West Bengal By-Poll: पश्चिम बंगाल के लिए कल यानी 6 अक्टूबर का दिन बेहद अहम होने वाला है. मंगलवार को नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए मतदान होगा. पश्चिम बंगाल के इन दो सीटों पर उपचुनावों का महत्व सिर्फ इन सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि ये BJP के लिए TMC के 15 साल के शासन को खत्म करने के बाद पहली चुनावी परीक्षा भी हैं. साथ ही इनके नतीजों यह भी तय होगा कि कौन सी विपक्षी पार्टी BJP को चुनौती देने वाली मुख्य पार्टी के तौर पर उभर सकती है. इन मुकाबलों से BJP को मई में सत्ता संभालने के बाद से उसके कामकाज पर वोटरों की प्रतिक्रिया का शुरुआती अंदाजा मिलेगा. वहीं, बिखरे हुए विपक्ष में पार्टियां अपनी जगह बनाने की कोशिश करेंगी और सत्ताधारी पार्टी व उसके विरोधी अल्पसंख्यक वोटरों की पसंद को समझने की कोशिश करेंगे.
9 अक्टूबर को आएंगे नतीजे
दोनों सीटों पर वोटिंग 6 अक्टूबर को होगी और वोटों की गिनती 9 अक्टूबर को होगी. राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि ये मुकाबले इसलिए अहम हैं क्योंकि BJP के सत्ता में आने से विपक्ष के लिए एक नया राजनीतिक खालीपन पैदा हो गया है. उन्होंने कहा, “मुख्य मुद्दा यह है कि BJP के खिलाफ विपक्ष की जगह कौन लेगा. उपचुनावों से हमें संकेत मिलेगा कि किस पार्टी में मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी के तौर पर उभरने की क्षमता है.” TMC के 15 साल के शासन के बाद मई में BJP सत्ता में आई थी और उस बड़े बदलाव के बाद ये पहले चुनाव हैं. उपचुनाव चार महीने पुरानी सरकार के कामकाज पर कोई अंतिम फैसला तो नहीं दे सकते, लेकिन सरकार के कामकाज और नीतियों पर जनता की प्रतिक्रिया के शुरुआती संकेत जरूर दे सकते हैं.
नंदीग्राम का मुकाबला प्रतीकात्मक रूप से ज्यादा अहम
नंदीग्राम पश्चिम बंगाल की हॉट सीटों में से एक है. यह सीट ममता बनर्जी के जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन का केंद्र थी, जिसने 2011 में TMC के उदय का रास्ता साफ किया था. यहीं पर 2021 में BJP के सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया था. अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत हासिल की थी. 2026 में अधिकारी ने यहां से टीएमसी के पवित्र कर को 9,000 वोटों के अंतर से हराया था. उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखी, जिसके कारण नंदीग्राम में उपचुनाव की जरूरत पड़ी.
उपचुनाव में BJP ने अधिकारी के पूर्व सहयोगी चंद्रनाथ रथ की मां हसीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है. BJP के विधानसभा चुनाव जीतने के दो दिन बाद, 6 मई को चंद्रनाथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हसीरानी की उम्मीदवारी ने इस मुकाबले को भावनात्मक रंग दे दिया है. अधिकारी से मिलने के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नाम वापस ले लिया. इसके बाद, बिना उम्मीदवार के रह गईं बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को अपना समर्थन दिया और इस कदम को ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर बताया.
प्रधान को 2007 के नंदीग्राम जमीन अधिग्रहण आंदोलन से जुड़े पुराने मामलों में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें अंतरिम जमानत मिल गई और वे प्रचार में लौट आए. रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विरोधी TMC गुट ने ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न और एक अलग अस्थायी पार्टी पहचान के तहत मोहम्मद एतेशमुल हक को मैदान में उतारा है. CPI ने शांतिगोपाल गिरी को उम्मीदवार बनाया है. इस तरह नंदीग्राम रणनीतिक सहयोग की परीक्षा बन गया है; ममता बनर्जी का गुट कांग्रेस को समर्थन ट्रांसफर करने की कोशिश कर रहा है, जबकि BJP को विधानसभा चुनाव वाली अपनी बढ़त बनाए रखने की उम्मीद है.
रेजीनगर का राजनीतिक समीकरण भी अलग है
रेजीनगर विधानसभा सीट तब खाली हुई जब हुमायूं कबीर ने यह सीट खाली कर दी और नौदा को अपने पास रखने का फैसला किया. उन्होंने 2026 के विधानसभा चुनाव में रेजीनगर और नौदा दोनों सीटें जीती थीं. उनकी ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ (AJUP) ने उनके बेटे गुलाम नबी आजाद को इस सीट से मैदान में उतारा है. कबीर ने रेजीनगर सीट लगभग 59,000 वोटों से जीती थी. इस मुकाबले में BJP उम्मीदवार सखराव सरकार, ममता के नेतृत्व वाली TMC के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी, विरोधी TMC उम्मीदवार सफीउज्जमान शेख, कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी और CPI(M) के सैयद असद अली शामिल हैं. वहीं, RSP ने विकास चंद्र मिश्रा का नाम वापस ले लिया क्योंकि उसने चुनाव आयोग के उस फैसले पर आपत्ति जताई थी जिसमें उसे पारंपरिक ‘कुदाल और फावड़े’ (spade-and-shovel) चिह्न के बजाय ‘बाल्टी’ (bucket) चिह्न दिया गया था.
AJUP ने भी आपत्ति जताई थी जब उसके ‘सीटी’ (whistle) चिह्न को बदलकर ‘मेज’ (table) चिह्न कर दिया गया था. ममता गुट को तब अनिश्चितता का सामना करना पड़ा जब उनके उम्मीदवारआलम चौधरी ने कार्यकर्ताओं पर दबाव और नई पहचान के तहत प्रचार करने में आ रही दिक्कतों का हवाला देते हुए अपना नाम वापस लेने की घोषणा की, लेकिन पार्टी प्रमुख के साथ बातचीत के बाद उन्होंने अपना फैसला बदल लिया.
बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए परीक्षा
कांग्रेस के लिए नंदीग्राम और रेजीनगर सीट अलग-अलग स्थितियां पेश करती हैं: नंदीग्राम में बनर्जी का समर्थन और रेजीनगर में स्वतंत्र रूप से लड़ना. दोनों स्थितियों एक बहस पैदा होती है कि पार्टी को स्वतंत्र रूप से फिर से खड़ा किया जाना चाहिए या TMC जैसी BJP-विरोधी ताकतों के साथ रणनीतिक समझ बनाई जानी चाहिए. TMC ने अपने 15 साल के शासनकाल में कांग्रेस के संगठन को खत्म कर दिया है. कांग्रेस नेता प्रदीप भट्टाचार्य का तर्क है कि पार्टी को TMC के हाथों खोई हुई जमीन वापस हासिल करनी चाहिए, जबकि अधीर रंजन चौधरी ने संगठन को फिर से खड़ा करने पर जोर दिया है.
ममता गुट के लिए, रेजीनगर इस बात की परीक्षा है कि क्या वह जाने-पहचाने TMC नाम और चुनाव चिह्न के बिना भी अपना प्रभाव बनाए रख सकता है, जबकि विरोधी गुट उसकी राजनीतिक विरासत पर दावा कर रहा है.
BJP अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है, खासकर रेजीनगर में, जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है. अधिकारी ने उपचुनावों को इस बात की परीक्षा के तौर पर पेश किया है कि क्या अल्पसंख्यक मतदाता उनके विकास के एजेंडे का समर्थन करते हैं. BJP का कहना है कि वह इन मुकाबलों को धार्मिक नजरिए से नहीं देखती है. इस सीट पर अल्पसंख्यक मतदाताओं की मौजूदगी BJP को यह परखने का मौका भी देती है कि क्या उसकी अपील पारंपरिक समर्थक आधार से आगे बढ़ सकती है.
क्या कहते हैं विश्लेषक
एनालिस्ट शुभोमय मोइत्रा ने कहा, “इसे बीजेपी सरकार पर जनमत संग्रह कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन सत्ता बदलने के बाद ये पहले चुनाव हैं और इसलिए इनसे सरकार के कामकाज और राजनीतिक अपील का शुरुआती चुनावी अंदाजा मिलता है.” बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर TMC बनाई थी. इस पार्टी ने नंदीग्राम और सिंगूर में जमीन अधिग्रहण के विरोध वाले आंदोलन के दम पर 2011 में लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन को खत्म किया था. पंद्रह साल बाद पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. बीजेपी सत्ता में है, TMC में फूट पड़ चुकी है और विरोधी गुट अपनी जानी-पहचानी पहचान और चुनाव चिह्न के बिना चुनाव लड़ रहे हैं.
इस बदलाव की वजह से 6 अक्टूबर को होने वाले मतदान का महत्व इन दो सीटों से कहीं ज्यादा हो जाता है. इससे बंगाल में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद वहां की नई राजनीतिक व्यवस्था की पहली चुनावी तस्वीर सामने आएगी. इस नतीजे से तीन संकेत मिलेंगे: क्या विपक्ष से सत्ता में आने के बाद भी बीजेपी की चुनावी रफ्तार बनी हुई है, कौन सी पार्टी उसकी मुख्य चुनौती बनकर उभर सकती है और क्या TMC की बिखरी हुई विरासत अब भी वोटों में बदल सकती है.
2026 विधानसभा चुनाव ने ममता बनर्जी को दिया बड़ा झटका
हालिया विधानसभा नतीजों पर नजर डालें, बीजेपी 208 सीटों के साथ प्रचंड जीत हासिल की. ममत बनर्जी की टीएमसी केवल 80 सीटों पर सिमट कर रह गई. कांग्रेस केवल दो सीटें जीत पाई और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने भी दो सीटें जीतीं. लेफ्ट दलों का खाता भी नहीं खुल पाया. इस तरह पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 15 सालों के शासन का अंत हो गया. सबसे बड़ा झटका ममता बनर्जी को लगा, क्योंकि उनके पास न सत्ता रही, न खुद की सीट और न संगठन. एक महीने में उनकी राजनीतिक ताकत घट कर आधी से भी कम हो गई. वहीं ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी से निष्कासित होने के बाद 53 से ज्यादा विधायकों के साथ विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा और पार्टी के दो हिस्से कर दिए. पार्टी के सबसे वफादार नेताओं ने भी हार के बाद उनका साथ छोड़ दिया. सुदीप बंदोपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, सायनी घोष, दीपक अधिकारी और माला रॉय जैसे बागी सासंदो ने भी टीएमसी छोड़ दी और एनडीए को अपना समर्थन दे दिया.
News Source: ANI
