UP News : उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री सुरेश खन्ना को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. कोर्ट ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है. अदालत ने माना कि मंत्री की ओर से लिखा गया पत्र अपने आप में किसी आपराधिक कृत्य को स्थापित नहीं करता और मथुरा की अदालत को भी इस मामले में सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं था. यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने सनातन धर्म रक्षापीठ एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया. मंत्री की ओर से अधिवक्ता आशुतोष कुमार सण्ड ने याचिका का विरोध किया.
6 जून के आदेश को दी गई थी चुनौती
याचिका में मथुरा की अतिरिक्त सिविल जज (एसडी)/प्रथम अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट/विशेष न्यायाधीश (सांसद/विधायक) की अदालत के 6 जून 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी. निचली अदालत ने बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत एफआईआर दर्ज कराने के लिए दाखिल आवेदन को क्षेत्राधिकार के अभाव में खारिज कर दिया था.
याची का आरोप था कि सुरेश खन्ना ने 16 जुलाई 2024 को अपर मुख्य सचिव, गृह विभाग को पत्र लिखकर वृंदावन की एक संपत्ति से जुड़े पुराने मामले की जांच में हस्तक्षेप किया. आरोप था कि इस पत्र के माध्यम से विवादित वसीयत की जांच आगरा की फोरेंसिक लैब के बजाय भोपाल स्थित केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला से कराने की सिफारिश की गई, जिससे जांच में देरी हुई.
BNS की धारा 199 का दिया हवाला
याची पक्ष ने बीएनएसएस की धारा 199 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अपराध का कृत्य एक स्थान पर और उसका परिणाम दूसरे स्थान पर होने पर दोनों स्थानों की अदालत को क्षेत्राधिकार प्राप्त हो सकता है. चूंकि विवादित संपत्ति मथुरा में थी, इसलिए मथुरा की अदालत को भी मामले की सुनवाई का अधिकार बताया गया.
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पुराने मामले की FIR में नहीं थे आरोपी
हाईकोर्ट ने तथ्यों की जांच के बाद कहा कि सुरेश खन्ना पुराने मामले की एफआईआर में आरोपी नहीं थे. 16 जुलाई 2024 का पत्र केवल एक आवेदन को गृह विभाग के पास कानून के अनुसार कार्रवाई के लिए भेजने से संबंधित था. इसमें जांच रोकने या उसे प्रभावित करने का कोई सीधा निर्देश नहीं था.
कोर्ट ने यह भी पाया कि आगे की जांच का आदेश 24 अक्टूबर 2024 को अवर सचिव, उत्तर प्रदेश शासन की ओर से जारी हुआ था. इससे पहले ही 4 अक्टूबर 2024 को आरोपपत्र दाखिल हो चुका था और 7 अक्टूबर को अदालत संज्ञान भी ले चुकी . ऐसे में मंत्री के पत्र को जांच में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता है.
परोक्ष परिणाम इसके लिए पर्याप्त नहीं
अदालत ने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास लोग अपनी शिकायतें लेकर आते हैं. किसी शिकायत को संबंधित विभाग तक भेज देना, बिना दबाव या अवैध निर्देश के, अपने आप में अपराध नहीं है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी स्थान पर हुआ परिणाम तभी क्षेत्राधिकार तय करेगा, जब वह परिणाम संबंधित अपराध का आवश्यक हिस्सा हो. महज दूरगामी या परोक्ष परिणाम इसके लिए पर्याप्त नहीं है.
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने एफआईआर दर्ज कराने का आवेदन खारिज कर कोई कानूनी गलती नहीं की. अदालत ने कहा कि महज संदेह के आधार पर आपराधिक प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती, इसके लिए ठोस तथ्यात्मक आधार जरूरी है. इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई.
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उत्तर प्रदेश से विकास मिश्रा की रिपोर्ट
