Home Top News Women Reservation का पेच? पक्ष-विपक्ष के दावों के बीच सुलगा OBC कोटे का मुद्दा

Women Reservation का पेच? पक्ष-विपक्ष के दावों के बीच सुलगा OBC कोटे का मुद्दा

by Preeti Pal
0 comment
क्यों फंसा Women Reservation का पेंच? पक्ष-विपक्ष के दावों के बीच आखिर क्यों सुलगा OBC कोटे का मुद्दा

Introduction

18 April, 2026

Women Reservation: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 17 अप्रैल, 2026 का दिन एक ऐसी तारीख के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने सत्ता और विपक्ष के बीच की दरार को और गहरा कर दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 साल के बेदाग संसदीय रिकॉर्ड में पहली बार किसी सरकारी बिल यानी 131वां संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में हार का मुंह देखना पड़ा. ये हार सिर्फ एक तकनीकी हार नहीं थी, बल्कि इसने भारत की ‘आधी आबादी’ के उस सपने पर फिर से सवालिया निशान लगा दिए हैं, जो साल 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के पारित होने के बाद हकीकत के करीब लग रहा था. इस हार ने न सिर्फ सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए हैं, बल्कि विपक्ष को भी एक बड़ा मुद्दा दे दिया है. हालांकि, इस शोर-शराबे के बीच आम इंसान के मन में ये सवाल है कि आखिर मौजूदा 543 सीटों वाली लोकसभा में ही महिलाओं को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा? सरकार सीटें बढ़ाकर इस प्रोसेस को पेचीदा क्यों बना रही है? ऐसे में इस पूरे सियासी खेल को आसान भाषा में समझते हैं.

Table of Content

  • आम जनता का सवाल
  • 2023 का वो कानून
  • सीट बढ़ाओ फॉर्मूला
  • विपक्ष का हमला
  • OBC का पेच
  • साउथ वर्सेस नॉर्थ
  • 50 साल का इंतज़ार
  • आगे का रास्ता
  • कब खत्म होगा इंतज़ार

आम जनता का सवाल

आज सबसे बड़ा सवाल जो हर चाय की दुकान से लेकर सोशल मीडिया के गलियारों तक गूंज रहा है, वो ये है कि जब कानून बन चुका है, तो 33% आरक्षण को मौजूदा 543 सीटों वाली लोकसभा में तुरंत लागू क्यों नहीं किया जा सकता? इस सवाल के पीछे छिपी है राजनीति और आने वाले दशकों का चुनावी गणित.

यह भी पढ़ेंःलोकसभा में गिरा महिला आरक्षण बिल, सरकार को नहीं मिला दो-तिहाई बहुमत, क्या बोले शाह?

2023 का वो कानून

सितंबर 2023 में जब संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पास हुआ था, तो इसे ऐतिहासिक बताया गया था. संसद ने इसे लगभग सर्वसम्मति से पारित किया था. 16 अप्रैल 2026 को इसे आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित भी कर दिया गया. अब ये भारत के संविधान का हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 334A के नाम से जाना जाता है. लेकिन, यहां एक बहुत बड़ा कैच है. कानून की भाषा में एक शर्त जोड़ी गई थी कि आरक्षण तभी लागू होगा जब एक नई जनगणना पूरी होगी और उसके आधार पर सीटों का नया परिसीमन किया जाएगा. इसका मतलब ये हुआ कि भले ही कानून पास हो गया हो, लेकिन जब तक देश की आबादी के नए आंकड़े नहीं आते और सीटों की सीमाएं दोबारा तय नहीं की जातीं, तब तक किसी भी महिला को इस कोटे का लाभ नहीं मिलेगा. अब विपक्ष का आरोप है कि ये शर्त ही वो ताला है जिसकी चाबी सरकार ने जानबूझकर फ्यूचर की तिजोरी में डाल दी है.

सीट बढ़ाओ फॉर्मूला

अप्रैल 2026 में सरकार जो संशोधन बिल लाई थी, उसके पीछे एक अलग ही तर्क था. सरकार ने प्रस्ताव दिया कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 816 यानी इसमें करीब 50% की बढ़ोतरी कर दी जाए और फ्यूचर में इसे 850 तक ले जाया जाए. गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में इसका जो अंकगणित समझाया, वो काफी दिलचस्प था. उन्होंने तर्क दिया कि अगर हम मौजूदा सीटों पर ही 33% आरक्षण लागू करते हैं, तो कई पुरुष सांसदों को अपनी सीटें गंवानी पड़ेंगी, जिससे असंतोष पैदा हो सकता है. उदाहरण के लिए, अगर तमिलनाडु की 39 सीटों में से 13 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाएं, तो पुरुषों के लिए सिर्फ 26 सीटें बचेंगी. लेकिन अगर परिसीमन करके कुल सीटें बढ़ाकर 59 कर दी जाएं, तो 20 सीटें महिलाओं को मिलेंगी और पुरुषों के लिए 39 सीटें बरकरार रहेंगी. यानी सरकार का मैसेज साफ था कि हम किसी से कुछ छीनना नहीं चाहते, बस नया जोड़ना चाहते हैं. लेकिन विपक्ष को इस बोनस में खतरा नजर आया.

यह भी पढ़ेंःमहिला बिल पर बहस: 543 सीटों पर तुरंत 33% आरक्षण क्यों नहीं? प्रियंका ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल

विपक्ष का हमला

विपक्ष, खासतौर से कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस, इस बात पर अड़े हैं कि आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना ही गलत है. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का तर्क है कि जब 2023 में ही कानून बन गया था, तो इसे 2024 या 2026 के उपचुनावों से ही लागू क्यों नहीं किया गया? लोकसभा में कांग्रेस के नेता के.सी. वेणुगोपाल ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा, जनगणना और परिसीमन की शर्त आपने लगाई, हमने नहीं. हमारी मांग साफ थी कि आरक्षण तुरंत चाहिए. वहीं, प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक बहुत ही शानदार सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि नेताओं को अपनी सीटें खोने का डर छोड़ना चाहिए. उन्होंने मुस्कुराते हुए सदन में कहा, भारत की महिलाएं इतनी सक्षम हैं कि वो पूरी जिम्मेदारी संभाल सकती हैं. सरकार को थोड़ा बहादुर होना चाहिए. विपक्ष का सबसे बड़ा विरोध इस बात पर है कि सरकार 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर सीटों का बंटवारा करना चाहती है, जबकि नई जनगणना का प्रोसेस अभी शुरू ही हुआ है.

OBC का पेच

इस पूरी बहस की गहराई में एक ऐसा मुद्दा है जो भारतीय राजनीति की रीड़ रहा है और वो है ओबीसी रिजर्वेशन. फिलहाल भारत के संविधान (अनुच्छेद 330 और 332) के तहत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए संसद में आरक्षण की व्यवस्था है. हालांकि, पिछड़ा वर्ग यानी OBC के लिए कोई पॉलिटिकल रिजर्वेशन नहीं है. यही वो दीवार है जिससे महिला आरक्षण पिछले 30 सालों से टकरा रहा है. मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने दशकों पहले तर्क दिया था कि, बिना ओबीसी कोटे के, महिला आरक्षण सिर्फ शहरी और एलीट क्लास की महिलाओं तक सीमित रह जाएगा. वहीं, साल 2023 के कानून में एससी/एसटी महिलाओं के लिए तो उनके मौजूदा कोटे के अंदर आरक्षण की बात है, मगर ओबीसी महिलाओं के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं है. विपक्ष का कहना है कि जब तक जातिगत जनगणना नहीं होती और ओबीसी की सही आबादी का पता नहीं चलता, तब तक उन्हें उनका हक कैसे मिलेगा? अखिलेश यादव ने साफ कहा कि, सरकार ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं को छोड़ रही हैं, ये हमें मंजूर नहीं.

साउथ वर्सेस नॉर्थ

आरक्षण की इस लड़ाई में एक और गंभीर पहलू है और वो है ‘क्षेत्रीय संतुलन’. दरअसल, दक्षिण भारतीय राज्य- तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक इस परिसीमन को लेकर बहुत डरे हुए हैं. उनका डर ये है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में शानदार काम किया है, जिसकी वजह से उनकी आबादी कम बढ़ी है. दूसरी तरफ उत्तर भारत के राज्यों- जैसे यूपी और बिहार की आबादी तेजी से बढ़ी है. ऐसे में अगर परिसीमन सिर्फ जनसंख्या के बेस पर होता है, तो नॉर्थ इंडिया की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत की राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसी डर से बिल का कड़ा विरोध किया. उन्होंने इसे प्रगतिशील राज्यों के साथ धोखा बताया. अमित शाह ने भरोसा दिया कि राज्यों के प्रतिनिधित्व पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन विपक्ष को उन पर भरोसा नहीं है. शशि थरूर ने इसे राजनीतिक नोटबंदी तक बता दिया, जो देश के स्ट्रक्चर को हिला सकती है.

यह भी पढ़ेंःमोदी की विपक्ष को चेतावनी: महिला कोटे का विरोध करने वालों को देश की नारी शक्ति नहीं करेगी माफ

50 साल का इंतज़ार

भारत में आखिरी बार सीटों का बड़ा परिसीमन 1970 के दशक में हुआ था. उसके बाद से इसे दो बार 25-25 सालों के लिए टाल दिया गया ताकि राज्य जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों पर ध्यान दे सकें. अब साल 2026 में वो टाइम लिमिट खत्म हो रही है. पेच ये है कि बिना नई जनगणना के सीटों को फिर से निर्धारित करना कानूनी रूप से काफी चैलेंजिंग है. सरकार चाहती थी कि 2011 के आंकड़ों से काम चला लिया जाए, लेकिन विपक्ष का कहना है कि 15 साल पुराने आंकड़ों पर लोकतंत्र की नई इमारत खड़ी करना गलत है. साल 2026 की जनगणना अब शुरू हो चुकी है, जिसमें पहली बार जातिगत आंकड़े भी जुटाए जा रहे हैं. इसके नतीजे आने में कम से कम दो साल लगेंगे. इसका मतलब है कि महिला आरक्षण 2029 या 2034 तक ही लागू होगा.

आगे का रास्ता

कुछ लोगों का कहना है कि सरकार चाहे तो 543 सीटों पर ही आरक्षण लागू कर सकती है, लेकिन इसके लिए उसे 2023 के अपने ही कानून में संशोधन करना होगा और परिसीमन वाली शर्त को हटाना होगा. हालांकि, ऐसा करने पर कई मौजूदा दिग्गज नेताओं की सीटें आरक्षित हो जाएंगी, जो शायद कोई भी राजनीतिक दल फिर चाहे सत्ता हो या विपक्ष का, दिल से नहीं चाहता. मौजूदा स्थिति ये है कि सरकार का नया बिल गिर चुका है. यानी साल 2023 का कानून कागजों पर तो है, लेकिन बिना परिसीमन के वो एक खाली चेक की तरह है जिसे कैश नहीं जा सकता.

Conclusion

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का 2026 में इस तरह अटक जाना भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा सबक है. ये दिखाता है कि सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है, बल्कि उसके पीछे एक ट्रांसपेरेंसी और सभी वर्गों का भरोसा होना भी जरूरी है. महिलाओं के लिए 33% आरक्षण अब सिर्फ एक चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक कॉन्स्टिट्यूशन जरूरत बन चुका है. लेकिन जब तक ओबीसी कोटे का सवाल, दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं और जनगणना की सुस्ती दूर नहीं होती, तब तक भारत की संसद में महिलाओं की 181 सीटों का सपना अधूरा ही रहेगा. यानी सवाल अभी भी वही है कि, क्या 2026 की जनगणना के बाद भारत को एक नई संसद मिलेगी, या फिर ‘महिला आरक्षण’ आने वाले कई और चुनावों के लिए महज एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगा? फिलहाल, देश की आधी आबादी इस वक्त बड़ी उम्मीद से दिल्ली की तरफ देख रही है.

यह भी पढ़ेंः ‘नहीं वापस होने देंगे बिल…’ राहुल लोकसभा में हुए हमलावर; जानें उनके भाषण से जुड़ी 10 बड़ी बातें

You may also like

LT logo

Feature Posts

Newsletter

@2026 Live Time. All Rights Reserved.

Are you sure want to unlock this post?
Unlock left : 0
Are you sure want to cancel subscription?