World Lung Cancer Day: फेफड़ों का कैंसर सबसे आम और सबसे जानलेवा है. यह दुनिया भर में कैंसर से होने वाली पांच में से एक मौत के लिए जिम्मेदार है. वहीं भारत की बात करें तो फेफड़ों के कैंसर से हर साल 60,000 लोगों की मौत हो जाती है. गंभीर होने के बावजूद, फेफड़ों के कैंसर के कई मामलों का पता तब तक नहीं चलता जब तक कि यह एडवांस स्टेज में न पहुंच जाए. ऐसा जानकारी की कमी और देर से स्क्रीनिंग की वजह से होता है. इसके अलावा, बहुत से लोग अभी भी इसे सिर्फ स्मोकिंग से जोड़ते हैं और दूसरे कारणों को नजरअंदाज कर देते हैं.
लोगों में जागरूकता की इस बड़ी कमी को दूर करने के लिए, हर साल 1 अगस्त को वर्ल्ड लंग कैंसर डे (World Lung Cancer Day) मनाया जाता है. इस खबर में आप जानेंगे कि फेफड़ों के कैंसर होने के मुख्य कारण क्या हैं, इसकी पहचान कैसे की जा सकती है और इसका इलाज क्या है.
फेफड़ों के कैंसर को समझिए
फेफड़ों का कैंसर तब शुरू होता है जब फेफड़ों में सेल्स बेकाबू होकर बढ़ते हैं, जिससे एक ट्यूमर बनता है. इस ट्यूमर के कारण सांस लेने में दिक्कत होती है. यह ट्यूमर शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकता है. यह दुनिया भर में सबसे ज़्यादा डायग्नोस होने वाले कैंसरों में से एक है और कैंसर से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण है. फेफड़ों का कैंसर दो प्रकार का होता है.
नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC): यह सबसे आम प्रकार है, जिसके ज्यादातर मामले होते हैं. यह आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ता और फैलता है.
स्मॉल सेल लंग कैंसर (SCLC): यह कम लोगों को होता है, लेकिन ज्यादा खतरनाक है. अक्सर यह तेजी से फैलता है और आमतौर पर स्मोकिंग से जुड़ा होता है.
लंग कैंसर के शुरुआती स्टेज में साफ लक्षण नहीं दिख सकते हैं. इसीलिए कई मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी पहले ही बढ़ चुकी होती है.

लंग कैंसर के मुख्य कारण हैं?
बहुत से लोग अब भी मानते हैं कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ स्मोकिंग करने वालों को होता है. हालांकि स्मोकिंग इसका मुख्य कारण है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है. धूम्रपान के अलावा फेफड़ों के कैंसर के कारणों में वायु प्रदूषण, कार्यस्थल पर जोखिम और फैमिली हिस्ट्री भी शामिल हैं. फेफड़ों के कैंसर से जुड़े अलग-अलग कारण और रिस्क फैक्टर नीचे दिए गए हैं:
धूम्रपान और सेकंड-हैंड स्मोक
तंबाकू का धुआं फेफड़ों के कैंसर का सबसे आम कारण है. धूम्रपान फेफड़ों की परत वाले सेल्स को नुकसान पहुंचाता है, जिससे अक्सर ऐसे बदलाव होते हैं जो समय के साथ कैंसर में बदल जाते हैं. हर दिन पी जाने वाली सिगरेट की संख्या बढ़ने से कैंसर का खतरा भी बढ़ता है. सेकंड-हैंड स्मोक भी फेफड़ों के लिए खतरनाक है, खासकर घरों या काम की जगहों पर जहां यह रेगुलर होता है. स्मोकिंग करने वालों के साथ रहने वाले बच्चे और बड़े खास तौर पर इसके शिकार हो सकते हैं.
वायु प्रदूषण
लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से, खासकर भीड़भाड़ वाले शहरों या इंडस्ट्रियल इलाकों में, फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और गाड़ियों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले एमिशन जैसे पॉल्यूटेंट धीरे-धीरे फेफड़ों के टिशू को नुकसान पहुंचा सकते हैं और बीमारी की संभावना बढ़ा सकते हैं.

काम से जुड़ा खतरा
कुछ पेशों में ऐसे पदार्थों के संपर्क में रहना पड़ता है जिन्हें लंबे समय तक सांस के जरिए अंदर लेने पर फेफड़ों का नुकसान होता है. इनमें शामिल हैं:
एस्बेस्टस: कंस्ट्रक्शन और जहाज बनाने में बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला एस्बेस्टस फाइबर सांस के जरिए फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है और कैंसर का कारण बन सकता है.
डीजल का धुआं: इंजन के धुएं के संपर्क में आने वाले मजदूरों को ज़्यादा खतरा हो सकता है, खासकर ट्रांसपोर्ट या माइनिंग इंडस्ट्री में.
सिलिका, आर्सेनिक और दूसरे इंडस्ट्रियल केमिकल: मैन्युफैक्चरिंग या माइनिंग में लंबे समय तक संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है.
रेडॉन गैस
रेडॉन एक प्राकृतिक रूप से मिलने वाली रेडियोएक्टिव गैस है जो मिट्टी और पत्थरो में बनती है. यह दीवारों या नींव की दरारों से इमारतों में अंदर जा सकती है और घर के अंदर, खासकर बेसमेंट या खराब हवादार जगहों पर खतरनाक लेवल तक जमा हो सकती है. रेडॉन के लंबे समय तक संपर्क में रहना, सिगरेट न पीने वालों में फेफड़ों के कैंसर के सबसे आम कारणों में से एक है. रेडॉन का लेवल इलाके के हिसाब से अलग-अलग होता है. कुछ देशों में घरों और काम की जगहों पर रेडॉन टेस्टिंग को बढ़ावा दिया जाता है.
जेनेटिक और फैमिली हिस्ट्री
कुछ मामलों में लोग जेनेटिक म्यूटेशन के साथ पैदा होते हैं, जिससे उन्हें बिना किसी रिस्क फैक्टर के भी लंग कैंसर होने का खतरा ज़्यादा होता है. जिन लोगों के परिवार में पहले किसी को फेफड़ों का कैंसर हुआ हो, उन्हें ज्यादा खतरा हो सकता है.
फेफड़ों के कैंसर के लक्षण
फेफड़ों का कैंसर अक्सर शुरुआती स्टेज में चुपचाप बढ़ता है, जिसका मतलब है कि कई लोगों को तब तक लक्षण पता नहीं चलते जब तक बीमारी बढ़ न जाए. इसलिए शरीर में होने वाले किसी भी ऐसे बदलाव पर ध्यान देना जरूरी है जो अजीब लगे या लगातार हो. फेफड़ों के कैंसर के लक्षणों में ये शामिल हैं-
- लगातरा बनी रहने वाली खांसी या समय के साथ बढ़ने वाली खासी
- हल्के काम के दौरान भी सांस लेने में तकलीफ
- सीने में दर्द, जो गहरी सांस लेने या खांसने से बढ़ता है
- बिना किसी वजह के वजन कम होना या भूख न लगना
- खून की खांसी, भले ही थोड़ी मात्रा में हो
- लगातार थकान या कमजोरी
- आवाज बैठना या बदलाव
- बार-बार सीने में इन्फेक्शन, जैसे ब्रोंकाइटिस या निमोनिया
- कम सामान्य लक्षणों में गर्दन या चेहरे में सूजन, हड्डियों में दर्द, या उंगलियों के पोरों के आकार में बदलाव शामिल हो सकते हैं. ये तब हो सकते हैं जब कैंसर फैलना शुरू हो गया हो.
इनमें से कई लक्षण शुरू में हल्के लग सकते हैं या दूसरी समस्या समझी जा सकते हैं. इसीलिए अलर्ट रहें और जब कुछ ठीक न लगे तो डॉक्टर से बात करें.
जांच के तरीके
लंग कैंसर का पता लगाने में अक्सर एक से ज़्यादा टेस्ट करने पड़ते हैं. फेफड़ों के कैंसर के जांच के तरीकों में फिजिकल जांच, इमेजिंग (जैसे चेस्ट एक्स-रे, कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन, और मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग), ब्रोंकोस्कोपी का इस्तेमाल करके फेफड़ों की जांच, हिस्टोपैथोलॉजी जांच के लिए टिशू का सैंपल लेना शामिल है.
कैसे होता है फेफडों के कैंसर का इलाज
फेफड़ों के कैंसर का इलाज कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे कैंसर का टाइप, यह कितना फैला है और व्यक्ति की पूरी हेल्थ. डॉक्टर बीमारी को मैनेज करने के लिए एक तरीका या इलाज के कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल कर सकते हैं. हर ऑप्शन का एक अलग मकसद होता है. इलाज में ट्यूमर को हटाने से लेकर उसकी ग्रोथ को धीमा करने और लक्षणों से राहत दिलाने तक सब शामित होता है.
सर्जरी
सर्जरी के बारे में अक्सर तब सोचा जाता है जब कैंसर शुरुआती स्टेज में पता चलता है और फेफड़ों से आगे नहीं फैला होता. इसका मकसद ट्यूमर को हटाना होता है और कुछ मामलों में फेफड़ों के आस-पास के टिशू को भी हटाना होता है. लंग सर्जरी कई तरह की होती हैं, जैसे:
- लोबेक्टोमी: फेफड़ों के एक हिस्से को हटाना
- न्यूमोनेक्टॉमी: पूरे फेफड़े को हटाना
- सेगमेंटेक्टॉमी या वेज रिसेक्शन: लंग के एक छोटे हिस्से को हटाना
- सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी की जा सकती है ताकि कैंसर के वापस आने का खतरा कम हो सके.
कीमोथेरेपी
कीमोथेरेपी में कैंसर सेल्स को मारने या उन्हें बढ़ने से रोकने के लिए दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. इसका इस्तेमाल सर्जरी से पहले (ट्यूमर को छोटा करने के लिए), सर्जरी के बाद (बचे हुए कैंसर सेल्स को खत्म करने के लिए) या जब सर्जरी मुमकिन न हो, तो इलाज के मुख्य तरीके के तौर पर किया जाता है. कीमोथेरेपी अक्सर साइकिल में दी जाती है और इससे थकान, जी मिचलाना या कमजोर इम्यून सिस्टम जैसे साइड इफेक्ट हो सकते हैं, लेकिन नई दवाओं ने मरीजों के इसे सहने के तरीके को बेहतर बनाने में मदद की है.

रेडियोथेरेपी
रेडियोथेरेपी में कैंसर सेल्स को टारगेट करने और खत्म करने के लिए हाई-एनर्जी किरणों का इस्तेमाल किया जाता है. इसका इस्तेमाल कीमोथेरेपी के साथ किया जाता है, जब सर्जरी मुमकिन न हो तो. इसके अलावा दर्द या सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षणों से राहत पाने के लिए रेडियोथेरेपी की जाती है.
टारगेटेड थेरेपी
टारगेटेड थेरेपी में ऐसी दवाओं का इस्तेमाल होता है जो खास तरह के फेफड़ों के कैंसर सेल्स में पाए जाने वाले खास जेनेटिक बदलावों या प्रोटीन पर फोकस करती हैं. ये दवाएं ज़्यादातर हेल्दी सेल्स को नुकसान पहुंचाए बिना कैंसर की ग्रोथ और फैलाव को रोकती हैं. यह तरीका ज़्यादातर नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर में इस्तेमाल किया जाता है.
इम्यूनोथेरेपी
इम्यूनोथेरेपी शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल्स को पहचानने और उनसे लड़ने में मदद करती है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से फेफड़ों के कैंसर के एडवांस स्टेज में किया जाता है, खासकर तब जब दूसरे इलाज काम न करें. इसका इस्तेमाल अकेले या कीमोथेरेपी के साथ किया जा सकता है.
पैलिएटिव केयर
जिन मामलों में कैंसर इतना एडवांस हो चुका होता है कि उसका इलाज नहीं हो पाता, वहां पैलिएटिव केयर लक्षणों को कम करने और जीवन की क्वालिटी को बेहतर बनाने पर फोकस करता है. इसमें दर्द से राहत, सांस लेने में मदद और इमोशनल या साइकोलॉजिकल देखभाल शामिल हो सकती है. व्यक्ति की स्थिति और पसंद के आधार पर पैलिएटिव ट्रीटमेंट को दूसरी थेरेपी के साथ मिलाया जा सकता है.
फेफड़ों के कैंसर से जुड़े फैक्ट्स
- फेफड़ों का कैंसर दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण है. WHO के मुताबिक, 2022 में दुनियाभर लगभग 25 लाख केस सामने आए और 18 लाख मौतें हुई.
- 70–80% मामलों में धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण होता है. इसके बाद प्रदूषण और काम से जुड़े फैक्टर आते हैं
- इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में भारत में लंग कैंसर के मरीजों की संख्या 81 हजार तक पहुंच गई थी.
- भारत में हर 74 लोगों में से एक को इस बीमारी का खतरा है.
- भारत में हर साल 60 हजार लोगों की इस बीमारी से मौत होती है.
- विशेषज्ञों के लिए चिंता की बात यह है कि करीब 80 फीसदी लोगों में इस बीमारी का पता तीसरे या चौथे चरण में लगता है.
हर साल 70 लाख लोगों की जान ले रहा तंबाकू, अगला नंबर…, आसपास के Smoker भी हैं आपके लिए खतरा!
News Source: WHO
