़ रहा था, जिससे डूबने का खतरा था. पटले ने यह भी कहा कि सभी प्रदर्शनकारी पन्ना जिले के रहने वाले थे और अगर उन्हें कोई शिकायत थी, तो उन्हें वहीं प्रदर्शन करना चाहिए था. उनका उस जगह से कोई लेना-देना नहीं था जहां वे प्रदर्शन कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि अमित भटनागर काफी समय से भूख हड़ताल पर थे और उनकी तबीयत बिगड़ रही थी. इसलिए उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था. ऑफिसर ने आगे कहा कि बाकी सभी प्रदर्शनकारियों को धरनास्थल से हटा दिया गया है और सुरक्षित उनके गांव भेज दिया गया है.
महिलाओं और बच्चों ने भी किया सत्याग्रह
इस प्रदर्शन में बुजुर्ग लोग, आदिवासी महिलाएं और बच्चे भी शामिल हुए. प्रदर्शन पिछले दो हफ्ते से छतरपुर जिले के कुपी गांव के पास बराना नदी के किनारे चल रहा था. प्रदर्शन करने वाले लोगों ने प्रतीकात्मक रूप से ‘जल सत्याग्रह’, ‘चिता (अंतिम संस्कार) सत्याग्रह’ और ‘फांसी सत्याग्रह’ भी शुरू किया था.
15 दिनों से ‘अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’ और ‘भारत माता की जय’ के नारों से नदी गूंज रही थी. जय किसान संगठन के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में यहां लोगों ने अपना विरोध दर्ज करने और अपनी लाचारी दिखाने के लिए अलग-अलग और हैरान करने वाले तरीके अपनाए.

पानी में डूबे, चिता पर लेटे
इस आंदोलन के दौरान, आदिवासी गांववालों ने अपने खेतों की मिट्टी हाथों में लेकर कसम खाई कि वे किसी भी कीमत पर अपनी पुश्तैनी जमीन नहीं छोड़ेंगे. मानसून के दौरान उन्होंने गले तक पानी में डूबकर जल सत्याग्रह किया. जैसे-जैसे आंदोलन तेज हुआ, कई आदिवासी औरतों और किसानों ने अपने गले में फंदा डालकर प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि प्रशासन बिना किसी पहले से सूचना दिए, जमीन के बदले जमीन दिए बिना और बिना सही मुआवजे के मानसून के मौसम में उनके घरों को जबरदस्ती तोड़ रहा है. ऐसी बेबस हालत में, सरकार के लिए बेहतर होगा कि उन्हें तितर-बितर होने के बजाय कानूनी तौर पर मरने दे.
आंदोलन के दौरान, कुपी गांव में बराना नदी के किनारे पानी में लकड़ी की चिताएं सजाई गईं. पीड़ित आदिवासी औरतें, जिनमें से कुछ के हाथों में नए जन्मे बच्चे भी थे, इन चिताओं पर लेट गईं. उनका नारा था “हमें इंसाफ दो या मार डालो.” इसके जरिए वह यह बताना चाहती थीं कि उनके पूर्वजों के सदियों पुराने घर और खेत पानी में डूब जाने के बाद, उनकी संस्कृति और रोजी-रोटी खत्म हो जाएगी, जो उनके समुदाय के लिए मौत की सजा से कम नहीं होगा. तस्वीरें गवाह हैं कि सिस्टम की बेरुखी के आगे ये विस्थापित झुकने को तैयार नहीं हैं. लेकिन प्रशासन ने बल का प्रयोग करके आज सुबह उन्हें धरनास्थल से हटा दिया. हालांकि अभी तक गांववाले माने नहीं हैं और मांगे पूरी न होने पर वे फिर से प्रदर्शन कर सकते हैं.
क्या है केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट?
ग्रामीण लोग पन्ना और छतरपुर के इलाकों से जुड़ी कुल 5 योजनाओं का विरोध कर रहे हैं, लेकिन सभी में प्रदर्शन का मुख्य केंद्र केन-बेतवा लिंक प्रोजक्ट है. केन-बेतवा, रुन्झ बांध और मझगवां परियोजनाओं में ग्रामीणों से भूमि अधिग्रहण किया गया है और उसके बदले उन्हें मुआवजा दिया गया है. हालांकि प्रदर्शनकारियों के दावे अलग हैं.
केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाओं में से एक है. इसका मुख्य उद्देश्य केन नदी बेसिन में उपलब्ध अतिरिक्त पानी को बेतवा नदी बेसिन के उन क्षेत्रों तक पहुंचाना है जहां पानी की कमी रहती है. इससे बुंदेलखंड क्षेत्र के सूखा प्रभावित इलाकों में सिंचाई, पेयजल और विकास की नई संभावनाएं पैदा होंगी. इस परियोजना को दो चरणों में पूरा किया जाएगा और इसके निर्माण में लगभग 8 वर्ष का समय लगेगा.

क्यों जरूरी है प्रोजेक्ट
सरकार के मुताबिक, केन-बेतवा लिंक परियोजना से सबसे बड़ा लाभ सिंचाई के क्षेत्र में मिलेगा. इसके माध्यम से लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि को हर वर्ष सिंचाई की सुविधा मिलेगी. इसमें लगभग 8.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र मध्य प्रदेश का और लगभग 2.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र उत्तर प्रदेश का शामिल है. इसके अलावा लगभग 62 लाख लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें लगभग 41 लाख लोग मध्य प्रदेश और 21 लाख लोग उत्तर प्रदेश के होंगे.
ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भी यह परियोजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है. इससे लगभग 103 मेगावाट जलविद्युत तथा 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होने का लक्ष्य है. इस बिजली का एक हिस्सा सूक्ष्म सिंचाई (माइक्रो इरिगेशन) प्रणाली को विकसित करने में उपयोग किया जाएगा, जिससे पानी का अधिक कुशल उपयोग संभव होगा.
यह परियोजना मुख्य रूप से बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाई गई है. इससे मध्य प्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, विदिशा, सागर, शिवपुरी, दतिया और रायसेन जिलों तथा उत्तर प्रदेश के महोबा, बांदा, झांसी और ललितपुर जिलों को लाभ मिलेगा. सिंचाई और पेयजल की बेहतर व्यवस्था होने से कृषि उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आय में सुधार होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्र के लोगों का जीवन स्तर बेहतर होगा.
क्यों प्रदर्शन कर रहे लोग
- 3 जुलाई को शुरू हुए इस विरोध प्रदर्शन में केन-बेतवा नदी जोड़ने वाले प्रोजेक्ट और दूसरे विकास कामों का विरोध किया गया. भटनागर ने प्रोजेक्ट कथित गड़बड़ियों और कानूनी नियमों का पालन न करने का आरोप लगाया है.
- केन बेतवा समेत अन्य परियोजनाओं के कारण अकेले छतरपुर और पन्ना जिले के लगभग 22 से 24 गांव पूरी तरह से डूब जाएंगे.
- जमीन के बदले जमीन दिए बिना और बिना सही मुआवजे के मानसून के मौसम में उनके घरों को जबरदस्ती तोड़ा जा रहा है.
- वहां के लोगों को दावा है कि उन्हें उनकी जमीन की कीमत के मुताबिक मुआवजा नहीं मिला है.
- जितना पैसा मिला है वह इतना कम है कि वे नई जगह पर जाकर घर नहीं बना सकते.
- उनका आरोप है कि एक ही गांव में एक ही जैसी जमीन के लिए बड़े लोगों को ज्यादा पैसा मिला है वहीं ग्रामीणों को कम पैसे देकर हटा दिया गया है.
- कई आदिवासियों का आरोप है कि वे पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण, सर्वे अधिकारियों ने उनके नाम “योग्य विस्थापित लोगों” की लिस्ट में शामिल नहीं किए. इसलिए उन्हें दूसरी जगह घर बसाने के लिए कोई पैसा नहीं मिला.
- जल सत्याग्रह का विरोध कर रही महिलाओं ने आरोप लगाया कि कई परिवारों को अभी तक पूरा मुआवजा या पुनर्वास का पैसा नहीं मिला है.
- आरोप लगाया कि बेघर हुए परिवारों ने अपनी जमीन, जंगल, पानी के साधन, रोजी-रोटी और सांस्कृतिक पहचान खो दी है, जबकि कुछ पर झूठे क्रिमिनल केस किए गए, गैर-कानूनी तरीके से निकाला गया, बिजली सप्लाई काट दी गई और स्कूल गिरा दिए गए.
- आंदोलन को लीड करने वाले संगठन का आरोप है कि मुआवजा बांटने और जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में लगभग ₹400 करोड़ की भारी गड़बड़ियां और भ्रष्टाचार हुआ है.
- जल, जंगल और पुश्तैनी जमीन के नुकसान के कारण गोंड और कोल आदिवासियों की पहचान, संस्कृति और रोजगार पूरी तरह खत्म हो रहे हैं.
एक प्रदर्शनकारी ने बताया “साहब, हमने अपनी जिंदगी भर की कमाई से 10 लाख रुपये लगाकर अपना घर बनाया था. जब सरकार ने उस घर की कीमत लगाई, तो हमें 4 लाख रुपये दिए. अब अगर हम इस गांव से बाहर जाकर कहीं भी जमीन खरीदेंगे, तो कम से कम 10 लाख रुपये लगेंगे, तो फिर हम उस पर घर कैसे बनाएंगे? या सरकार चाहती है कि हम गड्ढा खोदकर रहें?”
प्रशासन का पक्ष
प्रशासन ने भ्रष्टाचार, धमकी या किसी भी कानूनी गड़बड़ियों के आरोपों को पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठा बताया है. सरकार का कहना है कि जमीन अधिग्रहण, मुआवजा बांटने और पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया तय कानूनी नियमों के मुताबिक, पारदर्शी तरीके से की जा रही है.
छतरपुर प्रशासन ने एक ऑफिशियल बयान जारी कर कहा कि बराना नदी पर विरोध कर रहे ज्यादातर लोग छतरपुर के नहीं थे, बल्कि पड़ोसी पन्ना जिले में रुंझ और मझगवां प्रोजेक्ट की वजह से बेघर हुए थे. प्रशासन ने उनसे अपील की कि वे पन्ना जिले में जाकर वहां के अधिकारियों से पुनर्वास और मुआवजे की मांग करें.
