UP Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनाव का ऐलान हो चुका है. चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक 29 सितंबर से चुनावी प्रक्रिया शुरू होगी, जबकि 16 अक्टूबर को मतदान और उसी दिन मतगणना होगी. विधानसभा के मौजूदा गणित के आधार पर 10 में से 9 सीटों का समीकरण काफी हद तक साफ नजर आ रहा है. असली पेंच 10वीं सीट को लेकर है।10वीं सीट के लिए बीजेपी और उसके सहयोगियों को अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी. यही वजह है कि चुनाव की तारीख करीब आते ही छोटे दलों, निर्दलीय विधायकों और दूसरे दलों के अतिरिक्त वोटों पर सियासी नजरें टिक गई हैं.
29 सितंबर से शुरू होगी प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 29 सितंबर को अधिसूचना जारी होगी. 6 अक्टूबर नामांकन की आखिरी तारीख होगी. 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि 9 अक्टूबर नाम वापसी की अंतिम तारीख तय की गई है. 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान होगा और शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी. इन चुनावों में बीजेपी के मौजूदा सदस्यों की कई सीटों पर फैसला होगा. हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, नीरज शेखर, बृजलाल, सीमा द्विवेदी, गीता शाक्य और बीएल वर्मा का कार्यकाल 25 नवंबर को पूरा हो रहा है. दिनेश शर्मा के अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल बनने के बाद उनकी सीट पहले ही रिक्त हो चुकी है. इसके अलावा समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव और बीएसपी के रामजी गौतम का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है. इस तरह कुल 10 सीटों पर चुनाव होना है.
403 सदस्यीय विधानसभा में 397 प्रभावी संख्या
यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं, लेकिन फिलहाल 6 सीटें खाली हैं. ऐसे में प्रभावी विधानसभा संख्या 397 बैठती है. राज्यसभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए 37 प्रथम वरीयता वोटों का कोटा बनता है. मौजूदा विधानसभा गणित में बीजेपी सबसे बड़ी ताकत है. उसके साथ अपना दल (एस), आरएलडी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी जैसे सहयोगी दल हैं. यही संख्या NDA को पहली सात सीटों के लिए मजबूत स्थिति में रखती है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के विधायकों की संख्या को मिलाकर विपक्ष के पास भी दो सीटें निकालने के लिए पर्याप्त वोट हैं.
यानी मौजूदा गणित में 7 सीटें NDA और 2 सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में जाने की स्थिति बनती है.
असली खेल 10वीं सीट का
पहली 9 सीटों के बाद बचने वाली 10वीं सीट ही पूरे चुनाव का सबसे बड़ा सवाल है. एक सीट के लिए 37 वोट चाहिए. NDA सात सीटों के लिए जरूरी वोट खर्च करने के बाद जितने अतिरिक्त वोट बचा पाएगा, वही 10वीं सीट के लिए उसका आधार होगा. यहीं से छोटे दलों और अन्य विधायकों की भूमिका बढ़ जाती है. किसी उम्मीदवार को 37 वोट पूरे करने के लिए अपने खेमे से बाहर के विधायकों का समर्थन हासिल करना पड़ सकता है. ऐसे में छोटे दलों के साथ तालमेल, निर्दलीय विधायकों का रुख और संभावित क्रॉस वोटिंग अहम फैक्टर बन सकते हैं.
2024 की क्रॉस वोटिंग से बढ़ी नजर
यूपी में 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान भी क्रॉस वोटिंग ने चुनावी समीकरण को प्रभावित किया था. इसलिए इस बार भी राजनीतिक दल अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने की रणनीति पर जोर देंगे. बीजेपी के लिए चुनौती सिर्फ अतिरिक्त वोट जुटाने की नहीं होगी, बल्कि सहयोगी दलों को साथ रखने और संभावित रूप से दूसरे खेमे से समर्थन हासिल करने की भी होगी. वहीं विपक्ष की कोशिश होगी कि उसके विधायक एकजुट रहें और उसके हिस्से के अतिरिक्त वोट किसी दूसरे उम्मीदवार की तरफ न जाएं.
उम्मीदवारों के चयन पर भी नजर
10वीं सीट का चुनाव सिर्फ नंबर गेम नहीं होगा. उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
बीजेपी के सामने ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और क्षत्रिय प्रतिनिधित्व के साथ-साथ पूर्वांचल, पश्चिमी यूपी और दूसरे क्षेत्रों के संतुलन का सवाल भी रहेगा. NDA के सहयोगी दल भी उम्मीदवार चयन और सीट के समीकरण में अपनी भूमिका को लेकर बातचीत कर सकते हैं.
2027 से पहले अहम राजनीतिक परीक्षा
यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में राज्यसभा चुनाव को सिर्फ उच्च सदन की 10 सीटों का चुनाव नहीं माना जा रहा, बल्कि विधानसभा चुनाव से पहले दलों की रणनीतिक क्षमता और आपसी तालमेल की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है. खासकर 10वीं सीट पर कौन किसके साथ खड़ा होता है, कौन सा विधायक किस उम्मीदवार को वोट देता है और क्या क्रॉस वोटिंग होती है—इन सभी घटनाक्रमों पर राजनीतिक दलों की नजर रहेगी.
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