Prashant Kishor Victory: प्रशांत किशोर, जिन्होंने नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक, नेताओं के लिए जीत की कहानी लिखी, अब खुदको चुनावी मैदान में साबित कर चुके हैं. उन्होंने BJP को बांकीपुर, उसके ही गढ़ में हराकर सभी को चौंका दिया है. रणनीतिकार से नेता बने पीके ने अपने चुनावी डेब्यू से बिहार असेंबली में जन सुराज पार्टी के पैर जमा लिए हैं. यह जीत उनके करीब दो साल लंबे राजनीतिक संघर्ष और लगातार जमीनी मेहनत का नतीजा है।
विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त और कई सीटों पर जमानत जब्त करवाने के बाद प्रशांत किशोर का कमबैक चौंकाने वाला है. जन सुराज की शुरुआत के बाद किशोर ने पूरे बिहार का व्यापक दौरा किया और लोगों से सीधे संवाद स्थापित किया. हालांकि, पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी, जिससे उन्हें और उनके समर्थकों को बड़ी निराशा झेलनी पड़ी. लेकिन हार से सबक लेते हुए उन्होंने संगठन को मजबूत किया, जनता के बीच अपनी पकड़ बढ़ाई और आखिरकार बांकीपुर में जीत हासिल कर यह साबित कर दिया कि वे सिर्फ दूसरों को चुनाव जिताना नहीं, बल्कि खुद भी जीतना जानते हैं. विधानसभा में जीरो लाने के बाद महज आठ महीने के अंदर उन्होंने बांकीपुर में बीजेपी के 30 साल पुराने किले को ढहा दिया. ऐसे में जानना दिलचस्प होगा कि कैसे वे बिहार में जीरो से हीरो बनकर उभरे.
जीत के 5 बड़े फैक्टर
PK फैक्टर
प्रशांत किशोर की जीत का पहला फैक्टर प्रशांत किशोर खुद हैं. इस बार उन्होंने सिर्फ रणनीति बनाने के बजाय खुद मैदान में उतरने का फैसला किया. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा था, बल्कि सभी 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. नतीजे आए तो सभी हैरान रह गए क्योंकि जन सुराज एक भी सीट नहीं जीत पाई थी. नीरज को BJP ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की खाली की हुई सीट पर उतारा था. नितिन नबीन ने 2006 से 2026 तक पांच बार बांकीपुर में जीत हासिल की थी. राज्यसभा जाने के बाद उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. उपचुनाव में प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी BJP के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा के मुकाबले मजबूत साबित हुई. वोटर्स को एक बड़ा और विश्वसनीय चेहरा मिला.
BJP और RJD के बेस वोट में दरार
प्रशांत किशोर की बढ़त का एक बड़ा कारण BJP और RJD, दोनों के वोट बैंक में बड़ी दरार हो सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि RJD के मुस्लिम यादव वोटर भी प्रशांत किशोर की तरफ झुक गए. मुसलमानों का एक हिस्सा RJD छोड़कर प्रशांत किशोर के साथ जुड़ गया क्योंकि उन्हें BJP के खिलाफ जीतने की उनकी क्षमता दिखी. प्रशांत किशोर की जीत का एक कारण BJP के पारंपरिक सवर्ण वोटरों में सेंध लगना था. ऐसे संकेत थे कि सवर्ण वोटरों के कुछ हिस्से, खासकर ब्राह्मण और कायस्थ, पिछले चुनावों की तरह एकजुट होकर BJP को वोट नहीं दे रहे थे. ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रशांत किशोर खुद ब्राह्मण समुदाय से हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि जन सूरज ने इन वोटरों के एक हिस्से को अपनी ओर खींचा.
जन सुराज की स्ट्रैटेजी
अपने कैंपेन के दौरान, प्रशांत किशोर जाति और धर्म के पारंपरिक मुद्दों से ऊपर उठे और शिक्षा, रोजगार और नागरिक अधिकारों जैसे अपने मुख्य मुद्दों पर ध्यान दिया. नितिन नबीन ने इस हाई-प्रोफाइल चुनाव क्षेत्र के लिए BJP का रोडमैप पेश करने के बजाय, बांकीपुर के लोगों के साथ अपना इमोशनल जुड़ाव दिखाया.
प्रशांत किशोर ने अपने विरोधियों की तुलना में बेहतर पोल स्ट्रैटेजी बनाई. उनके कैंपेन में बड़ी रैलियों और रोडशो के बजाय जनता से साथ चाय पर चर्चा की. उन्होंने बड़े इलाकों में मोहल्ला मीटिंग और पब्लिक इंटरैक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया गया. जन सुराज के कार्यकर्ताओं ने सड़क, नाली और पानी जैसे मुद्दों को उठाया लोगों बदलाव की जरूरत महसूस करवाई. इस तरह, वह BJP की “सोशल एकजुटता” को तोड़ने में कामयाब रहे और लोकल BJP यूनिट के अंदर कुछ मतभेदों का भी फायदा उठाया.
बीजेपी को उम्मीदवार बदलना पड़ा भारी
चुनाव से पहले, BJP ने शुरू में अभिषेक सिन्हा को उम्मीदवार बनाया था और उन्होंने नामांकन भी दाखिल कर दिया था. हालांकि, अगले ही दिन अभिषेक कुमार ने अपना नामांकन वापस ले लिया और उनकी जगह नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया. इस फैसले से भी पार्टी की बदनामी हुई. उम्मीदवार बदलने के इस फैसले से पार्टी कार्यकर्ताओं और वोटरों में कन्फ्यूजन पैदा हो गया. जनसुराज इस बदलाव पर बीजेपी को जमकर घेरा. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आखिरी समय में उम्मीदवार बदलने से पार्टी को संगठन और चुनावी दोनों लेवल पर नुकसान हुआ.
Gen-Z फैक्टर
चुनाव से ठीक एक महीने पहले से दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर-लीक के खिलाफ छात्रों का आंदोलन चल रहा था. धीरे-धीरे यह आंदोलन बढ़ता गया और बिहार तक पहुंच गया. पटना में इसे लेकर छात्र सड़कों पर आ गए. प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज के बाद कहीं न कहीं पूरे बिहार में युवाओं का एक बड़ा वर्ग बीजेपी से नाराज हो गया. इस दौरान प्रशांत किशोर लगातार छात्रों के समर्थन में सक्रिय दिखे और सरकार तथा भाजपा पर तीखे सवाल किए, जिससे युवाओं के गुस्से को और हवा मिली. पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं ने प्रशांत किशोर को अपने नेता के रूप में देखा और बांकीपुर उपचुनाव में उनका साथ दिया.

कैसे रणनीतिकार से नेता बने पीके
किशोर ने हमेशा कहा है कि ऐसे देश में जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा गुजारा करने के लिए संघर्ष करता है, वहां हमेशा एक भरोसेमंद विपक्ष के लिए जगह होगी. IPAC के फाउंडर की यह सबसे गहरी बातों में से एक है कि “इस देश में विपक्ष नहीं, बल्कि विपक्ष में शामिल पार्टियां कमजोर हैं.” एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर उनकी काबिलियत ने प्रधानमंत्री मोदी, बनर्जी, केजरीवाल, नीतीश कुमार, जगन मोहन रेड्डी, उद्धव ठाकरे और एम के स्टालिन जैसे अलग-अलग दलों के नेताओं को फायदा पहुंचाया.
जन सुराज पार्टी पहला संगठन नहीं है जिसमें वह एक लीडर के तौर पर एक्टिव थे. चुनावों को मैनेज करने में उनकी काबिलियत ने उन्हें नीतीश कुमार का पसंदीदा बना दिया था. 2015 में मुख्यमंत्री के तौर पर लौटने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें कैबिनेट मिनिस्टर के रैंक के साथ सलाहकार नियुक्त किया था। तीन साल बाद, वह JD(U) में शामिल हो गए और जल्द ही पार्टी के नेशनल वाइस प्रेसिडेंट बन गए, जिससे यह अंदाजा लगाया जाने लगा कि नीतीश कुमार उन्हें अपनी विरासत का वारिस मानते हैं. लेकिन एक साल बाद हालात बदल गए.
साल 2020 में नागरिकता संशोधन एक्ट के कारण देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. प्रशांत किशोर ने कानून पर नीतीश कुमार के गोलमोल स्टैंड की खुलेआम आलोचना की, जिसके कारण उन्हें 2020 में निकाल दिया. निकाले जाने के तुरंत बाद, किशोर ने एक अजीब कैंपेन, ‘बात बिहार की’ शुरू करने की घोषणा की, जो शुरू ही नहीं हुआ. 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान पीके ने ममता बनर्जी कैंपेन संभाला, जिसके लिए उन्हें खूब तारीफें मिली. ममता बनर्जी तीसरी बार पश्चिम बंगाल की CM बनीं.
जनसुराज का सफर
2021 के बंगाल चुनाव के बाद, उन्होंने रणनीतिकार की भूमिका से रिटायरमेंट की घोषणा की. 2 अक्टूबर, 2022 को उन्होंने बिहार के चंपारण में गांधी आश्रम से जन सुराज पदयात्रा शुरू की. इस पहल के तहत, उन्होंने बिहार के गांवों और कस्बों में 3,000 किलोमीटर से ज़्यादा पैदल चलकर जमीनी मुद्दों को समझा और बिहार में एक नया राजनीतिक विकल्प विकसित करने की कोशिश की. 2 अक्टूबर, 2024 को प्रशांत किशोर ने औपचारिक रूप से अपनी राजनीतिक पार्टी, जन सुराज पार्टी (JSP) लॉन्च की.
नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में, जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई, उसे जीरो सीटेम मिलीं. यहां तक कि कई सीटों पर जनसुराज कैंडिडेट्स की जमानत जब्त हो गई. इस हार ने उनके विरोधियों को उनकी राजनीतिक क्षमताओं पर सवाल उठाने मौका दे दिया. बांकिपुर उपचुनाव में प्रचंड जीत हासिल करके उन्होंने खुद नया विकल्प साबित किया. यह सीट BJP का सबसे मजबूत गढ़ मानी जाती थी, जो BJP नेता नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई थी. बांकीपुर में पीके की जीत को बिहार में बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जा रहा है.
कितने पढ़े लिखे हैं पीके
उपचुनाव से पहले अपने चुनावी हलफनामे में, किशोर ने 22.19 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 73.87 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति बताई है. उनकी पत्नी के पास 89.51 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 12.42 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति है. हलफनामे के मुताबिक, एक प्राइवेट फर्म में उनकी 100 प्रतिशत कंट्रोलिंग हिस्सेदारी है. इस कंपनी ने 2024-25 में जन सुराज पार्टी को 85 करोड़ रुपये और जन सुराज फाउंडेशन को 50 लाख रुपये का डोनेशन दिया था
किशोर ने 1991 में बक्सर के एम.पी. हाई स्कूल से 10वीं पास की और 1993 में पटना साइंस कॉलेज से 12वीं पूरी की। उन्होंने 1996-99 में लखनऊ यूनिवर्सिटी के बिजनेस स्टडीज डिपार्टमेंट से बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (BBA) की डिग्री ली। किशोर ने 2001 और 2003 के बीच हैदराबाद के एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज (ASCI) से मास्टर ऑफ हेल्थकेयर मैनेजमेंट (MHA) की पढ़ाई पूरी की. यह एक खास हेल्थकेयर मैनेजमेंट प्रोग्राम था जिसे अमेरिका की मशहूर जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी और हिंदुजा हॉस्पिटल के साथ मिलकर बनाया गया था. इतना ही नहीं, किशोर के पास विदेश की डिग्री भी है. साल 2010 में, उन्होंने फ्रांस की क्लेरमोंट-फेरैंड यूनिवर्सिटी (कैविलम विची) से फ्रेंच लैंग्वेज की पढ़ाई की.
News Source: PTI
