‘मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो…’ पढ़ें परवीन शाकिर के चुनिंदा शेर

'मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो...' पढ़ें परवीन शाकिर के चुनिंदा शेर

24 Jan 2026

'मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो...' पढ़ें परवीन शाकिर के चुनिंदा शेर.

बरसात की रातों

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है,
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की.

मिरे शहर

मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई,
वो शख़्स आ के मिरे शहर से चला भी गया.

जलती हुई पेशानी

उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा,
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की.

दस्तरस में हूँ 

मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो,
मुझे मेरी रज़ा से माँगता है.

ख़्वाब मिरे

जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा,
उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई.

तन्हाई में

काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में,
मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई.

इक अना 

हारने में इक अना की बात थी,
जीत जाने में ख़सारा और है.

घराने से उठा

एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा,
आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा.

तेरा इंतिज़ार

बारहा तेरा इंतिज़ार किया,
अपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह.

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