Indian Tea History: भारत में अगर किसी चीज़ को सबसे ज्यादा इमोशनल सपोर्ट सिस्टम कहा जाए, तो वो शायद चाय ही होगी. सुबह आंख खुलते ही “चाय बनी क्या?” से शुरू होने वाला दिन रात की आखिरी गपशप तक इसी के साथ खत्म होता है. कोई दुखी हो, खुश हो, ब्रेकअप हुआ हो या प्रमोशन मिला हो, हर मौके पर एक कप चाय अपने आप सामने आ जाती है. शायद यही वजह है कि चाय सिर्फ एक ड्रिंक नहीं, बल्कि हमारी लाइफ का सबसे फिल्मी किरदार बन चुकी है.जरा सोचिए, बारिश हो रही हो, बैकग्राउंड में पुराना बॉलीवुड गाना बज रहा हो और हाथ में गरमा-गरम अदरक वाली चाय हो. या फिर कॉलेज की कैंटीन में दोस्तों के साथ आधे घंटे वाली चाय, जो 3 घंटे की लाइफ डिस्कशन में बदल जाए. भारत में चाय सिर्फ पी नहीं जाती, फील की जाती है. यहां रिश्ते भी चाय पर बनते हैं और कई बार टूटे दिल भी इसी के सहारे संभलते हैं. यही वजह है कि आज 21 मई का दिन इंटरनेशनल टी डे, सिर्फ चाय को सेलिब्रेट करने का दिन नहीं है, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों को याद करने का मौका भी है जो एक कप चाय के आसपास घूमते हैं. किसी के लिए मां के हाथ की इलायची वाली चाय सबसे प्यारी याद है, तो किसी के लिए ऑफिस की चाय ब्रेक दिन का सबसे सुकून वाला पल. कई लोगों की लव स्टोरी भी “चलो चाय पीने चलते हैं” से ही शुरू हुई होगी. लेकिन आखिर ये चाय हमारी लाइफ का इतना अहम हिस्सा कैसे बन गई. आज इसी सवाल का जवाब लेकर आए हैं.

भारत और चाय का रिश्ता
भारत और चाय का रिश्ता सिर्फ स्वाद तक नहीं है, बल्कि ये देश के कल्चर, आदतों और डेली लाइफ का अहम हिस्सा बन चुका है. सुबह की शुरुआत से लेकर शाम की गपशप तक, चाय हर भारतीय की जिंदगी में खास जगह रखती है. शायद यही वजह है कि भारत आज दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक देशों में गिना जाता है. दिलचस्प बात ये है कि भारत में बनने वाली 70 प्रतिशत से ज्यादा चाय देश के लोग खुद ही पी जाते हैं.असम और दार्जिलिंग जैसी फेमस चाय दुनियाभर में अपनी खास खुशबू और स्वाद के लिए जानी जाती हैं. इनकी पहचान इतनी मजबूत है कि विदेशी लोग भी भारतीय चाय के दीवाने हैं. आज भारतीय चाय इंडस्ट्री दुनिया की सबसे मॉर्डन और टेक्नोलॉजी से लैस इंडस्ट्री में शामिल हो चुकी है. दिलचस्प बात ये है कि आज जिस चाय को भारतीय अपनी लाइफलाइन मानते हैं, वो हमेशा से इंडियन कल्चर का हिस्सा नहीं थी. एक टाइम ऐसा भी था जब देश के ज्यादातर लोगों ने चाय का स्वाद तक नहीं चखा था. चाय का सफर भारत में अंग्रेजों के बिजनेस से शुरू हुआ. फिर धीरे-धीरे ये चाय देश की पहचान बन गई. ये कहानी सिर्फ एक ड्रिंक की नहीं, बल्कि पॉलिटिक्स, आजादी, मार्केटिंग, स्ट्रगस और भारतीय जुगाड़ की भी है.
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असम के जंगलों से शुरू हुई कहानी
भारत में चाय का इतिहास काफी पुराना माना जाता है. असम के जंगलों में सदियों पहले जंगली चाय उगती थी. वहां रहने वाले सिंगफो समुदाय और कई आदिवासी समूह इस चाय का इस्तेमाल करते थे. उनके लिए ये सिर्फ पीने की चीज़ नहीं, बल्कि बॉडी को एनर्जी देने वाली जड़ी-बूटी जैसी थी. वो चाय की पत्तियों को सुखाकर बांस में भरते थे और धुएं में पकाते थे. बाद में जरूरत पड़ने पर उसी बांस का टुकड़ा काटकर चाय बनाई जाती थी. ये तरीका आज भी कुछ इलाकों में इस्तेमाल किया जाता है. उस टाइम भारत में चाय आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा नहीं थी. गुजरात के सूरत जैसे बड़े शहरों में चीन से आने वाली चाय का इस्तेमाल दवा की तरह किया जाता था. लोग इसे सिरदर्द और पेट की परेशानी में पीते थे.

ब्रिटेन को लगी चाय की लत
18वीं और 19वीं सदी तक ब्रिटेन में चाय काफी पॉपुलर हो चुकी थी. अंग्रेज सुबह-शाम चाय पीते थे. वो इसे चीन से अच्छी-खासी क्वांटिटी में मंगाते थे. लेकिन धीरे-धीरे चीन और ब्रिटेन के रिश्ते खराब होने लगे. बिजनेस में तनाव बढ़ा और अंग्रेजों को डर सताने लगा कि, कहीं चाय की सप्लाई बंद न हो जाए. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी चीन की चाय मोनोपोली को तोड़ना चाहती थी. इसी वजह से उन्होंने रॉबर्ट फॉर्च्यून नाम के एक बोटेनिस्ट को सीक्रेट मिशन पर चीन भेजा, ताकि वो चाय के पौधे और उसकी खेती के सीक्रेट चुरा सके. फॉर्च्यून इस काम में सक्सेसफुल रहा. वो चीन से चाय के पौधे और मजदूर भारत ले आया. लेकिन असली ट्विस्ट तब आया जब उसे पता चला कि असम के पहाड़ों में पहले से ही जंगली चाय के पौधे उग रहे थे. ये पौधे असम की क्लाइमेट के लिए बिल्कुल परफेक्ट थे. उन्होंने तुरंत इस मौके को पकड़ लिया. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने असम में बड़े-बड़े चाय बागान बनाने शुरू कर दिए. जंगल साफ किए गए और हजारों एकड़ जमीन पर चाय उगाई जाने लगी. 1850 तक, अंग्रेजों ने असम में बड़े-बड़े चाय के बागान बना दिए. यहीं से भारत में बड़े लेवल पर चाय की खेती शुरू हो गई.

दर्दनाक कहानी
चाय की खेती तो शुरू हो गई, लेकिन प्रोब्लम थी मजदूरों की. लोकल असमी लोग अंग्रेजों के लिए काम नहीं करना चाहते थे. ऐसे में ब्रिटिश कंपनियों ने भारत के अलग-अलग हिस्सों से मजदूरों को लाकर चाय बागानों में काम पर लगाया. इनमें बड़ी संख्या गरीब परिवारों की थी. इन मजदूरों की जिंदगी काफी ज्यादा मुश्किल थी. लंबा टाइम तक काम, कम मजदूरी, खराब खाना और बीमारी आम बात थी. कई मजदूर कर्ज में फंस जाते थे और चाहकर भी बागानों से बाहर नहीं निकल पाते थे. इतिहासकारों के मुताबिक, कई चाय बागानों में हालत इतनी खराब थी कि मजदूरों की मौते भी होने लगीं. कई बार मजदूरों ने इसके खिलाफ आवाज़ भी उठाई. लेकिन इन सबके बावजूद चाय का बिजनेस तेजी से बढ़ता गया और असम दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक क्षेत्रों में शामिल हो गया.
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स्टेटस सिंबल
उस दौर में भारत में बनने वाली ज्यादातर चाय विदेश भेज दी जाती थी. भारत में सिर्फ अंग्रेज ऑफिसर्स और कुछ अमीर भारतीय ही चाय पीते थे. चाय पीना मॉर्डन और अंग्रेजी कल्चर की निशानी माना जाता था. इतना ही नहीं चाय बनाने का तरीका भी पूरी तरह ब्रिटिश था. तय टाइम तक चाय को गर्म पानी में डाला जाता था. इसके बाद खास कपों में परोसा जाता था. लेकिन भारतीयों ने जल्दी ही इस चाय को अपने अंदाज में बदलना शुरू कर दिया. शुरुआत में भारती के लोगों को काली चाय पसंद नहीं थी. ये महंगी होने के साथ-साथ कड़वी भी थी. हालांकि, भारतीयों ने अपना दिमाग लगाया और उन्होंने चाय में दूध, चीनी और अदरक-इलायची जैसे मसाले मिला दिए. इससे चाय टेस्टी हो गई और लोगों की जुबां को भा गई. यहीं से पैदा हुई हमारी फेवरेट ‘मसाला चाय’.

टी कैबिन और मार्केटिंग
भारतीयों ने कम चायपत्ती में ज्यादा कप चाय बनाने का तरीका भी ढूंढ़ लिया. टूटी हुई और सस्ती चायपत्ती इस्तेमाल होने लगी. इससे चाय ज्यादा कड़क और सस्ती बन गई. फिर 1920 और 1930 के दशक में भारत के बड़े शहरों में चाय की दुकानें तेजी से खुलने लगीं. कोलकाता में ‘टी कैबिन’ काफी फेमस हुए. यहां लोग सिर्फ चाय पीने नहीं आते थे, बल्कि राजनीति, साहित्य और फिल्मों पर लंबी बहसें करते थे. धीरे-धीरे ये जगहें इंटेलेक्चुअल और फ्रीडम फाइटर्स की मीटिंग पॉइंट बन गईं. मुंबई और दिल्ली में पारसी कैफे भी काफी पॉपुलर हुए. वहां मिलने वाली इरानी चाय अपने गाढ़े स्वाद और मलाई के लिए फेमस थी. फिर आया साल 1930 का दशक, जब दुनिया आर्थिक मंदी से गुजर रही थी. विदेशों में भारतीय चाय की बिक्री कम होने लगी. ऐसे में चाय कंपनियों ने इंडियन मार्केट पर फोकस करना शुरू किया. बड़े लेवल पर विज्ञापन चलाए गए. रेलवे स्टेशन, गांव, फैक्ट्रियां और ऑफिसों में फ्री में चाय बांटी जाने लगी. लोगों को बताया गया कि चाय बॉडी को ताकत देती है. साथ ही काम में फुर्ती लाती है.

टी ब्रेक की शुरुआत
धीरे-धीरे लोग चाय के स्वाद के आदी होने लगे. गांवों तक चाय पहुंचने लगी और ये आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनने लगी. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चाय कंट्रोवर्सी में भी रही. दरअसल, महात्मा गांधी ने ब्रिटिश चीजों के बहिष्कार की अपील की, जिसमें चाय भी शामिल थी. गांधी जी चाय बागानों में मजदूरों की हालत से नाराज थे. उनका मानना था कि ज्यादा चाय पीना हेल्थ के लिए भी अच्छा नहीं है. लेकिन दूसरी तरफ कंपनियों ने चाय को स्वदेशी ड्रिंक की तरह पेश करना शुरू कर दिया. विज्ञापनों में भारतीय कपड़ों में लोग चाय पीते दिखाए जाने लगे. धीरे-धीरे चाय अंग्रेजों की ड्रिंक से निकलकर भारतीय पहचान का हिस्सा बनने लगी. 1947 में भारत आजाद हुआ और धीरे-धीरे चाय बिजनेस भारतीय कंपनियों के हाथों में आने लगा. इसी बीच “CTC” यानी “क्रश, टियर, कर्ल” तकनीक आई, जिसने चाय बिजनेस को पूरी तरह से बदल दिया. इस तकनीक में चायपत्तियों को छोटे-छोटे दानों में बदला जाता था, जिससे चाय जल्दी बनती थी और ज्यादा कड़क स्वाद देती थी. CTC चाय सस्ती भी थी और ज्यादा लोगों तक पहुंचने लगी.
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हर घर का हिस्सा
1950 और 1960 के दशक तक चाय भारत के लगभग हर घर का हिस्सा बन चुकी थी. भारत में चाय ने सिर्फ लोगों की आदत नहीं बदली, बल्कि एक पूरा कल्चर बना दिया. रेलवे स्टेशन की कुल्हड़ वाली चाय, मुंबई की कटिंग चाय, कश्मीर की कहवा, हैराबाद की इरानी चाय और गुजरात की मसाला चाय, हर शहर की अपनी चाय पहचान बन गई. कई लोगों के लिए सुबह की चाय दिन की शुरुआत होती है. वहीं, कुछ लोग बिना शाम की चाय के काम ही नहीं कर पाते. इतना ही नहीं, भारतीय फिल्मों में भी चाय के लिए खास जगह रखी गई. बारिश का रोमांटिक सीन हो या दोस्तों की गपशप, चाय हर जगह नजर आती है. कई फिल्मों में सड़क किनारे चाय की दुकानें कहानी का अहम हिस्सा रही हैं. बॉलीवुड ने चाय को सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि फीलिंग बना दिया.

दुनिया भी हुई दीवानी
समय के साथ भारत के लोग विदेशों में बसने लगे और मसाला चाय का स्वाद दुनिया तक पहुंच गया. 1990 के दशक में स्टारबक्स जैसी कंपनियों ने चाय लाटे लॉन्च किया. हालांकि, विदेश में मिलने वाली चाय भारतीय मसाला चाय से काफी अलग होती है. हालांकि, उसका बेसिक आइडिया भारत से ही गया. आज भारतीय मसाला चाय दुनिया के सबसे पॉपुलर लोकप्रिय ब्रेवरेजेस में शामिल है. खैर, ये कहना गलत नहीं है कि, भारत में चाय सिर्फ पी नहीं जाती, जी जाती है. यहां रिश्तों की शुरुआत चाय से होती है. मेहमान आएं तो चाय, ऑफिस मीटिंग हो तो चाय, प्यार का इजहार हो तो चाय और दुख में भी चाय. शायद यही वजह है कि अंग्रेजों की शुरू की गई ये ड्रिंक आज पूरी तरह इंडियन बन चुकी है. वैसे भी, कुल्हड़ की मिट्टी की खुशबू, सड़क किनारे उबलती चाय, दोस्तों की हंसी और बारिश की बूंदों के बीच जो फीलिंग मिलती है, वो सिर्फ भारत की चाय में ही पॉसिबल है.
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