Home मनोरंजन Hai Jawani Toh Ishq Hona Hai Review: डेविड धवन ने खोला 90s का पिटारा, लेकिन मैजिक रह गया अधूरा

Hai Jawani Toh Ishq Hona Hai Review: डेविड धवन ने खोला 90s का पिटारा, लेकिन मैजिक रह गया अधूरा

by Preeti Pal 6 June 2026, 4:01 PM IST (Updated 6 June 2026, 4:10 PM IST)
6 June 2026, 4:01 PM IST (Updated 6 June 2026, 4:10 PM IST)
Hai Jawani Toh Ishq Hona Review: डेविड धवन ने फिर खोला 90s का पिटारा, लेकिन इस बार मैजिक रह गया अधूरा

Hai Jawani Toh Ishq Hona Review: डेविड धवन की फिल्मों की एक अलग ही दुनिया रही है. एक ऐसी दुनिया जिसे समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा ज़ोर देने की जरूरत ही नहीं पड़ती. यहां गलतफहमियां कहानी का इंजन होती हैं, जहां एक झूठ को बचाने के लिए 10 नए झूठ पैदा होते हैं. इसके अलावा इस दुनिया में हीरो अक्सर 2 लड़कियों, 2 परिवारों या कह सकते हैं, दोहरी जिंदगी के बीच फंसा होता है. 90s और 2000 के शुरुआती सालों में ये फॉर्मूला इतना सक्सेसफुल था कि, इसे बेच-बेचकर डेविड धवन हिंदी सिनेमा में कॉमेडी फिल्मों के सबसे बड़े मेकर्स में से एक बन गए. उनकी ‘राजा बाबू’, ‘कुली नं. 1’, ‘हीरो नं. 1’, ‘साजन चले ससुराल’, ‘जुड़वा’, ‘बीवी नं. 1’, ‘मुझसे शादी करोगी’ और ‘पार्टनर’ जैसी फिल्मों ने ऑड़ियन्स को खूब हंसाया. इन फिल्मों में कहानी से ज्यादा एंटरटेनमेंट को ऊपर रखा गया. ऑडियन्स भी हंसने के लिए उनकी फिल्में देखने थिएटर पहुंचती थी. अब 2026 में डेविड धवन एक बार फिर अपनी नई फिल्म ‘है जवानी तो इश्क होना है’ लेकर आए हैं. फिल्म को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे, डायरेक्टर ने टाइम को पीछे मोड़ने की कोशिश की है. ये फिल्म सिर्फ उनकी पुरानी फिल्मों की याद नहीं दिलाती, बल्कि कई बार ऐसा फील कराती है जैसे उन्होंने अपने ही करियर की सबसे पॉपुलर फिल्मों के हिस्सों को जोड़कर एक नया पैकेज तैयार कर दिया हो. अब सवाल ये है कि क्या ये नया पैकेज आज की ऑडियन्स को उतना ही पसंद आएगा जितना 25 साल पहले आता था? तो जवाब इतना ईजी नहीं है.

कहानी

फिल्म की कहानी जैज यानी वरुण धवन से शुरू होती है, जो एक वेडिंग फोटोग्राफर है. उसकी शादी बानी यानी मृणाल ठाकुर से होती है, लेकिन दोनों अपने रिश्ते से खुश नहीं हैं. वजह है बेबी प्लानिंग को लेकर दोनों की अलग-अलग सोच. जैज पापा बनने का खूबसूरत सपना देखता है. वहीं, बानी फिलहाल मां बनने के लिए तैयार नहीं है. वो अपने करियर पर फोकस करना चाहती है. बानी और जैज के बीच प्रोब्लम इतनी बढ़ जाती है कि, दोनों तलाक लेने का फैसला करते हैं. कोर्ट उन्हें 6 महीने का कूलिंग पीरियड देता है. इसके बाद जैज लंदन पहुंचता है, जहां उसकी मुलाकात होती है प्रीत यानी पूजा हेगड़े से. लंदन में दोनों के बीच रोमांस शुरू हो जाता है. शुरू में सब कुछ ठीक चल रहा होता है कि अचानक बानी उसे लंदन आकर बताती है कि वो प्रेग्नेंट है. जैज इस खबर पर कैसे रिएक्ट करे, ये समझने की कोशिश कर ही रहा होता है कि तभी प्रीत भी खुद के प्रेग्नेंट होने का खुलासा कर देती है. यहां से शुरू होती है ‘है जवानी तो इश्क होना है’ की असली कहानी. एक तरफ पत्नी, दूसरी तरफ गर्लफ्रेंड. दोनों को सच्चाई नहीं पता. जैज दोनों के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश करता है. वैसे, अगर ये कहानी आपको जानी-पहचानी लग रही है तो इसकी वजह है कि डेविड धवन पहले भी कई बार इसी तरह का कॉन्सेप्ट अपनी फिल्मों में दिखा चुके हैं.

पुराना माल, नया पैकेट

फिल्म देखते टाइम सबसे पहले जिस फिल्म की याद आती है, वो है गोविंदा, करिश्मा कपूर और तब्बू की सुपरहिट फिल्म ‘साजन चले ससुराल’. उस फिल्म में गोविंदा का कैरेक्टर भी दो लड़कियों के बीच फंस जाता है. 1996 में रिलीज़ हुई इस फिल्म की पूरी कहानी इसी कन्फ्यूजन पर बेस्ड है. वरुण धवन की ‘है जवानी तो इश्क होना है’ भी लगभग उसी रास्ते पर चलती है. फर्क बस इतना है कि इस बार सिचुएशन मॉर्डन दिखाई गई हैं और लोकेशन भारत के शहर से निकलकर लंदन पहुंच गई है. इसी तरह ‘घरवाली बाहरवाली’ की झलक भी फिल्म में बार-बार दिखाई देती है. वहां भी शादीशुदा लाइफ और दूसरी लड़की के बीच फंसा एक आदमी था. इतना ही नहीं फिल्म का इमोशनल और कॉमिक ढांचा कई जगह सलमान खान और करिश्मा कपूर की ‘बीवी नं. 1’ की याद दिलाता है. उस फिल्म में सलमान भी 2 लड़कियों को संभालने की कोशिश करते हैं. दिलचस्प बात ये है कि डेविड धवन इन सिमिलरिटीज को छिपाने की कोशिश भी नहीं करते. ऐसा लगता है जैसे वो जानबूझकर अपने पुराने फैंस को नॉस्टैल्जिया परोस रहे हों.

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फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

अगर फिल्म को देखने की एक बड़ी वजह है, तो वो हैं वरुण धवन. इस बार ये मज़ाक नहीं है. ये शायद उनके करियर की सबसे ज्यादा डेविड धवन स्टाइल परफॉर्मेंस में से एक है. वरुण यहां सिर्फ एक्टिंग नहीं कर रहे, बल्कि कई बार ऐसा लगता है कि वो गोविंदा, सलमान खान और यहां तक कि यंग अनिल कपूर की एनर्जी को भी अपने कैरेक्टर में समेटने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी कॉमिक टाइमिंग अच्छी है. भाग-दौड़ वाले सीन्स में वो कंफर्टेबल दिखाई देते हैं. चेहरे के एक्सप्रेशन और बॉडी लैंग्वेज से भी वो कई सीन्स को और बढ़िया बनाने की कोशिश करते हैं. हालांकि, यहां एक कंपैरिजन करना जरूरी है. दरअसल, जब गोविंदा, डेविड धवन की फिल्मों में इसी तरह के कैरेक्टर प्ले करते थे, तो उनकी कॉमेडी जबरदस्ती की नहीं लगती थी. हालांकि, वरुण धवन इसके लिए मेहनत करते हुए दिखाई देते हैं. यही अंतर इस फिल्म में भी क्लियर दिखाई देता है. फिर भी ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर वरुण न होते, तो फिल्म और ज्यादा वीक हो सकती थी.

मृणाल और पूजा का स्पेस

वरुण धवन के अलावा बात करें लीडिंग लेडी मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े की, तो दोनों ही स्क्रीन पर अट्रैक्टिव लगती हैं. हालांकि, दोनों के कैरेक्टर्स को उतनी अच्छी तरह से नहीं लिखा गया जितना लिखा जाना चाहिए था. बानी का कैरेक्टर शुरुआत में मॉर्डन सोच वाली लड़की का सिंबल लगता है. वो क्लियर कहती है कि फिलहाल वो मां बनने से ज्यादा अपने करियर पर फोकस करना चाहती है. लेकिन जैसे ही कहानी थोड़ी आगे बढ़ती है, उसकी पूरी पर्सनालिटी ही बदल जाती है. ये बदलाव इतना अचानक है कि कैरेक्टर फेक लगने लगता है. पूजा हेगड़े वाला यानी प्रीत का कैरेक्टर भी इसी प्रोब्लम का शिकार है. वो इंडिपेंडेंट और कॉन्फिडेंट दिखाई देती है, लेकिन वो भी बाद में बेचारी बन जाती है. ये कहा जा सकता है कि इस कहानी में दोनों लड़कियों को सिर्फ हीरो की मुश्किलें बढ़ाने के लिए ही यूज किया गया है.

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सपोर्टिंग कास्ट

जिमी शेरगिल, मनीष पॉल, राकेश बेदी, मौनी रॉय और चंकी पांडे जैसे एक्टर्स भी इस फिल्म में हैं. देखा जाए तो, सपोर्टिंग कास्ट वाकई में काफी दमदार है. ये सभी अपने-अपने कैरेक्टर्स को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं. जिमी शेरगिल का कैरेक्टर पुराने जमाने के कादर खान और अनुपम खेर वाले स्ट्रिक्ड लेकिन एंटरटेनिंग रिश्तेदारों की याद दिलाता है. वहीं, मनीष पॉल फिल्म में एक अलग लेवल की एनर्जी लेकर आते हैं. वो कई जगह कॉमिक टाइमिंग से कहानी को सपोर्ट करने की कोशिश करते हैं. लेकिन प्रोब्लम ये है कि इन सब एक्टर्स के पास खेलने के लिए स्ट्रॉन्ग कहानी और कंटेंट ही नहीं था. कई चुटकुले पुराने लगते हैं और कई सिचुएशन इतनी बार बॉलीवुड में इस्तेमाल हो चुकी हैं कि उनमें नया कुछ नहीं लगता.

कॉमेडी

किसी भी डेविड धवन फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी कॉमेडी होती है. लेकिन इस फिल्म की सबसे खराब बात यही है. यानी कॉमेडी ही इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी भी है. 90 के दशक में जो ह्यूमर काम करता था, वो आज वैसा इम्पैक्ट नहीं छोड़ता. कुछ पंचलाइन ऐसी लगती हैं जैसे सीधे 1998 से उठाकर 2026 में रख दी गई हों. यहां सबसे बड़ी प्रोब्लम ये नहीं कि फिल्म पुरानी है, बल्कि ये कि वो अपने ओल्ड स्टाइल को नए टाइम के हिसाब से अपडेट नहीं कर पाती. जैसे, आज सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के दौर में कई गलतफहमियां 5 मिनट में खत्म हो सकती हैं. लेकिन फिल्म बार-बार ऐसे हालात पैदा करती है जहां कैरेक्टर कॉमन सेंस का यूज ही नहीं करते. अब बहुत से लोग ये भी कहेंगे कि, इस तरह की फिल्मों में कॉमन सेंस की कोई जगह नहीं होती. लेकिन फिर भी ये कुछ ज्यादा ही नॉर्मल चीजें हैं, जिन्हें आज के टाइम में रिलेवेंट नहीं माना जा सकता.

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अपनी ही फिल्मों के रीमिक्स

फिल्म देखते टाइम ये सवाल बार-बार मन में आता है, कि क्या डेविड धवन अपनी ही फिल्मों को रीमिक्स करने लगे हैं? एक टाइम था जब डेविड धवन की फिल्मों में भले ही एक फार्मूला होता था, लेकिन उनमें फ्रेशनेस होती थी. ‘राजा बाबू’, ‘हीरो नं. 1’ और ‘जुड़वा’ जैसी फिल्मों में ऑडियन्स को कुछ नया देखने को मिलता था. लेकिन ‘है जवानी तो इश्क होना है’ देखकर ऐसा लगता है जैसे डायरेक्टर अपने ही पुराने हिट मूमेंट्स का रीमिक्स बना दिया हैं. जैसे म्यूज़िक में पुराने गानों को नए बीट्स के साथ पेश किया जाता है. ऐसे ही यहां पुरानी सिचुएशन्स को नए स्टार्स के साथ रिपीट किया गया है. मगर हर रीमिक्स ओरिजनल गाने जितना हिट नहीं होता. मगर वरुण धवन की ये फिल्म टेक्निकली अच्छी दिखती है. लंदन की लोकेशंस अट्रैक्टिव हैं. कलरफुल विजुअल ट्रीटमेंट फिल्म को लाइट और एंटरटेनिंग बनाए रखता है. कैमरा वर्क क्लीन है और एडिटिंग भी काफी हद तक कहानी की स्पीड को बनाए रखती है. म्यूजिक में पुराने गानों का यूज नॉस्टैल्जिया पैदा करता है. हालांकि, कोई नया गाना ऐसा नहीं है जो थिएटर से निकलने के बाद लंबे टाइम तक याद रह जाए.

आज वर्सेस डेविड की कॉमेडी

आज ऑडियन्स ‘स्त्री’, ‘फुकरे’, ‘बधाई हो’, ‘ड्रीम गर्ल’, ‘मडगांव एक्सप्रेस’ और ‘भूल भुलैया 2’ जैसी फिल्मों की कॉमेडी देख चुके हैं. इन फिल्मों में ह्यूमर सिर्फ गलतफहमियों से नहीं, बल्कि कैरेक्टर्स, सिचुएशन और स्मार्ट राइटिंग से पैदा होता है. इनके मुकाबले ‘है जवानी तो इश्क होना है’ कई बार पुरानी दुनिया में फंसी हुई लगती है. हालांकि, ये फिल्म उन लोगों को पसंद आ सकती है जो 90s की कॉमिक फिल्मों के फैंस हैं, लेकिन नई जेनेरेशन की ऑडियन्स के लिए इससे जुड़ना ईजी नहीं होगा. ‘है जवानी तो इश्क होना है’ एक ऐसी फिल्म है जो डेविड धवन के पूरे करियर का निचोड़ लगती है. इसमें उनकी लगभग हर पॉपुलर फिल्म की झलक मिलती है. दूसरी तरफ वरुण धवन अपनी पूरी ताकत से फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं. लेकिन कमजोर राइटिंग और पुराने चुटकुले फिल्म को उस लेवल तक नहीं पहुंचने देते जहां डेविड धवन की क्लासिक कॉमेडी फिल्में पहुंचा करती थीं. लेकिन अगर आप ‘कुली नं. 1’, ‘साजन चले ससुराल’ और ‘बीवी नं. 1’ के टाइम को मिस करते हैं, तो ये फिल्म आपको कुछ घंटों के लिए उसी दुनिया में वापस ले जा सकती है. वहीं, अगर आप कॉमेडी में कुछ नया और फ्रेश ढूंढ रहे हैं, तो ये जर्नी आपको मिस कर देनी चाहिए.

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