Youth Congress: चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और SIR को लेकर जारी विवाद के बीच यूथ कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान बड़ी संख्या में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी की. प्रदर्शन के दौरान युवा कार्यकर्ताओं के हाथों में कई पोस्टर भी नजर आए. एक पोस्टर पर लिखा था, ‘ज्ञानेश कुमार हटाओ, चुनाव आयोग बचाओ’, जबकि दूसरे पोस्टर पर ‘दिनदहाड़े लोकतंत्र की लूट’ लिखा हुआ था. प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की भी मांग की.
#WATCH | Members of Indian Youth Congress protest against Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar in Delhi pic.twitter.com/Q3uYUUFZPd
— ANI (@ANI) September 23, 2026
टिप्पणियां होना सामान्य बात
वहीं, भारी विवादों के बीच चुनाव आयोग ने भी अपना बयान जारी कर दिया है. आयोग ने कहा कि किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य बात है. ये अंतिम फैसला लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं. न केवल तीनों कमिश्नर, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आयोग को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है.
40 नई पहलें शुरू की गईं
EC ने आगे कहा कि 10 महीनों के दौरान की कुछ खास आंतरिक टिप्पणियों/अवलोकनों को उजागर करना, जबकि बड़ी संख्या में मंजूरियों, फैसलों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज करना, तस्वीर का केवल एक हिस्सा ही दिखाता है. हाल के महीनों में आयोग ने कई फैसले लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं. लगभग 40 नई पहलें शुरू की हैं और देश भर में मतदाता सूची संशोधन (SIR सहित) के संचालन सहित कई चुनावी सुधार किए हैं. ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे आयोग के सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम हैं.
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गंभीर स्थिति का पता चलता
दूसरी ओर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त SY कुरैशी ने आज अखबार में जो मैंने पढ़ा, उससे कानून के खुले उल्लंघन को लेकर एक बहुत गंभीर और विस्फोटक स्थिति का पता चलता है. चुनाव आयोग अधिनियम में साफ तौर पर कहा गया है कि 1993 में जब से बहु-सदस्यीय आयोग बना है तब से फैसले आम सहमति से होने चाहिए. कुछ नहीं तो कम से कम बहुमत की राय पर आधारित होना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि तीनों सदस्यों के पास समान अधिकार हैं. बहुमत बनाने वाले किन्हीं भी दो सदस्यों की राय ही मान्य होनी चाहिए. चाहे वे दो चुनाव आयुक्त हों या मुख्य चुनाव आयुक्त हो.
बिना सहमति के लिए गए फैसले गैर-कानूनी
कुरैशी ने अंग्रेजी अखबार की रिपोर्टिंग को लेकर हैरानी जताई. उनका कहना है कि ऐसा लगता है कि दोनों चुनाव आयुक्त कई मामलों पर कड़ा सवाल उठा रहे थे और विरोध कर रहे थे. फिर भी उन्हें भरोसे में नहीं लिया गया. मुझे यह भी पता चला है कि कभी-कभी तो चार महीने तक चुनाव आयोग की बैठकें ही नहीं हुईं. साथ ही अगर फैसले बहुमत से नहीं लिए जाते, तो वे गैर-कानूनी होते हैं. यहां पारदर्शिता जरूरी है. पिछले डेढ़ साल में लिए गए सभी फैसलों की एक पूरी सूची तैयार करके सार्वजनिक की जानी चाहिए, जिसमें बताया जाए कि कौन-से फैसले आम सहमति से लिए गए थे.
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