Middle East Tension: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव जारी है. फिलहाल दोनों देशों के बीच सीधे हमले नहीं हो रहे हैं, लेकिन तनाव बरकरार है. दूसरी ओर कूटनीतिक स्तर पर भी बातचीत चल रही है. इसी सिलसिले में ईरान ने एक प्रस्ताव दिया था, जिसे ट्रंप प्रशासन द्वारा खारिज किए जाने की खबर सामने आई थी. बताया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच तनाव का केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना हुआ है. अमेरिका चाहता है कि यहां से पहले की तरह मालवाहक जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही जारी रहे. वहीं, ईरान ने साफ कर दिया है कि अब मालवाहक जहाज पहले की तरह यहां से आवाजाही नहीं कर सकते. उन्हें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने के लिए फीस देनी होगी. ईरान का कहना है कि इस तरह से एकत्र की गई राशि को वह अकेले नहीं रखेगा, बल्कि इसे जॉर्डन के साथ साझा करेगा.
हाल ही में दुबई से तेल अवीव जा रही एक फ्लाइट में हुई घटना के बाद तेहरान पर भी सवाल उठ रहे हैं. आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस घटना में ईरान का हाथ हो सकता है. हालांकि, अभी तक अमेरिका या इजरायल की ओर से ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे इन आरोपों की पुष्टि हो सके. दूसरी ओर ब्रिटेन और अमेरिका के नेताओं ने भी इस सप्ताह हुई सुरक्षा से जुड़ी दो बड़ी घटनाओं में ईरान की संभावित भूमिका के संकेत दिए हैं. हालांकि, इन दावों के समर्थन में भी अब तक कोई ठोस सार्वजनिक सबूत सामने नहीं आया है.

ईरान ने ब्रिटेन सरकार से स्पष्टीकरण देने को कहा
पहली घटना इंग्लैंड में अमेरिका के एक मिलिट्री बेस के पास गिरफ्तारियां (जिस बेस का इस्तेमाल तेहरान के खिलाफ युद्ध में किया गया था) और दूसरी घटना इजरायल जाने वाले एक विमान के कॉकपिट में हमला. हालांकि, शुक्रवार तक ईरान से कोई पक्का संबंध सामने नहीं आया. ब्रिटेन ने आतंकवाद से जुड़े आरोपों में एयर-बेस पर हुई गिरफ्तारियों को ईरान से जोड़ने वाला कोई सबूत सार्वजनिक नहीं किया है. मीडिया से आधिकारिक रूप से बात करने की इजाजत नहीं मिलने के बाद भी एक अधिकारी ने बताया कि अभी ईरान और कॉकपिट हमले के बीच किसी संबंध का कोई सबूत नहीं है. साथ ही जांच अभी शुरुआती दौर में है. अगर ब्रिटेन में हुई गिरफ्तारियों में ईरान का संबंध पक्का हो जाता है, तो यह उस रणनीति को उजागर करेगा जिसे ईरान की सरकार दशकों से बढ़ावा देती रही है. छोटे और कम लागत वाले हमलों का इस्तेमाल करके ज्यादा ताकतवर दुश्मनों और उनकी अर्थव्यवस्थाओं को परेशान करना और उनमें बाधा डालना है. यह रणनीति अभी होर्मुज जलडमरूमध्य में देखी जा रही है. अगर यह पक्का हो जाता है कि फ्लाईदुबई (FlyDubai) की उड़ान को निशाना बनाने में ईरान का हाथ था, तो यह उस रणनीति का एक खतरनाक नया स्तर होगा. ईरान ने RAF फेयरफोर्ड एयर बेस के पास रविवार को हुई गिरफ्तारियों में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया है. इस एयर बेस का इस्तेमाल अमेरिकी बॉम्बर विमान ईरान पर हमले के लिए करते रहे हैं. ईरानी नेताओं ने ब्रिटेन के राजदूत को तलब किया और ब्रिटिश सरकार से इस मामले में आधिकारिक स्पष्टीकरण देने को कहा.

साजिश रचने के शक में गिरफ्तार किया
पुलिस ने गुरुवार को UK और ईरान की दोहरी नागरिकता वाले 25 वर्षीय एक व्यक्ति को आतंकी हमले की साजिश रचने के शक में गिरफ्तार किया. साथ ही पांच अन्य संदिग्धों को जमानत पर रिहा कर दिया गया. जांचकर्ताओं ने बताया कि उन्हें एयर बेस के पास खड़ी वैन में ज्वलनशील पदार्थ (पेट्रोल) तो मिला, लेकिन कोई विस्फोटक नहीं मिला. प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने कहा है कि UK को इस घटना में ईरान की भूमिका के ‘मजबूत संकेत’ मिले हैं, लेकिन उन्होंने इस बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी. वहीं, फ्लाईदुबई (FlyDubai) हमले के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस सुझाव पर ईरान ने कोई टिप्पणी नहीं की है कि को-पायलट के ईरान से संबंध हो सकते हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें किसी संबंध के बारे में जानकारी दी गई है, तो ट्रंप ने कहा कि जो कुछ मैं सुन रहा हूं, उसके आधार पर मेरा जवाब ‘हां’ होगा. उन्होंने इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया. ईरान के सबसे मुखर आलोचकों में से एक इजरायली बेंजामिन नेतन्याहू ने भी कहा है कि अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. सरकारें अहम जानकारियां साझा नहीं कर रही हैं. जैसे संदिग्धों की पहचान, संभावित मकसद, जिनका खुलासा ब्रिटेन में पुलिस की सक्रिय जांच के दौरान किया था.
असिमेट्रिक वॉरफेयर को ईरान बनाएगा रणनीति
लंदन स्थित डिफेंस थिंक टैंक ‘रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट’ के सीनियर रिसर्च फेलो एंटोनियो गिउस्टोजी ने कहा जब ऐसी अस्पष्ट स्थिति होती है तो सबूतों का अभाव होता है. खासकर राजनेताओं और मीडिया आदि में हर चीज के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति देखी जाती है. उन्होंने आगे कहा कि इसमें से काफी कुछ सच भी होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि सब कुछ सच हो. उन्होंने कहा कि ईरानी इस बात से इनकार नहीं करते कि विदेशों में उनके नेटवर्क मौजूद हैं. गिउस्टोजी ने आगे कहा कि RAF फेयरफोर्ड जैसी घटनाएं उन हमलों के पैटर्न का हिस्सा लगती हैं जिनका मकसद दबाव बनाना है. साथ ही अमेरिकी सहयोगियों को यह संकेत देना होता है कि इस मामले में हमने कोई बहुत भयानक काम नहीं किया, लेकिन भयानक काम करना हमारे लिए मुश्किल नहीं होगा. हाल ही में ईरान के अधिकारियों ने खुलकर ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ को अपनी मुख्य रणनीति के तौर पर बढ़ावा दिया है. ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के एक वरिष्ठ सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल अबोलफजल शेकारची ने कहा कि असिमेट्रिक वॉरफेयर का मतलब है दुश्मन के महंगे और भारी हथियारों का मुकाबला कम लागत वाले हथियारों से करेंगे और अंत में जीत हासिल करेंगे. उन्होंने कहा कि ऐसी रणनीतियां ‘आत्म-बलिदान, आस्था और आध्यात्मिकता’ पर आधारित हैं और पारंपरिक युद्ध इस तरीके के सामने कमजोर साबित हो सकता है.

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इन युद्धों में अपनाया ईरान ने ‘असिमेट्रिक’ तरीका
इस तरह का युद्ध लड़ने का तरीका तेहरान ने तब अपनाया जब 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद अमेरिका समेत उसके पुराने सहयोगियों से मिलने वाली सैन्य और अन्य मदद बंद हो गई. ईरान ने 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान और 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमलों से शुरू हुए मौजूदा युद्ध में भी ‘असिमेट्रिक’ तरीकों, खासकर ड्रोन के इस्तेमाल को अपनाया. ईरान की रणनीतियों में उन पड़ोसी देशों पर ड्रोन हमलों की बौछार शामिल रही है जहां अमेरिकी ठिकाने हैं. साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश करने वाले जहाजों पर भी हमले किए गए. छोटी हमलावर नौकाओं और बारूदी सुरंगों ने भी इस जलडमरूमध्य में खतरा पैदा किया है. ईरान के हथियारबंद प्रॉक्सी ने दक्षिणी लेबनान, यमन, गाजा और इराक में हमले किए हैं. ‘सूफान सेंटर’ थिंक टैंक ने इस साल की शुरुआत में लिखा था कि तेहरान समझता है कि वह पारंपरिक, भीषण युद्ध में इजरायल या अमेरिका को नहीं हरा सकता. लेकिन अब ऐसा लगता है कि ईरान की सरकार एक ऐसी ‘असिमेट्रिक’ और ‘एट्रिशन’ प्रतिक्रिया अपना रही है, जिसका मकसद युद्ध के मैदान में निर्णायक जीत हासिल करना नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहना और अपना अस्तित्व बचाए रखना है.
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अमेरिकी युद्धपोतों पर भी किए हमले
ईरान ने युद्ध के दौरान कुछ सीधे सैन्य या अर्ध-सैन्य हमलों की बात मानी है, जिनमें अमेरिकी युद्धपोतों पर हुए हमले भी शामिल हैं. लेकिन फ्लाईदुबई और इंग्लैंड की घटनाओं में अधिकारियों ने जिस तरह की भागीदारी का संकेत दिया है, वह ज़्यादातर अप्रत्यक्ष है. यही वजह है कि इसकी पुष्टि करना मुश्किल है और इससे इनकार करना आसान. ये आरोप यूरोप में तोड़-फोड़ की उन घटनाओं से जुड़ी चिंताओं को दोहराते हैं, जिनके लिए रूस पर फरवरी 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद से ही समर्थन करने का व्यापक आरोप लगता रहा है. मास्को ने इन आरोपों से इनकार किया है. तेहरान पर पहले भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं. ‘वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर नियर ईस्ट पॉलिसी’ के मैथ्यू लेविट ने पिछले साल लिखा था कि ‘ईरान के खिलाफ जवाबी हमलों के जोखिम को कम करने की कोशिश में ईरानी एजेंट तेहरान के कहने पर हमले करने के लिए आपराधिक प्रॉक्सी (किराए के गुर्गों) का इस्तेमाल कर रहे हैं. एक हाई-प्रोफाइल मामले में नवंबर 2024 में अमेरिकी न्याय विभाग ने ट्रंप की हत्या की ईरानी साजिश का खुलासा किया. विभाग ने एक व्यक्ति पर आरोप लगाया जिसने कहा कि उस महीने हुए चुनाव से पहले उसे एक सरकारी अधिकारी ने यह काम सौंपा था. ईरान सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया और इसे रिश्तों को उलझाने की साजिश बताया.

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ईरान से जुड़े प्रॉक्सी गुट रहे
दूसरी ओर ब्रिटेन के अधिकारियों का कहना है कि ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में आगजनी और अन्य हमलों के पीछे ईरान से जुड़े प्रॉक्सी गुट रहे हैं. इनमें से कई हमलों में यहूदी समुदाय या ईरान के इस्लामी धर्मतंत्र के विरोधियों को निशाना बनाया गया. अक्टूबर 2025 में MI5 (घरेलू खुफिया एजेंसी) के प्रमुख ने कहा कि उनकी एजेंसी ने पिछले साल ईरान-समर्थित 20 से ज़्यादा ‘संभावित रूप से जानलेवा’ साजिशों का पता लगाया है. ब्रिटेन में सिनेगॉग (यहूदी प्रार्थना स्थलों) और यहूदी एम्बुलेंस को निशाना बनाकर की गई आगजनी की घटनाओं के लिए कई संदिग्धों पर आरोप लगाए गए हैं, जिनमें किशोर उम्र के लोग भी शामिल हैं. अधिकारियों का कहना है कि ये अपराध अक्सर बहुत कम पैसे के लिए किए जाते हैं और गिरफ्तार किए गए लोगों को ईरान से जुड़े होने के बारे में बहुत कम या कोई जानकारी नहीं होती है. यह बात भी यूरोप में रूस-समर्थित हमलों के आरोपों जैसी ही है. जुलाई में ब्रिटेन ने ‘इस्लामिक मूवमेंट ऑफ द कम्पैनियन्स ऑफ द राइट’ (IMCR) पर प्रतिबंध लगा दिया. ब्रिटेन का कहना है कि यह ईरान का प्रॉक्सी समूह है जो इन हमलों के पीछे है. IMCR इसी साल की शुरुआत में ऑनलाइन सामने आया था और इसने बेल्जियम और नीदरलैंड में सिनेगॉग पर हुए हमलों की जिम्मेदारी ली है.
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