Nana Patekar: नाना पाटेकर को हिंदी सिनेमा में उनकी दमदार एक्टिंग, बेबाक अंदाज और अलग आवाज के लिए जाना जाता है. लेकिन उनकी जिंदगी का एक ऐसा किस्सा भी है, जो किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं. दरअसल, साल 1999 में जब कारगिल युद्ध अपने चरम पर था, तब नाना पाटेकर ने अपना फिल्मी करियर एक तरफ रख दिया. तब उन्होंने सेना के जवानों के साथ मोर्चे पर जाने की इच्छा जताई थी. वह सिर्फ पर्दे पर फौजी का किरदार निभाने वाले एक्टर नहीं रहना चाहते थे, बल्कि असली सैनिकों के बीच जाकर उनके स्ट्रगल को फील करना चाहते थे. नाना पाटेकर ने साल 1991 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में मेजर वीएस चव्हाण का किरदार निभाया था. इस रोल को असली बनाने के लिए उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ करीब तीन साल तक ट्रेनिंग ली थी. खास बात ये थी कि फिल्म को कहानी उन्होंने ही लिखी और इसे डायरेक्ट भी खुद किया.
सीधे रक्षा मंत्री को किया फोन
साल 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो नाना पाटेकर ने सेना के सीनियर अधिकारियों से संपर्क किया और युद्ध में जवानों के साथ जाने की इच्छा जताई. उन्हें बताया गया कि इसकी परमिशन रक्षा मंत्री ही दे सकते हैं. नाना उस टाइम के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस को जानते थे. उन्होंने सीधे उन्हें फोन कर दिया. नाना ने साल 2024 में अमिताभ बच्चन के शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में भी इस किस्से का जिक्र किया था. उन्होंने बताया कि जॉर्ज फर्नांडिस ने भी शुरुआत में कहा कि ऐसा संभव नहीं है. तब नाना ने अपनी तीन साल की मिलिट्री ट्रेनिंग के बारे में बताया. जब उनसे पूछा गया कि कब जाना चाहते हैं, तो उनका जवाब था, आज ही. आखिरकार उन्हें परमिशन मिल गई और अगस्त 1999 में वो कारगिल क्षेत्र पहुंच गए.
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60 दिन तक रहे जवानों के बीच
नाना ने करीब 60 दिन सेना के जवानों के साथ बिताए. इस बीच वो द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला और सोपोर जैसे इलाकों में गए. उन्होंने बताया कि जब वो श्रीनगर पहुंचे थे, तब उनका वजन करीब 76 किलो था. वापस लौटे तो वजन सिर्फ 56 किलो रह गया था. इस बीच वो क्विक रिएक्शन टीम यानी QRT का हिस्सा भी बने. बाद में श्रीनगर के एक मिलिट्री हॉस्पिटल में मदद की.
वो भूले वो दिन
अस्पताल में शहीद जवानों के पार्थिव शरीर भी लाए जाते थे. नाना ने बताया कि कई शव बहुत ही खराब हालत में होते थे. उन्हें सम्मान के साथ उनके घर भेजने के लिए तैयार किया जाता था. उन्होंने करीब छह दिन वहां काम किया. एक दिन अस्पताल में उन्हें एक घायल जवान मिला, जिसे वो जानते थे. वो तेज बुखार में था और वापस युद्धभूमि में जाना चाहता था, लेकिन उसके पैर कट चुके थे. ये अनुभव नाना के लिए बहुत ही ज्यादा इमोशनल और झकझोर देने वाला था. नाना के लिए ये किसी हीरो बनने की कोशिश नहीं थी. वो इसे देश के लिए सेवा मानते थे. उनका मानना था कि कलाकारों को अपनी जिंदगी के सुख-दुख से आगे निकलकर दुनिया को भी देखना चाहिए. उनके मुताबिक, जब इंसान खुशी और दुख को देखने का अपना नजरिया बदलता है, तभी वो जिंदगी को ज्यादा गहराई से समझ पाता है.
News Source: ANI
दमदार आवाज और अभिनय के बादशाह को अंतिम विदाई; नाना पाटेकर के निधन से सदमे में सिनेमा
