Nepal Flood: नेपाल में कुदरत के कहर ने एक झटके में हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया. अचानक आई विनाशकारी बाढ़ अपने साथ सिर्फ पानी का सैलाब नहीं, बल्कि मौत का वो खौफनाक मंजर लेकर आई जिसने सैकड़ों मासूम जिंदगियों को हमेशा के लिए लील लिया. इस त्रासदी में कई ऐसे थे, जिन्होंने मौत को बेहद करीब से अपने सामने से गुजरते देखा. पानी की रफ्तार इतनी तेज थी कि संभलने का एक पल भी नहीं मिला.
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नहीं खत्म हो रहा अपनों को खोने का गम
दिल को झकझोर देने वाली बात यह है कि कई बेबस लोगों ने अपनी ही आंखों के सामने अपने कलेजे के टुकड़ों, जीवनसाथी और बूढ़े माता-पिता को पानी के तेज बहाव में विलीन होते देखा. चीखते-चिल्लाते अपनों को बचाने के लिए वे हाथ फैलाते रहे, लेकिन बेबसी का आलम यह था कि वे सिर्फ किनारे पर खड़े होकर आंसू बहाने के अलावा कुछ न कर सके. कुछ लोग पत्थर की मूरत बने अपने जिगरी दोस्तों को तिनके की तरह बहते हुए देखते रह गए. जो खुशनसीब इस सैलाब से बचकर जिंदा लौट आए हैं, उनके जिस्म भले ही महफूज हों, लेकिन रूह पर गहरे जख्म हैं. वे जब भी उस काली रात और पानी के गर्जन को याद करते हैं, तो डर से सिहर उठते हैं. अपनों को खोने का यह गम और तबाही का वो मंजर उनकी आंखों के सामने से हट नहीं रहा है.
भूकंप का भ्रम और तबाही का मंजर
शुरुआत में दीपक तमांग को लगा कि ज़मीन हिल रही है. फिर उन्होंने देखा कि पानी, कीचड़ और पत्थरों का सैलाब तिमुरे बाज़ार में भोटेकोशी नदी के किनारे बने घरों की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है. यह देख उन्हें एहसास हुआ कि ऊपर जाने के अलावा कोई चारा नहीं है. बाढ़ से बचे लोगों ने बेहद डरावने मंज़र बयां किए हैं. ऊंची जगहों की ओर बेताब होकर भागना, अपने आसपास घरों का गिरना और पानी, कीचड़ व मलबे के तेज़ बहाव में लोगों का बह जाना. बुधवार को यह सब हुआ, जब पानी और मलबे का सैलाब कस्बों और गांवों से गुज़रा और रास्ते में आने वाली हर चीज़ को बहा ले गया.

तेजी से पहाड़ी की तरफ भागा दीपक
कुछ लोगों के लिए जान बचाने का मतलब था ऊंची जगह की ओर तेज़ी से भागना. वहीं, कुछ लोग बेबस होकर अपने दोस्तों और अपनों को बहते हुए देखते रहे. बाद में प्रभावित इलाकों में पहुंचे लोगों ने देखा कि बाज़ार कीचड़ में सने हुए थे और परिवार अपने लापता रिश्तेदारों की तलाश कर रहे थे. नेपाली न्यूज़ पोर्टल ‘ऑनलाइन खबर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पड़ोसी सिंधुपल चौक ज़िले के रहने वाले तमांग उस समय नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर बसे शहर तिमुरे में थे, जब अचानक बाढ़ आ गई.
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उन्होंने याद करते हुए कहा कि जब मैं घर से बाहर निकला और पहाड़ी की ओर ऊपर भागा तो तेज़ बाढ़ की वजह से कुछ घर पहले ही गिर चुके थे. तमांग ने कहा कि मेरे पास ज़्यादा समय नहीं थे. मेरे पीछे बाढ़ थी और सामने दीवार जैसी पहाड़ी थी. वह ढलान की ओर भागे और दीवार जैसी दिख रही पहाड़ी पर चढ़ने के लिए संघर्ष करने लगे. वह कई बार गिरे और ऊपर चढ़ने के लिए उन्होंने कांटेदार झाड़ियों और चुभने वाले पौधों का सहारा लिया. उन्होंने कहा कि यह ज़िंदगी और मौत के बीच मेरी आखिरी दौड़ थी.
कुछ न कर सका- आंखों के सामने बह गए दोस्त
नीचे बाढ़ का पानी तेज़ी से बढ़ रहा था और लोग अलग-अलग दिशाओं में भाग रहे थे. हर बार जब वह गिरते तो तमांग को लगता कि शायद यह उनकी ज़िंदगी का आखिरी पल है. आखिरकार, वह पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए, जहां से उन्होंने लोगों को बाढ़ में बहते हुए देखा. उनमें उनके दोस्त भी शामिल थे. उन्होंने याद करते हुए कहा कि जब मेरे दोस्त मेरी आंखों के सामने लहरों में बह गए, तो मैं कुछ नहीं कर सका. आखिरकार तमांग को जंगल में लकड़ी रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक पुराना गोदाम मिला, जहां अपनी जान बचाने में कामयाब रहे दर्जनों अन्य लोगों ने भी शरण ली थी. उन्होंने वहां बिना बिस्तर के रात बिताई, जबकि बारिश होती रही और वे बचाव दल का इंतज़ार करते रहे. लगभग 24 घंटे बाद उन्हें बचाया गया.
खौफ के बीच प्रियजनों की कर रहे थे तलाश
बाढ़ के कुछ ही समय बाद त्रिशूली पहुंचे फोटो जर्नलिस्ट अमूल थापा के लिए उस तबाही को समझना लगभग नामुमकिन था. नेपाली दैनिक ‘नया पत्रिका’ में अपनी यात्रा के बारे में लिखते हुए थापा ने बताया कि उन्होंने घटना के लगभग एक घंटे बाद सुबह करीब 10 बजे काठमांडू से अपनी यात्रा शुरू की और कुछ घंटों बाद त्रिशूली बाज़ार पहुंचे. बाज़ार में लगभग 60 घर थे, लेकिन ज़्यादातर कीचड़ में दब गए थे. कुछ जगहों पर तो सिर्फ़ घरों की छतें ही दिखाई दे रही थीं.

उन्होंने देखा कि सड़क और घरों के बीच मुश्किल से ही कोई फ़र्क नज़र आ रहा था. लोग ऊपरी बाज़ार में भाग रहे थे, जबकि दूसरे लोग बाढ़ में लापता हुए अपने प्रियजनों की तलाश कर रहे थे. बाज़ार का लगभग आधा हिस्सा तबाह हो चुका था. थापा ने लोगों को उत्तरगया बोर्डिंग स्कूल के कुछ छात्रों के बारे में बात करते हुए भी सुना, जो लापता हो गए थे और बाद में छह घंटे तक जंगल में पैदल चलकर अपने स्कूल लौट आए थे.
60 फीट ऊंचा सैलाब देख सिहर गए
शुक्रवार दोपहर तक चितवन इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के पास शव ले जा रही एम्बुलेंस आ-जा रही थी. थापा ने लिखा कि बाढ़ में रसुवा से बहकर आए कुछ शव नारायणी नदी से बरामद किए गए थे. इस आपदा में फंसे लोगों में भारतीय-अमेरिकी दंपत्ति अंजना राजा और पट्टाभिरामन् वेंकटेशन भी शामिल थे, जो नेपाल में फंस गए थे और बाद में उन्हें बचाकर एयरलिफ़्ट के ज़रिए काठमांडू ले जाया गया. राजा ने CBS न्यूज़ को बताया कि मुझे पता था कि मैं मरने वाली हूं.
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वेंकटेशन ने कहा कि मलबे की जो दीवार उनकी तरफ़ आ रही थी, वह लगभग 60 से 70 फ़ीट ऊंची लग रही थी और सुनामी जैसी दिख रही थी. उन्होंने कहा कि मैं उस भयानक चीज़ को नीचे आते हुए देख सकता था. उस समय मुझे नहीं पता था कि वह पानी है. सच कहूं तो, मुझे लगा कि वह आग है, जंगल की आग है. राजा ने ABC न्यूज़ को बताया कि पानी और कीचड़ का सैलाब बहुत ऊंचा था. उन्होंने कहा कि यह पानी और कीचड़ का मिश्रण था जो कम से कम 50 से 60 फ़ीट ऊंचा था.
जान बचाने को भाग रहे थे बेतहाशा
राजा ने अपने पति का कॉलर पकड़ा और चिल्लाई, भागो और दोनों बस से कूद गए. वे ऊंची जगह की ओर तेज़ी से भागे और सीढ़ियां चढ़ने लगे, जबकि उनके आस-पास घर गिर रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि वे कहां जा रहे हैं. राजा ने कहा कि हम बस आंख बंद करके ऊपर चढ़ते गए. हमें यह भी नहीं पता था कि किस दिशा में जा रहे हैं. हमारे लिए कोई गाइड नहीं था, कोई नहीं था, हम बस घबराहट में भाग रहे थे. ज़मीन कीचड़ वाली और दलदली थी, और पत्थर फिसलन भरे थे. जब वे ऊंची जगह पर पहुंचे तो राजा ने देखा कि बाढ़ का पानी ढलान पर ऊपर चढ़ रहा था और उनकी बस को धकेल रहा था.
दंपति ने कहा- अब हम मर जाएंगे
राजा ने कहा कि मैंने अपने पति से कहा, ‘बस, अब हम गए, हम मरने वाले हैं’. मैंने मौत को अपनी आंखों के सामने देखा.
आखिरकार एक गाइड उस जोड़े को पास के पहाड़ की चोटी पर एक समतल जगह तक ले गया. पहाड़ पर चढ़ना बहुत मुश्किल था. रास्ता संकरा और फिसलन भरा था, और वहां कीचड़ और पत्थर बिखरे हुए थे. राजा ने कहा कि इतनी ऊंचाई पर मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम कैसे चढ़ पाए. वेंकटेशन ने उनके बच जाने को किसी चमत्कार से कम नहीं बताया. उन्होंने कहा कि इस अनुभव ने उस जोड़े के मन में ज़िंदगी के प्रति एक नई समझ पैदा की है. उन्होंने कहा कि इससे ज़िंदगी के बारे में मेरी सोच और मज़बूत हुई है. अच्छा बनो, अच्छा करो, अच्छा सोचो और बाकी सब उस ऊपर वाले पर छोड़ दो.
बस दो मिनट और बच गई पूरे परिवार की जान
सोनू अधिकारी ने शनिवार को बताया कि यह सब बस दो मिनट की बात थी. उन्होंने बताया कि कैसे उनके माता-पिता ने परिवार के ज़रूरी कानूनी कागज़ात इकट्ठा किए और मध्य नेपाल के गल्छी में स्थित अपने उस घर से, जहां वे दो दशकों से ज़्यादा समय से रह रहे थे, गाड़ी में बैठकर विनाशकारी बाढ़ से जान बचाकर निकले. 25 साल की सोनू ने कहा कि मेरे माता-पिता, बड़ी बहन और छोटे भाई के हमारी गाड़ी में निकल जाने के लगभग दो मिनट बाद ही हमारा पूरा घर बाढ़ के पानी में डूब गया. पानी का बहाव बहुत तेज़ था. हमारे घर के पीछे बना एक मंदिर भी पूरी तरह पानी में डूब गया था.

अब तक 2,400 से ज्यादा लोग लापता
भोटेकोशी नदी में पानी का स्तर बढ़ने के बाद बाढ़ की एक और लहर आने के डर के बावजूद बचाव दल ने तलाशी अभियान जारी रखा.खोज और बचाव अभियान के लिए 11,000 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं, जिनमें 5,000 से ज़्यादा नेपाली सेना के जवान शामिल हैं. शनिवार तक मरने वालों की संख्या 650 के पार पहुंच गई, जबकि 2,400 से ज़्यादा लोग लापता थे. बाढ़ प्रभावित इलाकों में रुक-रुक कर हो रही बारिश के बीच बचाव दल तेज़ी से काम करते हुए लगभग 2,500 लोगों को सुरक्षित जगहों पर ले गए.
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