Home Top News धरती को बचाने की आखिरी घंटी! UN ने बढ़ाई चिंता, ग्लोबल वार्मिंग की सुरक्षित सीमा टूटने के करीब

धरती को बचाने की आखिरी घंटी! UN ने बढ़ाई चिंता, ग्लोबल वार्मिंग की सुरक्षित सीमा टूटने के करीब

by Sachin Kumar 2 September 2026, 7:52 PM IST (Updated 2 September 2026, 7:54 PM IST)
2 September 2026, 7:52 PM IST (Updated 2 September 2026, 7:54 PM IST)
UN Report Global warming exceed limit

Global Warming: संयुक्त राष्ट्र (UN) ने उस कड़वे सच पर अब मुहर लगा दी है, जिसको लेकर दुनियाभर के पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चिंता जता रहे थे. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, अब दुनिया के पास पृथ्वी के बढ़ते तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रोकने का कोई वास्तविक मौका नहीं बचा है. यूएन ने माना है कि पृथ्वी ग्लोबल वार्मिंग के कुछ सबसे गंभीर प्रभावों को रोकने का अवसर खो चुकी है. अब दुनिया के सामने चुनौती यह है कि तापमान को खतरनाक स्तर से नीचे कैसे लाया जाए और जलवायु को दोबारा सुरक्षित स्थिति की ओर कैसे ले जाया जाए. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की बुधवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, कोयले, तेल और गैस के जलने से होने वाली गर्मी के कारण पृथ्वी जल्द ही 2015 के पेरिस जलवायु समझौते में तय की गई सुरक्षित तापमान सीमा को पार करने वाली है.

वैज्ञानिकों और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि अब अत्यधिक तापमान को सीमित करने के साथ-साथ भविष्य में वैश्विक तापमान को फिर से तय सीमा के भीतर लाने के प्रयास करने होंगे. हालांकि, इसका मतलब यह भी है कि आने वाले दशकों तक मौसम संबंधी आपदाओं में बढ़ोतरी, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, जैव विविधता का नुकसान और बर्फ की चादरों व ग्लेशियरों के पिघलने जैसी समस्याएं जारी रह सकती हैं.

अब गर्म दुनिया के साथ रहना होगा : UN

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कहना है कि जलवायु आपदा से बचने के लिए मानवता तेजी से उस सीमा की ओर बढ़ रही है, जिसे पार करना बेहद खतरनाक होगा. नई रणनीति में इस बात की कल्पना की गई है कि कुछ समय के लिए तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर जाने के बाद उसे दोबारा नीचे लाया जाए. इसके लिए जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को खत्म करने के साथ-साथ उद्योगों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण से हटाने के तरीके विकसित करने होंगे. महासचिव ने इसे एक तरह की ‘रियलिटी चेक’ बताते हुए कहा है कि अब दुनिया को बढ़ते तापमान वाली इस नई वास्तविकता के साथ जीने के लिए तैयार रहना होगा. एक्सेटर विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक रिचर्ड बेट्स ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि पेरिस जलवायु समझौते के बाद संयुक्त राष्ट्र ने अपनी जलवायु विज्ञान संस्था को अलग-अलग तापमान सीमाओं के प्रभावों का अध्ययन करने का निर्देश दिया था. 19वीं सदी के मध्य के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को सीमित करने के लिए महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया है. हालांकि, तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर लोगों और पृथ्वी पर इसके प्रभाव कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं.

UN Report Global warming exceed limit

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1.5 डिग्री के पार हो जाएगी सीमा

वैज्ञानिकों ने गणना की है कि दुनिया अब पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो चुकी है. यह आंकड़ा किसी एक वर्ष के तापमान पर आधारित नहीं है, बल्कि 20 वर्षों के औसत तापमान को ध्यान में रखकर निकाला गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना अब संभव नहीं दिख रहा है. संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में भी स्वीकार किया है कि दुनिया आने वाले कुछ वर्षों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगी. रिपोर्ट के अनुसार, अगर सभी देश जलवायु लक्ष्यों को पूरी गंभीरता से लागू करते हैं, तब भी सबसे आशावादी स्थिति में सदी के मध्य तक वैश्विक तापमान में करीब 1.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र का जोर अब केवल तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर नहीं, बल्कि तापमान के इस स्तर से ऊपर जाने के बाद उसे दोबारा नीचे लाने की रणनीति तैयार करने पर है. विशेषज्ञ इस स्थिति को ‘ओवरशूट’ कहते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तापमान आने वाले वर्षों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर सकता है. इसलिए नीति निर्माताओं को अभी से ऐसी रणनीतियों पर काम करना होगा, जिनके जरिए भविष्य में तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाया जा सके. विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक एंड्रयू वीवर ने कहा कि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा कोई ऐसी ‘जादुई जलवायु चट्टान’ नहीं है, जिसे पार करते ही सब कुछ खत्म हो जाएगा. हालांकि, तापमान में हर अतिरिक्त वृद्धि जलवायु जोखिमों को और गंभीर बना सकती है.

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तापमान को सीमित किया जाए

दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि चरम पर पहुंचे तापमान को सीमित किया जाएगा. फिर 1.5 डिग्री से ऊपर के समय को कम किया जाए. इंपीरियल कॉलेज लंदन के जलवायु वैज्ञानिक और रिपोर्ट के सह-लेखक जोएरी रोजेलज ने कहा कि उत्सर्जन को कम करने में हर पांच साल की देरी से अधिकतम तापमान में एक डिग्री का दसवां हिस्सा जुड़ जाता है. साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर हम अभी कार्रवाई करें तो हम ओवरशूट को सीमित कर सकते हैं. सुरक्षित दुनिया नहीं है, लेकिन लंबी अवधि के लिए 1.5 डिग्री से ऊपर रहने से अधिक सुरक्षित है. एंड्रयू वीवर ने कहा कि यह मेरे द्वारा पढ़ी गई सबसे निराशाजनक संयुक्त राष्ट्र जलवायु रिपोर्टों में से एक है. इसमें हताशा और तात्कालिकता का स्पष्ट स्वर है. क्लाइमेट एनालिटिक्स के सीईओ बिल हेयर ने कहा कि यूएनईपी उस गड्ढे का वर्णन करने का अच्छा काम करता है जिसमें हमने खुद को खोदा है, लेकिन हमें यह दिखाने का खराब काम करता है कि ये एक रास्ता है. हालांकि, एंडरसन का मानना है कि सरकारों को बिगड़ती वार्मिंग से निपटने के लिए प्रयास बढ़ाने की जरूरत है, जो गरीबों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है. साथ ही कुछ प्रभावों को आसानी से टाला नहीं जा सकता है.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अत्यधिक अवधि के दौरान बिगड़ते जलवायु परिवर्तन और इसके चरम मौसम के कारण अधिक लोग मरेंगे या बीमार होंगे. खाद्य उत्पादन गिर जाएगा, लोग भूखे रह जाएंगे, पानी की कमी बढ़ जाएगी, अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होंगी और मूंगा जैसी प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी. हालांकि, हाल ही में नेपाल में हिमालय के ग्लेशियर के खिसकने के कारण आई घातक बाढ़ के पीछे के कारण जटिल हैं. इस मुद्दे पर बेट्स का कहना है कि दुर्भाग्य से हम ऐसी और चीजें देखने की उम्मीद करते हैं और यही कारण है कि हमें अधिकतम तापमान में वृद्धि को सीमित करने की आवश्यकता है.

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ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरों को नुकसान

रिपोर्ट में व्यापक प्रभाव डालने वाले ‘टिपिंग पॉइंट्स’ को लेकर भी चेतावनी दी गई है. इनमें पश्चिमी अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरों को होने वाला नुकसान, अमेजन के वर्षावनों का क्षरण और अटलांटिक महासागर की परिसंचरण प्रणाली के कमजोर पड़ने या बंद होने जैसे गंभीर खतरे शामिल हैं. वहीं, ओवरशूट की स्थिति से निपटने के अंतिम चरण में वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाकर उसे स्थायी रूप से कहीं संग्रहित करने की जरूरत होगी, ताकि ग्रह को दोबारा ठंडा किया जा सके. रिपोर्ट के मुताबिक, इसका पारंपरिक तरीका बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना है. हालांकि, पेड़ लगाने से वैश्विक तापमान में अधिकतम करीब 0.1 डिग्री सेल्सियस तक की कमी लाई जा सकती है. रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि कार्बन हटाने की अधिक उन्नत और नवीन तकनीकों की भी जरूरत होगी. हालांकि, कई वैज्ञानिकों ने इन तरीकों को बहुत ज्यादा महंगा बताया है. दूसरी ओर स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक रॉब जैक्सन ने कहा कि दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस की वार्मिंग से बचने के लिए वैश्विक उत्सर्जन की ‘बेकाबू ट्रेन’ को रोकने में नाकाम रही है. अब ओवरशूट की स्थिति से निपटने के लिए इस ट्रेन को तुरंत रोकने और फिर पीछे की ओर ले जाने की जरूरत होगी.

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नेपाली पीएम ने उठाया जलवायु परिवर्तन का मुद्दा

आपको बताते चलें कि नेपाल के प्रधान मंत्री बालेंद्र शाह ने बुधवार को कहा कि भोटेकोशी नदी की बाढ़ से हुई तबाही जलवायु परिवर्तन के कारण हुई है और इसके प्रभावों को ‘प्रबंधित करने और कम करने’ की जिम्मेदारी भी वैश्विक समुदाय पर है. नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टान के ढहने या हिमस्खलन के कारण अचानक आई बाढ़ ने 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी के माध्यम से रसुवा में प्रवेश किया और उत्तरी और मध्य नेपाल में कस्बों और गांवों को तबाह कर दिया. प्रतिनिधि सभा को बाढ़ से हुई तबाही के बारे में जानकारी देते हुए शाह ने कहा कि यह घटना दिखाती है कि पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते जोखिम का सामना करना पड़ रहा है. प्रधान मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जलवायु परिवर्तन के पीछे वैश्विक योगदान है. इसके प्रभावों को प्रबंधित करने और कम करने की जिम्मेदारी भी वैश्विक समुदाय पर है. शाह ने आगे कहा कि संकट की इस घड़ी में हमने इस वास्तविकता को स्वीकार किया है कि देश के नेतृत्व को आंसू नहीं, साहस, समर्थन और आश्वासन देना चाहिए. रसुवा, नुवाकोट और धादिंग को तबाह कर दिया है, यह पूरे देश के दिल पर एक साझा झटका है.

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