Nana Patekar: बॉलीवुड के दमदार एक्टर नाना पाटेकर को लोग उनकी फिल्मों और फेमस डायलॉग्स के लिए हमेशा याद रखेंगे. हालांकि, उनकी जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी है, जो पर्दे से कहीं ज्यादा बड़ा है. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके का धोंडलगांव आज भी नाना पाटेकर के उस काम को याद करता है, जिसने सिर्फ पानी की प्रोब्लम दूर नहीं की, बल्कि गांव की पूरी अर्थव्यवस्था बदल दी. नाना पाटेकर और मराठी एक्टर मकरंद अनासपुरे ने साल 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की शुरुआत की थी. संस्था का काम सूखा प्रभावित किसानों और ग्रामीण परिवारों की मदद करना और पानी की समस्या का समाधान निकालना था.
कभी मंगवाने पड़ते थे टैंकर
छत्रपति संभाजीनगर से करीब 57 किलोमीटर दूर धोंडलगांव में कुछ साल पहले हालात काफी मुश्किल थे. मानसून खत्म होते ही गांव में पानी की किल्लत शुरू हो जाती थी. इतना ही नहीं, दिवाली आते-आते पानी के टैंकर बुलाने पड़ते थे. वहां की नदी पर बने कई बैराज गाद से भर चुके थे. इसकी वजह से बारिश का पानी रुक नहीं पाता था. नतीजा ये हुआ कि खेती करने में भी दिक्कत आने लगी. इस वजह से किसानों के लिए साल में एक से ज्यादा फसल लेना मुश्किल हो गया.
कई किलोमीटर की सफाई
पानी के एक्सपर्ट आनंद आसोलकर के मुताबिक, नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे जब ऐसे गांव की तलाश कर रहे थे, जहां पानी बचाने का काम किया जा सके, तब उन्हें धोंडलगांव के बारे में बताया गया. गांव 12 बैराज गाद से पूरी तरह भर चुके थे. इसके बाद करीब 4.5 किलोमीटर जगह से गाद हटाने का काम किया गया. इससे लगभग 20 करोड़ लीटर पानी जमा करने का जगह तैयार हुई. यहीं से गांव की कहानी बदलनी शुरू हुई.
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किसानों की बदली किस्मत
पानी होने का सीधा असर खेती पर पड़ा. गांव में करीब 70 प्रतिशत किसान अब साल में दो फसलें उगा रहे हैं. वहीं, कुछ किसान तीन फसलें भी ले रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से गांव को टैंकर ना के बराबर ही मंगवाने पड़ रहे हैं. सिर्फ 2018 के भीषण सूखे के समय कुछ महीनों की परेशानी हुई थी. वैसे, ‘नाम फाउंडेशन’ भी महाराष्ट्र के कई इलाकों में नदी, नाले और जलस्रोतों की सफाई का काम करती रही है.
पानी से बढ़ा दूध का बिजनेस
पानी की वजह से खेती के साथ-साथ पशुपालन को भी बढ़ावा मिला. लोकल कार्यकर्ताओं के मुताबिक, गांव में अब रोजाना करीब 10 हजार लीटर दूध का उत्पादन होता है. डेयरी बिजनेस से लगभग 800 युवाओं को रोजगार मिलने की बात भी सामने आई है. यानी जिस गांव की पहचान कभी पानी की कमी और टैंकरों से होती थी, वही अब खेती और डेयरी के दम पर अपनी नई पहचान बना चुका है. गांव के सरपंच और स्थानीय लोगों का कहना है कि लगातार सूखे ने गांव के लोगों के अंदर निराशा पैदा कर दी थी. हालांकि, पानी संरक्षण के इस काम ने लोगों की सोच और गांव की तस्वीर दोनों बदल दी. इसके बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि, नाना पाटेकर आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन धोंडलगांव की कहानी बताती है कि किसी कलाकार की असली विरासत सिर्फ उसकी फिल्मों में नहीं, बल्कि उन जिंदगियों में भी होती है जिन्हें उसने बेहतर बनाने की कोशिश की.
News Source: ANI
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