Home Top News Delhi Blast: जासिर बिलाल वानी को दिल्ली HC से झटका, डिफॉल्ट जमानत देने से किया इनकार

Delhi Blast: जासिर बिलाल वानी को दिल्ली HC से झटका, डिफॉल्ट जमानत देने से किया इनकार

by Sachin Kumar 18 August 2026, 9:36 PM IST (Updated 18 August 2026, 9:39 PM IST)
18 August 2026, 9:36 PM IST (Updated 18 August 2026, 9:39 PM IST)
Delhi HC denies default bail 2025 Red Fort car bomb blast accused

Red Fort Blast Case: दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को लाले किला धमाके मामले में जासिर बिलाल वानी को डिफॉल्ट जमानत देने से इनकार कर दिया. जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की बेंच ने वानी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने डिफॉल्ट जमानत की मांग की थ. हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 30 मार्च के फैसले को बरकरार रखा है. बेंच ने कहा कि 14 मई 2026 को चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है. ऐसे में अपीलकर्ता यह दावा नहीं कर सकता है कि वह 90 दिन की अवधि के बाद डिफॉल्ट जमानत का हकदार था.

तकनीकी मदद दे रहा था बिलाल वानी

वहीं, जांच एजेंसी अगर तय समयसीमा के अंदर चार्जशीट दाखिल करने में सफल नहीं हो पाती है, तो आरोपी डिफॉल्ट जमानत का हकदार हो जाता है. लाल किला धमाका मामले में NIA ने 17 नवंबर 2025 को वानी को गिरफ्तार किया था. उस पर इस घटना में सक्रिय रूप से शामिल होने का आरोप था.

इसके अलावा जांच एजेंसी का आरोप है कि वानी ने आतंकी हमले की योजना में तकनीकी मदद मुहैया कराई थी. एजेंसी ने यह भी दावा किया है कि वानी ने लाल किले में धमाके की साजिश रचने में आत्मघाती हमलावर उमर-उन-नबी के साथ मिलकर काम किया था. बता दें कि 10 नवंबर 2025 की शाम करीब 6:52 बजे लाल किले के पास एक हुंडई i20 कार में धमाका हुआ था. इस घटना में 15 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे.

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ट्रायल कोर्ट के फैसले को दी चुनौती

इस खतरनाक धमाके के बाद हमलवार के तौर पर नबी की पहचान की गई थी. दूसरी तरफ गिरफ्तारी के 90 दिन पूरे होने के बाद वानी ने डिफॉल्ट जमानत की मांग की. इसके अलावा उसने ट्रायल कोर्ट के उन आदेशों को भी चुनौती दी, जिनमें NIA को जांच पूरी करने के लिए 180 दिनों का अतिरिक्त समय दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि 90 दिन बीतने के बाद वानी कानूनी तौर पर डिफॉल्ट जमानत के हकदार नहीं थे. खास बात यह है कि वानी को UAPA (आतंकवाद-रोधी कानून) के तहत हिरासत की मंजूर अवधि 180 दिनों तक थी.

हिरासत का लंबा समय देना था

कोर्ट ने कहा कि UAPA के तहत हिरासत की अवधि बढ़ाने का मकसद आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों के लिए हिरासत का लंबा समय देना था. यही वजह है कि कोर्ट ने माना है कि UAPA का मकसद BNNS पर हावी होगा. आपको बताते चलें कि BNNS के तहत मौत की सज़ा, उम्रकैद और 10 साल से ज़्यादा की जेल वाले अपराधों में आरोपी 90 दिनों डिफॉल्ट जमानत का हकदार होता है. इसके अलावा कोर्ट ने यह भी दोहराया कि जब संबंधित जांच एजेंसी समय बढ़ाने की मांग कर रही हो, तो उस चरण में आरोपी सरकारी वकील की रिपोर्ट की कॉपी पाने का हकदार नहीं होता है.

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