H1N1 Virus Alert: मौसम बदलने के साथ देशभर में H1N1 यानी स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ने लगे हैं. बदलते तापमान और वायरल इंफेक्शन के बीच, बड़ी संख्या में लोग बुखार, खांसी, गले में खराश, शरीर में दर्द और सांस लेने में दिक्कत की शिकायत लेकर अस्पतालों में जा रहे हैं. हर घर में कोई न कई जरूर इस वायरस का शिकार है और कुछ घरों में तो घर के सभी सदस्य इन्फेक्शन से परेशान हैं. हालात इतने चिंताजनक हैं कि देश में H1N1 के 14,000 से ज्यादा मामले आ चुके हैं. इन्फेक्शन का असर खासकर केरल में सबसे ज्यादा है. केवल दिल्ली में अब तक इन्फ्लूएंजा के 2000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं. पिछले साल की तुलना में संख्या सात गुना बढ़ गई है. इस खबर ने जनता में चिंता बढ़ा दी है.
डॉक्टर लोगों को लापरवाही न करने और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह दे रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग ने भी लोगों के लिए एडवायजरी जारी की है. इसलिए सवाल उठता है कि H1N1 का खतरा कितना गंभीर है, इसके लक्षण क्या हैं और इंफेक्शन से बचने के लिए क्या सावधानियां जरूरी हैं? डॉक्टरों ने इन सभी सवालों के जवाब दिए हैं. यहां जानें H1N1 वायरस के बारे हर डिटेल.
इन्फ्लूएंजा और H1N1 अंतर समझिए
देश में एक्टिव केस सिर्फ H1N1 के नहीं हैं, बल्कि सीजनल इन्फ्लूएंजा भी है. इन्फ्लूएंजा वायरस का एक ग्रुप है जो सांस की नली पर असर डालता है. इसके चार मुख्य टाइप हैं- A, B, C, और D. चारों में से H1N1 (स्वाइन फ्लू) इन्फ्लूएंजा A वायरस का एक खास स्ट्रेन है. कुल मामलों में से इसके लगभग 70% से 80% केस होते हैं.

केरल में सबसे ज्यादा खतरा
स्वास्थ्य विभाग के डेटा के मुताबिक, देशभर में अब तक H1N1 और इन्फ्लूएंजा के कुल मामलों की संख्या 14,000 पार कर गई है. अकेले केरल में 7,420 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं, जिसमें 88 लोगों की मौत हो गई है. दिल्ली में इस साल 2,390 से ज्यादा इन्फ्लूएंजा-A के मामले दर्ज किए गए हैं, जिसमें शुक्रवार तक 1,777 से ज्यादा H1N1 मामले शामिल हैं और अकेले गुरुवार को 114 H1N1 मामले रिपोर्ट किए गए. कर्नाटक में 4,212 मामले दर्ज किए हैं, जिसमें 3000 से ज्यादा मामले अकेले बेंगलुरू से आए हैं.
बच्चों और बूढ़ों को है ज्यादा खतरा
मेदांता मेडिक्लिनिक, डिफेंस कॉलोनी और मेदांता-द मेडिसिटी के रेस्पिरेटरी और स्लीप मेडिसिन के सीनियर डायरेक्टर डॉ. भरत गोपाल ने कहा, “H1N1 के मामलों में बढ़ोतरी ने प्रिवेंटिव वैक्सीनेशन को फिर से चर्चा में ला दिया है. राष्ट्रीय राजधानी में H1N1 के बढ़ते मामलों के बीच डॉक्टरों और हेल्थ एक्सपर्ट्स ने बताया है कि बच्चे, बुज़ुर्ग, प्रेग्नेंट महिलाएं और जिन्हें पुरानी बीमारियां हैं, उन्हें गंभीर इन्फेक्शन का सबसे ज्यादा खतरा है. “
सरकारी अस्पताल में न के बराबर है टेस्टिंग का खर्च
सर गंगा राम हॉस्पिटल के फिजिशियन डॉ. बिभु आनंद ने कहा, “स्वाइन फ्लू टेस्ट लगभग सभी हॉस्पिटल और डायग्नोस्टिक सेंटर में आसानी से मिल जाता है. प्राइवेट अस्पतालों में टेस्टिंग का खर्च आम तौर पर Rs 1,500 से Rs 5,000 के बीच होता है, जबकि एक पूरे रेस्पिरेटरी बायोफायर पैनल का खर्च Rs 9,000 से Rs 15,000 के बीच हो सकता है.” उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों में यह खर्च “लगभग न के बराबर” है. डॉ. आनंद ने यह भी कहा कि मल्टीप्लेक्स PCR टेस्टिंग सिर्फ कुछ खास लैब में ही की जा सकती है और टेस्ट करने का फैसला मरीज के लक्षणों, क्लिनिकल प्रेजेंटेशन और इलाज करने वाले डॉक्टर के असेसमेंट के आधार पर होना चाहिए.

लक्षण
नए आंकड़े H1N1 इन्फेक्शन में साल-दर-साल तेजी से बढ़ोतरी दिखाते हैं. डॉ. गोपाल ने कहा कि दिल्ली में 20 अगस्त तक 1,777 मामले दर्ज किए गए, जबकि पिछले साल इसी समय के दौरान 229 मामले थे, जो सात गुना से ज़्यादा की बढ़ोतरी दिखाता है. आम तौर पर बताए जाने वाले लक्षणों में बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, बदन दर्द, ठंड लगना, थकान, नाक बहना और नाक बंद होना शामिल हैं. कुछ मरीजों, खासकर बच्चों को जी मिचलाना, उल्टी या दस्त भी हो सकते हैं. डॉक्टरों ने कहा कि बिना किसी परेशानी वाले इन्फ्लूएंजा वाले ज्यादातर मरीजों का इलाज OPD में किया जा सकता है और उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती है. आमतौर पर तब भर्ती करने पर विचार किया जाता है जब मरीजों को निमोनिया, सांस लेने में दिक्कत, ऑक्सीजन सैचुरेशन कम होना, लगातार तेज बुखार या पहले से मौजूद मेडिकल कंडीशन बिगड़ने लगती है.
देर न करने की सलाह
डॉ. गोपाल ने कहा, “हम दोनों पैटर्न देख रहे हैं. H1N1 के बारे में बढ़ती जागरूकता के कारण कई मरीज़ जल्दी मेडिकल सलाह ले रहे हैं, जबकि कुछ कंसल्टेशन में देरी कर रहे हैं और लक्षण लगातार बने रहने या गंभीर होने पर ही आते हैं।” डॉ. अली शेर ने कहा कि बढ़ती जागरूकता ने कई मरीजों को शुरुआती स्टेज में ही मेडिकल सलाह लेने के लिए प्रेरित किया है, जबकि कुछ कंसल्टेशन में देरी कर रहे हैं और अपनी हालत बिगड़ने तक खुद ही इलाज कर रहे हैं. डॉ. गोपाल ने कहा कि कुछ मरीज बुखार, खांसी और सुस्ती को आम वायरल बीमारी समझ लेते हैं.
डॉ. गोपाल ने बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से दवा लेने के खिलाफ चेतावनी दी है, क्योंकि इन्फ्लूएंजा ज्यादा जोखिम वाले मरीजों में निमोनिया और सांस की दूसरी दिक्कतों में बदल सकता है. उन्होंने कहा कि अगर लोगों को सांस लेने में बहुत ज़्यादा तकलीफ है, लगातार सीने में दर्द है, ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा है या बार-बार वापस आने वाला बुखार है, तो उन्हें मेडिकल मदद लेनी चाहिए.
‘घबराने की जरूरत नहीं’
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और भारतयी आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने देश में बढ़ते H1N1 मामलों पर साफ कहा है कि जनता को घबराने की जरूरत नहीं है. ICMR के मुताबिक, देश में स्वाइन फ्लू का कोई नया या खतरनाक रूप सामने नहीं आया है. वर्तमान में फैल रहा वायरस ‘ A/Missouri/11/2025’ स्ट्रेन है, जो साल 2025 से ही देश में एक्टिव है. ICMR ने आश्वासन दिया है कि इस समय बाजार में उपलब्ध वैक्सीन इस वायरस से लड़ने में पूरी सक्षम है. यह वैक्सीन भारत में पाए जाने वाले तीन मुख्य स्ट्रेन -H1N1, H3N2, और B/Victoria से सुरक्षा देती है. विभाग ने आश्वासन दिया है कि सामान्य इम्युनिटी वाले लोगों में यह इन्फेक्शन 5 से 7 दिनों में आराम करने और सही देखभाल से ठीक हो जाता है. ICMR ने कहा है कि छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से पीड़ित लोगों को ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है.
मानसून में क्यों बढ़ते हैं इन्फ्लूएंजा के मामले
मानसून के दौरान इन्फेक्शन के मामले अचानक बढ़ने लगते हैं, इसका कारण है कि मानसून के दौरान हवा में ज्यादा नमी और तापमान में गिरावट आती है, जिससे इन्फ्लूएंजा वायरस हवा में और बाहरी सतहों पर ज्यादा देर तक जिंदा रहता है. इसलिए इसके फैलने का खतरा बढ़ जाता है. इस मौसम में लगातार बारिश होने के कारण लोग खुले मैदानों के बजाय घरों, ऑफिसों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसी बंद और कम हवादार जगहों पर ज्यादा समय बिताते हैं, जिससे यह वायरस एक इन्फेक्टेड व्यक्ति से दूसरे लोगों में बहुत आसानी से फैलता है. इसके अलावा, मौसम और तापमान में बार-बार अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव के कारण इंसान के शरीर की इम्यूनिटी कुछ समय के लिए कमजोर हो जाती है, जिससे हमारा श्वसन प्रणाली इस इन्फेक्टेड वायरस के प्रति ज्यादा कमजोर हो जाता है.
साफ-सफाई का ध्यान रखें
- भीड़ वाली जगहों पर मास्क पहनें- भीड़ वाली, बंद जगहों पर मास्क पहनने से (खासकर जब सांस की बीमारियां फैल रही हों) सांस की बूंदों और एरोसोल के संपर्क में आने का खतरा कम हो सकता है.
- खांसते और छींकते समय मुंह ढकें – खांसते या छींकते समय अपना मुंह और नाक ढक लें. सीधे अपने हाथों पर खांसने या छींकने के बजाय टिशू या अपनी कोहनी के अंदरूनी हिस्से का इस्तेमाल करें.
- अपने हाथ रेगुलर धोएं – रेगुलर साबुन और पानी से हाथ धोने से सांस की बीमारियों को फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है, खासकर खांसने, छींकने या भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने के बाद.
- अपने चेहरे को छूने से बचें – बिना धुले हाथों से अपनी आंखें, नाक या मुंह न छूने की कोशिश करें, क्योंकि वायरस इन्फेक्टड सतहों से आपके चेहरे पर आ सकते हैं.
- आइसोलेशन – जिन लोगों का स्वाइन फ़्लू टेस्ट पॉजिटिव आया है, उन्हें परिवार के दूसरे सदस्यों से दूर रखें. डॉक्टर की सलाह के बिना खुद से दवा न लें.
- हाथ मिलाने से बचें – इंफेक्शन को फैलने से रोकने के लिए दूसरों से हाथ मिलाने से बचें.
- खुद से दवा न लें– अगर आपको बीमारी के लक्षण दिखें, तो डॉक्टर की सलाह के बिना खुद से दवा न लें.
- अगर आप बीमार हैं तो घर पर रहें – अगर आपको बुखार या सांस लेने में गंभीर दिक्कत है तो दूसरों के पास जाने से बचें. घर पर रहने से इंफेक्शन को फैलने से रोका जा सकता है.
- हाइड्रेटेड रहें – बुखार या सांस की बीमारी के दौरान शरीर में पानी की सही मात्रा बनाए रखना जरूरी है, खासकर अगर आपको पसीना आ रहा हो या भूख कम लग रही हो. ऐसे में नारियल पानी और फ्रूट जूस पीते रहें.
- नैपकिन या टिशू का दोबारा इस्तेमाल न करें – इस्तेमाल किए गए नैपकिन या टिशू का दोबारा इस्तेमाल न करें. उन्हें इधर-उधर फेंकने से बचें और ठीक से डिस्पोज करें.
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News Source: PTI
